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झाड़ू और पोछे का चकल्लस

Mon, 09 Dec 2013 07:18 PM IST
मुन पंवार
मुन पंवार Updated Mon, 09 Dec 2013 07:18 PM IST
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Ckalls of broom and mop

कल झाड़ू और पोछे के बीच बड़ी तू-तू, मैं-मैं हो गई। सफाई का श्रेय झटकने के चक्कर में दोनों भिड़ पड़े। पोछे को इस बात की नाराजगी है कि सफाई की बात पर हर कोई झाड़ू का ही जिक्र क्यों कर रहा है? पोछा भी तो उसी मुहिम से जुड़ा हुआ है। वह कोई झक नहीं मार रहा है। तो फिर उसे कोई क्यों सफाई का क्रेडिट देने को तैयार नहीं?

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इसी बात से खीझकर पोछा तमतमाते हुए बोला, ओय झाड़ू! एक बात कान खोलकर सुन ले। मेरे बगैर कोई घर नहीं चमकता, लेकिन तू खुद को सफाई का ब्रांड अंबेसडर बताता फिर रहा है। यह तो मेरे साथ सरासर नाइंसाफी है।
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यह सुनकर झाड़ू को भी गुस्सा आ गया। बोला, ओय पोछे! घर के ओने-कोनों की सारी गंदगी, सारा कूड़ा-कर्कट तो मैंने साफ किया। तू आखिर में पानी के साथ गठबंधन करके फर्श पर पिल पड़ा और घर की सारी सफाई का क्रेडिट लूटने लगा। तेरे इस इंडिया शाइनिंग की अब पोल खुल चुकी है। इसलिए अपनी औकात में रह।
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झाड़ू की इस बात पर पोछा दंग रह गया। उसे फिर गुस्सा आ गया। बोला, ओय झाड़ू! तू इसलिए फुदक रहा है, क्योंकि तेरी कूड़ा-कर्कट के साथ तगड़ी सेटिंग है। लेकिन एक बात याद रख। घर की सफाई का पता तब ही चलता है, जब पोछा लगता है। इसलिए हैसियत की फिक्र तू कर।

पोछे की इस बात पर झाड़ू ने भी ताव दिखाया। बोला, ओय पोछे! मेरी नहीं, अपनी हैसियत देख। तू तो शहरी मानसिकता और खाए-अघाए लोगों की नुमाइंदगी करता है। झाड़ू हर शहर, हर गांव, हर गली, हर नुक्कड़, हर घर, हर झुग्गी में लगता है। तू लाख कोशिश कर ले, लेकिन झाड़ू नहीं बन सकता। झाड़ू होने के लिए आम आदमी होना पड़ता है, जो तेरे वश की बात नहीं। अब तो मैंने राजनीति में भी दखल दे डाली है। मेरे नाम पर वोट मांगे गए हैं और कई लोग जीत गए हैं। इसलिए तू खुद पर तरस खा। एक बात और सुन। घर में पोछा न भी लगे, तब भी कोई बात नहीं होती, लेकिन झाड़ू बगैर गुजारा नहीं। झाड़ू ने अपनी अहमियत पर लंबा भाषण जड़ दिया।


यह बात पोछे के दिल को लग गई। झाड़ू ने एकाएक पोछे के राजनीतिक वजूद को चुनौती दे डाली है। पोछा आत्ममंथन की मुद्रा में है। झाड़ू और पोछे की इस तू-तू, मैं-मैं के बीच फिलहाल घर की सफाई का काम लटक गया है। राजनीतिक भाषा में इसे ‘हंग’ होना कहा जा रहा है।

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