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परिदृश्य : चीन खुद एक वैश्विक समस्या, फिर भी दुनियाभर के बाजारों पर ड्रैगन का दबदबा

Thu, 22 Aug 2024 06:57 AM IST
शिव शुक्ला माइकल बेकले
माइकल बेकले Published by: शिव शुक्ला Updated Thu, 22 Aug 2024 06:57 AM IST
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सार
चीनी कर्ज के चलते वित्तीय संकट में फंसे जांबिया, श्रीलंका और पाकिस्तान को तो छोड़िए, यूरोप की आर्थिक महाशक्ति जर्मनी जैसे धनी देश भी व्यापार में चीन पर अत्यधिक निर्भरता के संकट को महसूस कर रहे हैं। चीनी निर्माताओं को मिल रही भारी सब्सिडी से दुनिया भर के बाजार चीन के सस्ते उत्पादों से भर गए हैं।
 
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China itself is global problem, yet Dragon dominates markets all over world
चीन। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वेनेजुएला के भूतपूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने 2000 के दशक में अपने देश का आर्थिक भविष्य उभरते चीन के ऊपर दांव पर लगा दिया, इससे उसे अरबों डॉलर का निवेश मिला और तेल सौदों के लिए कर्ज भी। शुरुआत में इससे फायदा हुआ। चीन ने जमकर वेनेजुएला के तेल का उपभोग किया और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं का वित्त पोषण किया। लेकिन 2010 के दशक में तेल की कीमतें गिर गईं और अर्थव्यवस्था के साथ-साथ चीन की ओर से तेल की मांग भी घट गई। नतीजतन वेनेजुएला के तेल निर्यात का राजस्व 2016 में घटकर 22 अरब डॉलर रह गया। उसकी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई। लोग कचरे के ढेर में भोजन तलाशने लगे, अस्पतालों में दवाओं की कमी थी और अपराध बढ़ गए थे। तब से, लगभग 80 लाख लोग देश छोड़कर चले गए हैं। चीन ने वेनेजुएला को नए ऋण देने से मना कर दिया, जिससे वहां अधूरी परियोजनाओं का ढेर लग गया।



चीन पर वेनेजुएला की अत्यधिक निर्भरता एक चेतावनी थी, जिसकी दुनिया ने अनदेखी की। चीन के उदय से लाभान्वित दर्जनों अन्य देश अब वित्तीय संकट और ऋण न चुका पाने के जोखिम में फंसे हैं, क्योंकि चीनी अर्थव्यवस्था ठहर गई है। फिर भी चीन ऋण राहत देने से इन्कार कर रहा है और संरक्षणवादी गतिविधियों पर दोगुना जोर दे रहा है, जबकि उसे अपनी अर्थव्यवस्था को मुक्त करने और नई शुरुआत के लिए सुधार करने चाहिए। यह बढ़ती चीनी अर्थव्यवस्था के जादुई गुब्बारे का दूसरा पहलू है।


वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद दुनिया को एक रक्षक की जरूरत थी और चीन ने वह भूमिका निभाई। इसका सकारात्मक प्रभाव दुनिया भर में महसूस किया गया। वर्ष 2008 से 2021 तक चीन ने वैश्विक विकास में 40 प्रतिशत से अधिक का योगदान दिया। विकासशील देशों ने खुद को चीन से जोड़ा, और चीन दुनिया के अधिकांश देशों का शीर्ष व्यापारिक भागीदार बन गया। वेनेजुएला की तरह कई देशों ने पाया कि तेजी से बढ़ती चीनी अर्थव्यवस्था उनके वस्तु निर्यात के लिए एक आकर्षक बाजार है, और उन्होंने उसमें भारी निवेश किया, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों को सुस्ती का सामना करना पड़ा। चीन ने विभिन्न देशों को दस खरब डॉलर से ज्यादा का ऋण दिया है, जिसका बड़ा हिस्सा चीनी कंपनियों द्वारा बीआरआई (बेल्ट एंड रोड इनीिशएटिव) के तहत बनाए जाने वाले बुनियादी ढांचे के लिए है। मगर चीन की तेजी टिकाऊ नहीं थी। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उद्यमशीलता को दबाया, सुधार का विरोध किया और अमेरिकी संरक्षणवाद के खिलाफ प्रतिक्रिया को उकसाया। शी जिनपिंग के सत्ता संभालने के बाद चीन के आर्थिक विकास में काफी कमी आई है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुश्किल से ही बढ़ रहा है। हालांकि चीन ने लगातार बाहरी स्रोतों के अनुमान से ज्यादा विकास का दावा किया है। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ता है, जिन्होंने अपने आर्थिक विकास को चीन से जोड़ रखा है। कई देशों द्वारा चीन को किए जाने वाले निर्यात में गिरावट आई है।

