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बारिश में टापू बनते शहर : जलवायु परिवर्तन और शहरी नियोजन की अनदेखी से बढ़ता संकट
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बारिश से जलमग्न सड़क।
- फोटो :
संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पानी से भरी सड़कें, रेंगती गाड़ियों, टूटे वाहनों और घुटनों तक गहरे पानी में अपने दोपहिया वाहनों के साथ चलने वाले नागरिक जैसे परिचित दृश्यों की वापसी के लिए भारी बारिश के सिर्फ एक दिन का समय लगा। बिजली कटौती, ढहती दीवारों और बिजली के झटके के कारण लोगों की मौत भी हुई। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में इस तरह के दृश्य नए नहीं हैं।
हर बार बारिश के दौरान ऐसे दृश्य दिखाई देते हैं। चूंकि जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून के स्वरूप में भी परिवर्तन आया है और बारिश कई बार देर तक और बहुत अधिक होती है, ऐसे में, लोगों को ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ता है। मानसून से होने वाली परेशानियों के दृश्य पूरे देश में एक जैसे दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए, दो सप्ताह पहले, बंगलुरु की 126 झीलें उफान पर थीं।
इससे वहां महादेवपुरा, बेलंदूर, बोम्मनहल्ली, मुन्नेकोलालु आदि इलाकों में जल जमाव की स्थिति थी। आलम यह था कि 2,000 से अधिक घरों में बाढ़ का पानी आ गया था और करीब 10,000 घर अलग-थलग पड़ गए थे। पॉश इलाकों सहित कई जगहों में लोगों को पेयजल और बिजली की समस्या का सामना करना पड़ा। हर तरफ ऐसा मंजर था, जैसे निजी संपत्ति को बट्टे खाते में डाल दिया गया हो।
इस तरह की दुखद स्थिति दरअसल शहरी नियोजन की कमियों की तरफ ही इशारा करती है। आमतौर पर हमारे शहर नियमित रूप से शहरी नियोजन के प्रमुख तत्वों की उपेक्षा करते हैं। नालियों की बेहतर निकासी क्षमता की कमी और झीलों व नदियों पर ध्यान न देने के साथ शहरी स्थानों को कंकरीट में बदलने पर जोर हर तरफ दिखाई देता है। कुल मिलाकर, भारतीय शहर शहरी नियोजन पर सीमित क्रियान्वयन के संकट से ग्रस्त हैं।
सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायर्नमेंट के अनुसार, बंगलुरु जैसे शहर ने ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स, 2020 में क्वालिटी ऑफ लाइफ मेट्रिक के तहत सौ में से 55.67 स्कोर किया। दिल्ली जैसा महानगर राजधानी होने के बावजूद इंडेक्स में 57.56 तक पहुंचा, जबकि भुवनेश्वर जैसे शहर का स्कोर सिर्फ 11.57 था। आदर्श दुनिया में इस तरह की स्थिति अस्वीकार्य है।
गौरतलब है कि पश्चिम में वर्ष 1898 में सर एबेनेजर हॉवर्ड द्वारा शुरू किए गए गार्डन सिटी आंदोलन ने शहरों के केंद्र में काम के माहौल को विकेंद्रीकृत करने की मांग की थी। उस आंदोलन ने कारखाने के श्रमिकों के लिए स्वस्थ रहने की जगह प्रदान करने पर तार्किक जोर दिया था। नतीजतन, शहरों को योजनाबद्ध तरीके से डिजाइन किया गया, जिसमें आत्मनिर्भर समुदायों के साथ पार्क और निवास, औद्योगिक कार्य और कृषि के लिए अलग-अलग क्षेत्र शामिल थे।
