समाज: हमारे बच्चे कुछ कहना चाहते हैं, नंबर से ज्यादा जरूरी है उनका जीवन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
पिछले दिनों एक अंग्रेजी अखबार में छपने वाले समस्या कॉलम को पढ़ते हुए एक बच्चे के पूछे सवाल पर ध्यान गया और बहुत परिताप हुआ। बच्चे ने कहा था कि मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता हूं। पिछले इम्तिहान में मेरे 96 प्रतिशत अंक आए थे, लेकिन माता-पिता खुश नहीं हुए। मैं हर वक्त पढ़ता रहता हूं। न दोस्तों से मिलता हूं, न टीवी देखता हूं। खेलने का समय भी नहीं मिलता। समझ में नहीं आता कि माता-पिता को कैसे खुश करूं। मैं आत्महत्या करना चाहता हूं। एक आठवीं में पढ़ने वाले बच्चे के द्वारा किसी और से पूछा गया यह सवाल हमारे मन में कितने सवाल पैदा करता है। आखिर माता-पिता यह क्यों नहीं समझते कि बच्चे का पढ़ने में मन लगे, इसके लिए उसका हर वक्त पढ़ना नहीं, खेलना, कूदना, मनोरंजन, मित्रों से मिलना-जुलना, सिर्फ उसकी पढ़ाई के लिए ही नहीं, उसके स्वास्थ्य और मानसिक विकास के लिए भी जरूरी है।
फिर यह भी कितना चितांजनक है कि एक किशोर, जिसकी उम्र शायद तेरह–चौदह साल होगी, वह माता-पिता को नहीं, किसी और को अपनी समस्या बता रहा है। आखिर माता-पिता से उसकी इतनी दूरी क्यों है। क्या उसके पास इतनी आजादी भी नहीं कि वह उन्हें अपनी समस्या बता सके। या डांट-डपट का डर इतना है कि किसी से कुछ कह ही नहीं सकता। वह जिस स्कूल में पढ़ता है, वहां भी क्या कोई एक अध्यापक ऐसा नहीं, जो इस बच्चे को समझा सके, ढाढ़स बंधा सके? आखिर हर बच्चा तो सौ में से सौ नंबर नहीं ला सकता। वैसे भी इन दिनों सौ प्रतिशत अंक लाने पर भी बहुत बार जिस कॉलेज में चाहते हैं, वहां दाखिला नहीं मिलता।
हो सकता है, वह बच्चा किसी और क्षेत्र में अच्छा कर सकता हो, लेकिन उसे बताने वाला और हौसला बढ़ाने वाला कोई तो चाहिए। सिर्फ बच्चे का रिपोर्ट कार्ड और नंबर देखकर कोई धारणा बना लेना, बच्चे के लिए बेहद खतरनाक और निराशाजनक है। जब बच्चे किसी से कह नहीं पाते, तो ऐसे ही कदम उठाते हैं, जिसके बारे में इस बच्चे ने कहा। खबरें आती भी हैं, जहां बच्चे इतने निराश हो जाते हैं कि अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं। तब सिवाय पछतावे के क्या हाथ आता है।
आखिर हम बच्चे को एक ऐसी मशीन क्यों बना देना चाहते हैं, जो हमारी आशाओं पर खरी उतरे। वह हर बार बस सबसे अच्छा करे। असली मुसीबत इस सबसे शब्द में ही छिपी हुई है। यदि तीस बच्चों की कक्षा है, तो क्लास में टॉप तो कोई एक बच्चा ही कर सकता है। सभी टॉप करने लगें, तो टॉप करने का महत्व भी खत्म हो जाए।
यों तो स्कूलों में जाने पर स्टोरी टेलिंग के बीच अनेक बच्चों, अध्यापकों और उनके माता-पिता से मुलाकात होती है। उनके पास ढेरों सवाल और समस्याएं भी होती हैं, जिनमें एक बात एक जैसी होती है, बच्चों के अच्छे नबंर और उनके द्वारा किसी अच्छे कॉलेज, संस्थान में दाखिला और उसके बाद किसी बहुराष्ट्रीय निगम में करोड़ों की नौकरी। यही कारण है कि बच्चों पर लगातार सौ में से सौ नंबर लाने का दबाव रहता है। अच्छे नंबरों के लिए स्कूल से अलग, कोचिंग या ट्यूशन भी जैसे हर बच्चे के लिए जरूरी बना दिया गया है। इन जगहों पर जाने पर बच्चे मुस्कराते, स्वागत करते मिलते हैं, लेकिन उनकी उस मुस्कराहट में भी तमाम तरह की चिंताएं झलकती हैं। इतनी छोटी उम्र में बच्चों की चिंताओं, मुस्कराते हुए भी उनके मुर्झाए चेहरों की तरफ हमारा ध्यान क्यों नहीं जाता?
इम्तिहान के दिनों में अक्सर सरकार की तरफ से बच्चों के लिए हेल्प लाइंस जारी की जाती हैं। यहां काउंसलर्स भी उनकी मदद के लिए होते हैं। लेकिन हर एक बच्चे की पहुंच इन हेल्प लाइंस तक नहीं होती। फिर यह भी है कि घर वालों के प्यार–मनुहार, समझाने से बच्चा जितनी जल्दी सीख सकता है, बाहर के किसी सलाहकार से नहीं। माता-पिता से आग्रह है कि बच्चों को समझें, उनसे बातें करें, डांट के बजाय, उनकी समस्या का हल खोजा जा सके, तो शायद ही किसी बच्चे के मन में ऐसे विचार न आएं कि वह अपना जीवन समाप्त करने के बारे में सोचे। अच्छे नंबर अगर जरूरी हैं, तो बच्चे का जीवन उनसे भी ज्यादा जरूरी है।