चीन अपनी आर्थिक मंदी से निपटने के लिए चीनी निर्माताओं को भारी ऋण और सब्सिडी दे रहा है, जिससे दुनिया भर के बाजार सस्ते उत्पादों से भर गए हैं, वैश्विक वस्तुओं की कीमतें गिर रही हैं और दूसरे देशों के निर्माताओं को अनुचित प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। बेशक, वैश्विक अर्थव्यवस्था में कमजोरी के लिए सिर्फ चीन ही जिम्मेदार नहीं है, जो महामारी, युद्ध और व्यापार तनावों से प्रभावित है। लेकिन वह नाजुक समय में हालात को और भी बदतर बना रहा है। चीन ने विदेशी ऋण में भारी कटौती की है और विकासशील देशों को अपने मौजूदा ऋणों को चुकाने के लिए मजबूर कर रहा है। जांबिया और श्रीलंका को गहरे वित्तीय संकट में धकेलने में चीनी ऋणों का बहुत बड़ा हाथ था। आंशिक रूप से चीनी ऋण की अपारदर्शी प्रकृति के कारण दोनों देशों के संकट और बढ़ गए।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने चेताया कि विकासशील दुनिया के दर्जनों देश, जिनमें से कई के चीन से घनिष्ठ व्यापारिक संबंध हैं, अब ऋण संकट का सामना कर रहे हैं। पाकिस्तान एक गहरे आर्थिक संकट में फंस गया है, जिससे वह बाहर नहीं निकल पा रहा है, क्योंकि उसे बुनियादी ढांचे और अन्य परियोजनाओं के लिए चीन को अरबों डॉलर का ऋण चुकाना है। यहां तक कि यूरोप की आर्थिक महाशक्ति कहे जाने वाले जर्मनी जैसे कुछ धनी राष्ट्र भी चीन के साथ व्यापार करने की अत्यधिक निर्भरता के कारण गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। पिछले साल चीन को जर्मनी के निर्यात में नौ फीसदी की गिरावट आई व उसकी अर्थव्यवस्था भी सिकुड़ गई।

ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और सऊदी अरब जैसे प्रमुख कमोडिटी निर्यातक असुरक्षित हैं, क्योंकि चीन को निर्यात उनकी अर्थव्यवस्थाओं का अहम हिस्सा है। अमेरिका सीधे तौर पर कम प्रभावित हुआ है, क्योंकि चीन को विनिर्मित वस्तुओं का निर्यात अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद का एक प्रतिशत से भी कम है। लेकिन चीनी उत्पादों की अधिकता अमेरिकी निर्माताओं के लिए खतरा है। दुनिया के सबसे बड़े संप्रभु ऋणदाता चीन ने अक्सर गैर-पारदर्शी व्यवस्थाओं के माध्यम से कई देशों को कर्ज के बोझ तले दबाने में अग्रणी भूमिका निभाई है, जो 1980 के दशक में विकासशील देशों, खासकर लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के ऋण संकट के समान है।

पिछले दशक में चीन ने पेरिस क्लब (दुनिया के 22 सबसे बड़े ऋणदाता देशों का समूह) से भी ज्यादा ऋण दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि अनुमानित रूप से 3.3 अरब लोग ऐसे देशों में रहते हैं, जहां ब्याज भुगतान शिक्षा या स्वास्थ्य में निवेश से अधिक है। आर्थिक संकट में फंसे वेनेजुएला के उदाहरण ने दिखाया है कि ये परिस्थितियां आर्थिक पतन, दमन और मानवीय आपदा की ओर ले जा सकती हैं। हाल में, फ्रांस, पोलैंड, केन्या, बोलीविया, श्रीलंका और कई अन्य देशों में लोगों ने बिगड़ती आर्थिक स्थितियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया है। धनी अर्थव्यवस्थाओं और ऋणदाता देशों से ऋण राहत, बाजार पहुंच और कमजोर अर्थव्यवस्थाओं की मदद के लिए अन्य तरीकों से सहयोग करने की मांग बढ़ रही है। लेकिन ऐसे कदमों का केवल सीमित प्रभाव होगा, जब तक कि चीन को कठघरे में नहीं खड़ा किया जाता, क्योंकि वह खुद में एक वैश्विक समस्या है।

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