विचार के बंद होते दरवाजे
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वर्ष 2004 में यूपीए सरकार के सत्ता में आने के कुछ समय बाद ही एक वरिष्ठ मंत्री ने एक बड़े पत्रकार को दिल्ली में लंच पर आमंत्रित किया। उस वक्त ऐतिहासिक शोध से संबंधित एक प्रतिष्ठित केंद्र के निदेशक का पद रिक्त था और मंत्री महोदय वरिष्ठ पत्रकार से किसी उपयुक्त उम्मीदवार के संबंध में सुझाव चाहते थे। उस पत्रकार ने सबसे पहले जो नाम सुझाया, वह मेरा ही नाम था। यह सुनते ही मंत्री महोदय बोल उठे, 'गुहा ने तो इंदिरा जी के बारे में काफी कड़वी बातें लिखी हैं। हम उन्हें नहीं ले सकते।' फिर, पत्रकार ने प्रबुद्ध राजनीतिक सिद्धांतकार पार्थ चटर्जी का नाम सुझाया। इस पर मंत्री महोदय का जवाब था, 'चटर्जी ने जवाहरलाल जी के बारे में काफी तल्ख बातें लिखीं हैं, इसलिए हम उन्हें भी नहीं ले सकते।' इसके बाद पत्रकार महाशय ने समझदारी दिखाते हुए बातों का रुख दूसरे विषयों की ओर मोड़ लिया।
इस वाकये को यहां बयां करने की दो वजहें हैं। पहली यह कि अब कांग्रेसी कुछ भी कहें, मगर इस वाकये से साबित होता है कि यूपीए के समय भी शैक्षिक नियुक्तियों में अमूमन राजनीति हावी रहती थी। दूसरी कम महत्वपूर्ण वजह यह है कि लाख कमियों के बावजूद मंत्री रहे कांग्रेस के कुछ सदस्य खासकर ऐसी किताबें जरूर पढ़ते हैं, जिनमें 'फर्स्ट फैमिली' के खिलाफ बातें लिखी गई हों।
इंदिरा गांधी के समय से केंद्र सरकार संस्कृति और स्कॉलरशिप को बढ़ावा देने वाले शैक्षिक संस्थानों की स्वायत्तता पर चोट पहुंचाती आई है। इस मामले में खासकर दो कांग्रेसी शिक्षा मंत्री दोषी थे। ये थे नुरुल हसन और अर्जुन सिंह। इन दोनों ही ने मार्क्सवादी और समाजवादी रुझान रखने वालों को बढ़ावा दिया। हालांकि नियुक्तियों के मामले में हसन और अर्जुन सिंह ने जो भी फैसले किए, वे सर्वश्रेष्ठ नहीं थे, मगर उन्हें निकृष्टतम भी नहीं कहा जा सकता। इनकी तुलना में मौजूदा एनडीए सरकार ने जो नियुक्तियां हाल में की हैं, उनमें फर्क है। एनडीए सरकार ने जिन लोगों को चुना है, उसमें उस क्षेत्र विशेष्ा की दूसरी प्रतिभाओं की अवहेलना साफ दिखती है। इसका सबसे जघन्य उदाहरण इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएचआर) के प्रमुख वाई सुदर्शन राव की नियुक्ति के मामले में दिखा, जिनके काम से उनके साथी इतिहासकार भी वाकिफ नहीं हैं। ऐसा ही मामला फिल्म ऐंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के प्रमुख के तौर पर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति को लेकर है, जो अपने क्षेत्र के दिग्गज कहे जाने से कोसों दूर हैं।
1998 से 2004 के बीच पहली एनडीए सरकार ने शैक्षिक निकायों की शासकीय परिषदों में आरएसएस से सहानुभूति रखने वालों को भर दिया था। मगर जब बात सबसे ऊंचे पद यानी 'चेयरपर्सन' पर नियुक्ति की आई, तब कम से कम कुछ ध्यान व्यक्ति की योग्यता पर भी दिया गया। यही वजह थी कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने प्राचीन भारत के इतिहासकार जी सी पांडे को शिमला में स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज का चेयरमैन बनाया। जबकि आधुनिक भारत के इतिहासकार एम जी एस नारायणन को आईसीएचआर का चेयरमैन बनाया गया। राजनय से शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखने वाले एम एल सोंधी इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च (आईसीएसएसआर) के चेयरमैन बने।
