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पाकिस्तान में चीन की ताकत

Wed, 18 Jan 2017 07:24 PM IST
जॉन चाको
जॉन चाको Updated Wed, 18 Jan 2017 07:24 PM IST
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China's strength in Pakistan
जॉन चाको

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनने से कुछ महीने पहले फरवरी, 2014 में आईबी के पूर्व प्रमुख अजीत डोभाल ने एक बड़े नीतिगत बदलाव की वकालत की थी। उन्होंने कहा था कि भारत में सक्रिय अलगाववादियों और उग्रवादियों को पाकिस्तान से मिल रही मदद एक बड़ी रणनीतिक चुनौती है, जिसका करारा जवाब दिया जाएगा, यहां तक कि बलूचिस्तान तक को अलग-थलग किया जा सकता है। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने दावा किया कि दुनिया ने एकमत से भारत की पाकिस्तान नीति की सराहना की है। उन्होंने कहा कि भारत वैश्विक स्तर पर संतुलनकारी ताकत के बजाय अग्रणी भूमिका निभाएगा। जमीनी हकीकत इस लक्ष्य से मेल नहीं खाती। चीन की नेतृत्वकारी भूमिका को देखते हुए भारत को उसके साथ ऐसा तालमेल बिठाना होगा, ताकि वह पाकिस्तान और विश्व व्यवस्था में रचनात्मक बदलाव के लिए दबाव बना सके।

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डोभाल की चेतावनी के बावजूद पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति मजबूत हुई है और नतीजतन वहां सेना की लोकप्रियता बढ़ी है। पाकिस्तान ने उम्मीद से कहीं अधिक सुसंगत और लचीला रुख दिखाया है। दूसरा, इस्लामाबाद को पूरी तरह से अलग-थलग नहीं किया जा सकता। तीसरा, सितंबर, 2016 में भारत द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक से पाकिस्तानी सेना के हितों को खास नुक्सान नहीं पहुंचा है।
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ऐतिहासिक रूप से 1971 के युद्ध में भारत को मिली जीत से पाकिस्तान कमजोर पड़ा था और उसके बाद से ही उसमें परमाणु कवच की चाहत बढ़ी। भारत से खुद को कमतर न दिखाने के लिए पाकिस्तान ने बड़ी ताकतों का संरक्षण हासिल करने की पहल की, ताकि भारत की ताकत और उसके संसाधनों के आगे वह कमजोर न पड़े। 9/11 के बाद के दौर में जहां अमेरिका के साथ भारत के रणनीतिक रिश्ते एक नए स्तर को पहुंच गए, वहीं पाकिस्तान में अमेरिका का दखल भी बढ़ा। हालांकि पाकिस्तान में चीनी निवेश के अप्रत्याशित तरीके से बढ़ने से वहां अमेरिका दबाव कम हुआ है। पाकिस्तान में अनेक लोग मानते हैं कि चीन के साथ उनके देश का रिश्ता सुरक्षा आधारित भूराजनीति से परिवर्तित होकर भू-आर्थिक केंद्रित होता जा रहा है। बीजिंग वहां चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के लिए 51.1 अरब डॉलर का निवेश कर रहा है। यह अहम है कि पाकिस्तान चीन केंद्रित उस व्यवस्था के एक बड़े हब के रूप में उभर रहा है, जैसी व्यवस्था की कल्पना अमेरिका ने की थी। द बेल्ट ऐंड रोड इनिश्येएटिव (बीआरआई) का लक्ष्य यूरेसिया से होकर एशिया, अफ्रीका और यूरोप से लेकर चीन के बाजारों को जोड़ने और हिंद महासागर तक एक समुद्री सिल्क रूट तैयार करना है। इनमें पाकिस्तान अहम भूमिका निभा रहा है। यह माओ युग के तीसरी दुनिया की एकजुटता से संबंधित नेटवर्क से कहीं अधिक मजबूत है। बीआरआई में जिन देशों की दिलचस्पी है उनमें रूस और इरान जैसे देश भी हैं, जिन पर भारत ने पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए भरोसा किया है। बीआरआई ने पाकिस्तान की स्थिति बदल दी है। यहां तक कि हाल ही में हुए हार्ट ऑफ एशिया समिट में रूस ने तालिबान को पाकिस्तान के समर्थन की आलोचना करने से परहेज किया था। इसके बजाय रूस अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया में चीन और पाकिस्तान के सहयोग से सुरक्षा स्थापित करना चाहता है। साफ है कि पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए भारत को चीन पर प्रभाव बढाना चाहिए। दोनों देश क्षेत्रीय व्यापार बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
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-लेखक यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में शोधार्थी हैं 

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