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चार धाम की यात्रा एक का इंतजाम

Thu, 20 Jun 2013 10:13 PM IST
गिरीश रंजन तिवारी
गिरीश रंजन तिवारी Updated Thu, 20 Jun 2013 10:13 PM IST
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char dham yatra

उत्तराखंड में आई भीषण प्राकृतिक आपदा ने राज्य के आपदा प्रबंधन की तैयारी सहित यात्रा प्रबंधन, मूलभूत अवस्थापना सुविधाओं तथा ऐसी आपदा से निपटने के लिए राजनीतिक व प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कलई खोल दी है।

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सरकार ने प्रभावितों को मदद देने में हाथ खड़े कर दिए और सारा जिम्मा सेना को संभालना पड़ा है। इस आपदा ने यह भी साफ कर दिया है कि पूर्व की कमियों के साथ ही भविष्य की रणनीति पर भी गंभीर मंथन कर ठोस और व्यावहारिक कदम उठाने का वक्त अब आ चुका है।
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राज्य में खास तौर पर चार धाम यात्रा में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं की भारी कमी को देखते हुए यह जरूरी हो गया है कि कैलाश मानसरोवर यात्रा की तर्ज पर चार धाम यात्रा में भी एक निश्चित संख्या से अधिक श्रद्धालुओं के आने पर प्रतिबंध लगाया जाए। सरकार के अनुसार, इस हादसे में 150 लोग मारे गए हैं।
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हालांकि प्रत्यक्षदर्शियों, स्थानीय निवासियों व हालात के अनुसार मरने वालों का आंकड़ा हजार से ऊपर हो सकता है। स्वयं राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, इस वक्त उत्तराखंड के विभिन्न दुर्गम क्षेत्रों में हजारों श्रद्धालु जहां-तहां फंसे हुए हैं। वर्तमान में इनमें से अधिकांश खुले आकाश के नीचे पड़े हैं, जहां ओढ़ने, बिछाने, खाने-पीने के सामान का अकाल है।

वैसे, आपदा न आने की स्थिति में भी इन यात्रियों के लिए इस मार्ग में सरकार की ओर से कोई सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई है। इस मार्ग पर रहने के लिए जो थोड़े बहुत लॉज व होटल हैं, वे निजी हैं। मार्ग में शौचालय, पेयजल, चिकित्सा सुविधाओं सहित तमाम मूलभूत सुविधाओं का वैसे भी टोटा है। ऐसे में जरूरी सुविधाओं के अभाव में लाखों लोंगों को इन यात्राओं पर भेज दिए जाने का कोई औचित्य नहीं बनता।

सरकार यात्रा मार्गों में सुविधाएं तो विकसित नहीं करती, लेकिन यात्रा का प्रचार खूब करती है, जिससे हर वर्ष यात्रियों की संख्या बढ़ती चली जा रही है। यह संख्या बढ़ने के कारण क्षेत्र में भारी तादाद में भवनों व होटलों का निर्माण हुआ है, जिससे क्षेत्र की पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान हुआ है। वर्तमान हादसे में इन कारणों का भी योगदान है।

विडंबना है कि हर वर्ष इन दिनों राज्य में भारी प्राकृतिक आपदा आने के इतिहास के बावजूद हादसे से निपटने के लिए सरकार के पास न तो कोई रणनीति है, न संसाधन, न प्रशिक्षित राहत कर्मी और न ही मनोबल और इच्छा शक्ति। इसका परिणाम यह है कि सरकार द्वारा बनाए गए आपदा कंट्रोल कक्षों के फोन तक या तो ठप पड़े हैं, या इन पर फोन लगता ही नहीं।

स्वयं सरकार हादसे से इस कदर हतप्रभ और किंकर्त्तव्यविमूढ़ है कि हादसे के तुरंत बाद राहत कार्य करवाने या प्रभावितों की मदद करने के बजाय मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा आपदा राहत मंत्री, आपदाग्रस्त क्षेत्र के विधायक, मुख्य सचिव सहित वरिष्ठ अधिकारियों को लेकर दिल्ली पहुंच गए।

बहरहाल सवाल यह है कि जितने लोगों के लिए यात्रा में किसी प्रकार की कोई सुविधा और इंतजाम नहीं है, उससे सैकड़ों गुना अधिक लोगों को दुर्गम मार्गों से गुजरने वाली यात्रा में क्यों भेजा जाता है। कैलाश मानसरोवर यात्रा की ही तरह इस यात्रा के लिए भी पंजीकरण करवाने तथा सीमित संख्या में ही यात्रियों को यात्रा पर जाने देने की रणनीति बनाने की जरूरत है। इससे किसी हादसे की स्थिति में यह पता रहेगा कि कितने और कौन लोग यात्रा पर हैं।

यात्रियों की संख्या सीमित होने से इस संवेदनशील क्षेत्र में निर्माण, वृक्ष कटान, पर्यावरण प्रदूषण पर भी अंकुश लग सकेगा। इस वर्ष अगस्त में चमोली जिले में प्रत्येक बारह वर्ष में होने वाली नंदा राजजात यात्रा प्रारंभ होने वाली है। नौटी से होमकुंड जाने वाली यह यह पैदल यात्रा बेहद दुर्गम व 17,500 फुट तक की ऊंचाई वाले ऐसे क्षेत्रों से गुजरती है, जहां आवास, भोजन की सुविधा तो दूर मार्ग तक नहीं बना है।


बारह वर्ष पूर्व इस यात्रा में नौटी से पचास हजार यात्री शामिल हुए, जिनमें दस हजार अंत तक भी गए। इस वर्ष इस यात्रा का भी सरकार जमकर प्रचार कर चुकी है, लेकिन मौजूदा घटना से सबक लेते हुए जरूरी है कि सरकार अभी से यात्रियों की संख्या नियंत्रित करने की रणनीति बनाए।

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