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सब्सिडी से संतुलन साधने की चुनौती

Thu, 28 Feb 2013 10:32 PM IST
परंजय गुहाठाकुरता
परंजय गुहाठाकुरता Updated Thu, 28 Feb 2013 10:32 PM IST
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challenge to economic balancing from subsidies

बजट में पी चिदंबरम ने सबको खुश करने की कोशिश की है, जिससे लगता है कि वह कुछ ज्यादा ही आशावादी हैं। उनकी अवधारणाएं वास्तविकता से परे हैं। सब्सिडी को ही लीजिए, इसे वह कम करने की बात कर रहे हैं, मगर ऐसा करना न तो आसान है और न ही व्यावहारिक। हमारे यहां सब्सिडी मूलतः तीन चीजों पर दी जाती है, पेट्रो उत्पादों (पेट्रोल, डीजल एवं केरोसिन), उर्वरक एवं खाद्यान्न।

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सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थों पर दी जाने वाली सब्सिडी को वर्ष 2013-14 में 65,000 करोड़ रुपये पर लाने का अनुमान लगाया है, जो करीब 97 हजार करोड़ के संशोधित अनुमान से 32 फीसदी कम है। जबकि संशोधित अनुमान ही 43,580 करोड़ के बजटीय आकलन से 122 फीसदी ज्यादा है। लेकिन यहीं पर सवाल उठता है कि सब्सिडी को इतना कम कैसे किया जाएगा। ऐसा क्या अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम होने से होगा या फिर पेट्रो उत्पादों के दाम बढ़ाकर? अगर डीजल के दाम बढ़ाए जाते हैं, तो उसका सीधा असर मुद्रास्फीति पर पड़ेगा।
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जहां तक उर्वरक पर दी जाने वाली सब्सिडी का सवाल है, तो उसमें भी सब्सिडी तीन करोड़ कम करने की बात कही गई है। वित्त मंत्री ने अगले वित्त वर्ष में उसे 65,974 करोड़ से घटाकर 65, 971 करोड़ कर दिया है। अगले वित्त वर्ष में खाद्यान्न सब्सिडी के 90,000 करोड़ का अनुमान लगया गया है।
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चूंकि खाद्य सुरक्षा विधेयक यूपीए की महत्वाकांक्षी योजना है, इसलिए उसके लिए अलग से दस हजार करोड़ रुपये देने की बात की है। उन्होंने कुल सब्सिडी को 27 हजार करोड़ रुपये कम करने की बात की है, लेकिन बजट में यह साफ नहीं है कि अगर सब्सिडी घटा दी गई, तो मुद्रास्फीति पर अंकुश कैसे लगाया जा सकेगा? जहां तक मुद्रास्फीति की बात है, तो जनवरी में थोक मूल्य सूचकांक बेशक घटकर 6.58 फीसदी पर आ गया, लेकिन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 10.79 फीसदी था।

इसके अलावा, बेहतर अर्थव्यवस्था के लिए राजकोषीय घाटा कम करना भी एक बड़ी चुनौती है। वित्त मंत्री ने चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 5.2 फीसदी रहने और उसे अगले वित्त वर्ष में घटाकर 4.8 फीसदी पर लाने की बात की है। यह भी एक तरह से वित्त मंत्री का आशावाद ही है।


एक फीसदी सरचार्ज लगाकर अति समृद्ध लोगों पर टैक्स जरूर बढ़ाया गया है, लेकिन आम आदमी को कोई राहत नहीं दी गई है। सवाल उठता है कि ऐसे अति समृद्ध लोगों की संख्या कितनी है? हमारे देश में साढ़े तीन करोड़ लोग टैक्स देते हैं, उन्हें तो टैक्स में कोई राहत नहीं दी गई है। कांग्रेस और यूपीए आम आदमी के साथ होने की बात करती है, मगर लगता तो ऐसा है कि बजट में इस आम आदमी के साथ छलावा ही किया गया है।

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