इस तरह के आंदोलन इस विचार से प्रभावित थे कि फैक्टरी में काम करने वाले लोगों का जीवन स्तर बेहतर हो। आदर्श गार्डन सिटी की योजना खासतौर पर खुली जगहों, सार्वजनिक पार्कों और बुलेवार्ड्स (मुख्य पथ) के साथ बनाई गई थी। अमेरिका में गार्डन सिटी पड़ोस की अवधारणा के साथ विकसित हुई, जहां एक स्थानीय स्कूल या सामुदायिक केंद्र के आसपास आवासीय घरों और सड़कों का आयोजन किया गया, जिसमें यातायात का दबाव कम करने और सुरक्षित सड़कों की सुविधा प्रदान करने पर जोर दिया गया।
प्रदूषण और भीड़-भाड़ पर नियंत्रण के साथ-साथ जैव विविधता को बनाए रखने के लिए लंदन में शहर के चारों ओर एक महानगरीय हरित पट्टी है, जो 5,13, 860 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करती है। सवाल यह है कि रिंग रोड और शहरी फैलाव से आगे भारतीय शहरों में ऐसा कुछ क्यों नहीं हो सकता। इस बीच, पेरिस ने इस दिशा में अपनी पहल ‘15 मिनट सिटी’ के तौर पर आगे बढ़ाई है। यह विचार काफी सरल है।
इसके तहत प्रत्येक पेरिसवासी को अपनी खरीदारी, कामकाज, मनोरंजक गतिविधियों के साथ और अपनी सांस्कृतिक जरूरतों को 15 मिनट की पैदल या बाइक की सवारी के भीतर पूरा करने में सक्षम होना चाहिए। इस सक्षमता का मतलब यह होगा कि वाहनों की आवाजाही की संख्या काफी कम हो जाएगी। इस दिशा में अगला कदम कारों और अन्य वाहनों के बजाय पैदल चलने वालों के लिए शहर की योजना तैयार करना होगा।
इसके लिए पैदल यात्रियों के लिए बुनियादी ढांचे, गैर-मोटर चालित परिवहन क्षेत्रों आदि में निवेश के साथ-साथ मिश्रित उपयोग के विकास की तरफ व्यापकता के साथ बढ़ने की आवश्यकता है। यह दृष्टिकोण राजमार्गों को चौड़ा करने के बजाय पैदल चलने वालों के रास्ते को चौड़ा करने के लिए प्रेरित करेगा। सवाल यह है कि बंगलुरु को एक ऐसे शहर के रूप में फिर से डिजाइन क्यों नहीं किया जा सकता, जहां यातायात की परेशानी न हो और वहां का प्रत्येक निवासी नौकरी, सार्वजनिक सेवाओं, किराने का सामान इत्यादि तक आसानी से पहुंचने में सक्षम हो?
क्या भोजन के लिए 10 मिनट की डिलीवरी के बजाय काम करने के लिए 10 मिनट की पैदल दूरी बेहतर नहीं होगी? प्रत्येक भारतीय शहर में आदर्श रूप से एक मास्टर प्लान-यानी एक रणनीतिक शहरी नियोजन दस्तावेज होना चाहिए, जिसे एक-दो दशक के अंतराल पर नियमित रूप से अद्यतन (अप-टू-डेट) किया जाए। इस तरह की योजनाओं में गरीबी के कारण होने वाले विस्थापन पर ध्यान देने के साथ-साथ किफायती आवास पर ध्यान देना भी जरूरी है।
भूमि अधिग्रहण में मुद्रास्फीति की भी गणना के साथ इस तरह की योजनाओं और जमीनी नगरपालिका बजट (और फंड रिलीज) के बीच चल रहे विरोधाभास को भी दूर किया जाए। देश में शहरी भूमि के इस्तेमाल को बेहतर करने की जरूरत है। किसी भी मैपिंग प्लेटफॉर्म पर सैटेलाइट मैप इमेजरी को देखकर यह साफ लगता है कि रैखिक बुनियादी ढांचे के साथ धान के खेतों में पसरता जा रहा देश का शहरी विकास अनौपचारिक, अनियोजित और विशाल पड़ोस के साथ खासा बेतरतीब है।
इस बीच, उन जगहों पर, जहां औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त शहर और शहरी पड़ोस हैं, पुरानी योजना के कारण भूमि उपयोग को लेकर निर्णय खासा असंतोषजनक है। मुंबई के मामले पर विचार करें, जहां लगभग 1/4 सार्वजनिक स्थान है, जबकि आधी से अधिक भूमि केवल इमारतों के चारों ओर कम उपयोग की जगह है, जो दीवारों से घिरी हुई और सार्वजनिक पहुंच से दूर है।