इन तीनों विद्वानों में से कोई भी मार्क्सवादी नहीं था, दो ने तो सार्वजनिक तौर पर मार्क्सवाद का विरोध किया था। ऐसे में साफ है कि इन तीनों का चयन कोई संयोग नहीं था। मगर निस्संदेह ऐसा करते वक्त दूसरे पहलुओं पर भी गौर किया गया था। पांडे और नारायणन, दोनों ही बेहद गंभीर और सम्मानित विद्वान थे। दूसरी ओर सोंधी देश में अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के सर्वश्रेष्ठ विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर थे। इससे काफी पहले संयुक्त मोर्चा सरकार के दौर में एच डी देवेगौड़ा प्रधानमंत्री थे, और एस आर बोम्मई मानव संसाधन विकास मंत्री। उस वक्त एस सेत्तार को आईसीएचआर का और डी एम नंजुंदप्पा को आईसीएसएसआर का चेयरमैन बनाया गया था। महज संयोग नहीं था कि ये दोनों विद्वान उसी कर्नाटक राज्य से थे, जहां से प्रधानमंत्री और मानव संसाधन विकास मंत्री ताल्लुक रखते थे। इसके बावजूद यह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि प्रोफेसर सेत्तार ने होयसल मंदिरों पर काफी ऊंचे स्तर का काम किया है। प्रोफेसर नंजुंदप्पा भी काफी प्रतिष्ठा प्राप्त शिक्षक माने जाते थे, जिनका लोकनीति में भी सक्रिय दखल था।
ऊपर संक्षेप में मैंने जो विश्लेषण किया, उससे तीन बड़े निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, शैक्षिक और सांस्कृतिक नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद और संरक्षणवाद की प्रवृत्ति को भारत सरकार की ओर से काफी समय से बढ़ावा दिया जाता रहा है। दूसरा, इन नियुक्तियों को करते वक्त पहले की सरकारें अपनी विचाराधारा वाले व्यक्तियों को आगे लाने में कोई संकोच नहीं करती थी, मगर योग्यता का कुछ ख्याल अवश्य रखती थीं। तीसरा, वर्तमान एनडीए सरकार ने योग्यता और प्रतिभा के सवाल को बिल्कुल दरकिनार कर दिया है। इस तीसरे निष्कर्ष को साबित करने के लिए ऊपर मैंने दो प्रमाण दिए हैं। तीसरा प्रमाण एनबीटी के चेयरमैन के तौर पर बलदेव शर्मा की नियुक्ति है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुखपत्र 'पांचजन्य' के संपादन के सिवाय साहित्य या विद्वता के क्षेत्र में शर्मा जी का योगदान नगण्य ही है। अफसोस तब होता है, जब इस पद को संभालने वाले एनबीटी के कुछ पूर्व चेयरमैन याद आते हैं। इनमें इतिहासकार सर्वपल्ली गोपाल, आलोचक सुकुमार अझिकोडे और उपन्यासकार यू आर अनंतमूर्ति जैसी हस्तियां शामिल हैं। इन सभी का राजनीतिक झुकाव वामपंथ की ओर था, मगर इन्होंने जो किताबें लिखीं, वे आज भी पढ़ी जाती हैं, उन पर बहस होती है, मंथन होता है।
आईसीएचआर, आईसीएसएसआर, एफटीआईआई या एनबीटी जैसे निकायों का प्रमुख ऐसा शख्स होना चाहिए, जिसे, अपने क्षेत्र के समकक्षों का सम्मान प्राप्त हो, और जो योग्य होने के साथ-साथ निष्पक्ष प्रशासक भी हो। दिक्कत यह है कि सुदर्शन राव, गजेंद्र चौहान और बलदेव शर्मा पहली शर्त ही पूरी नहीं करते। मुमकिन है कि ये सभी भले इंसान और अच्छे प्रशासक हों, मगर बड़ी विनम्रता के साथ यह कहा जा सकता है कि ये तीनों अपने पदों के लिए जरूरी योग्यता नहीं रखते।
वर्तमान एनडीए सरकार ने जो नियुक्तियां की हैं, वे पिछली एनडीए सरकार से बहुत ज्यादा खराब हैं। इसकी पहली वजह यह हो सकती है कि वाजपेयी जी की सरकार में कुछ मंत्री ऐसे थे, जो विद्वानों और विद्वता से कुछ सरोकार रखते थे। मगर वर्तमान सरकार इस मामले में सिफर है। दूसरी वजह यह हो सकती है कि गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी बौद्धिक लोगों और सांस्कृतिक रचनात्मकता का कम ही सम्मान करते थे। अब यही पहलू केंद्र सरकार के स्तर पर भी दिख रहा है। तीसरी वजह यह हो सकती है कि प्रधानमंत्री ने ऐसे मामलों को आरएसएस के भरोसे छोड़ दिया हो, ताकि इनकी छाया उनके पसंदीदा विषयों- अर्थव्यवस्था और विदेश नीति पर न पड़ सके।
वजह चाहे जो हो, सच तो यही जान पड़ता है कि वर्तमान सरकार लेखकों, विद्वानों, कलाकारों और फिल्म निर्माताओं को तुच्छ समझती है। ऐसा कहना अफसोसनाक है, मगर सरकार ने जैसे फैसले किए हैं, उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचने के सिवाय कोई चारा शायद ही बचता हो।