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अशांत डांग क्षेत्र में विकास की चुनौती, बता रहे हैं सत्यनारायण सिंह

Tue, 10 Nov 2020 02:52 AM IST
सत्यनारायण सिंह सत्यनारायण सिंह
सत्यनारायण सिंह Published by: सत्यनारायण सिंह Updated Tue, 10 Nov 2020 02:52 AM IST
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Challenge of development in the troubled Dang area
बीहड़ में राजस्थान पुलिस - फोटो : अमर उजाला

पूर्वी राजस्थान के चंबल नदी के किनारे स्थित धौलपुर, भरतपुर, करौली और सवाई माधोपुर आदि जिलों का बीहड़ (डांग क्षेत्र) मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के पिछड़े व अशांत क्षेत्र (डांग क्षेत्र) से जुड़ा हुआ है। यह क्षेत्र अपनी भौगोलिक और सामाजिक स्थिति के कारण दस्युओं व अपराधियों की शरण स्थली बना हुआ है। तीनों राज्यों का डांग क्षेत्र नक्सलियों के रडार पर भी है। अनुसूचित जाति, जनजाति तथा पिछड़ी जाति बहुल इस क्षेत्र में रेल व सड़क यातायात के साधन नहीं हैं। विकास से वंचित इस क्षेत्र में हिंसा, हत्याएं, अपहरण, लूटपाट एवं कानून तोड़ने की घटनाएं प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण हैं। अन्य प्रदेशों व क्षेत्रों के अपराधियों की इस शरणस्थली का इस्तेमाल अवैध हथियारों के निर्माण और उन्हें स्टोर करने, अवैध शराब बनाने और तस्करी करने में होता है। यह क्षेत्र बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, सामाजिक कुरीतियों, सामंती एवं साहूकारी शोषण से ग्रस्त रहा है तथा महिलाओं व बच्चों की बिक्री, अवैध खनन, हत्या और लूट-खसोट आम है।


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आजादी के बाद जनता की अज्ञानता का लाभ उठाकर सामंती ताकतें व दबंग कौमें क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती रही हैं। खनिज माफिया द्वारा अवैध खनन बड़ी मात्रा में होता है। पिछड़े लोगों में महिलाओं और बच्चों की खरीद-फरोख्त और बंधुआ मजदूरी का खुला प्रचलन है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अपराध आम है। बहु-पति व बहु-पत्नी प्रथा भी अपराध का एक बड़ा कारण है। अपार खनिज संपदा के बावजूद रेल, सड़क और संचार माध्यमों की कमी के कारण क्षेत्र का औद्योगिकीकरण नहीं हो सका। कृषि योग्य भूमि की कमी के कारण उन्नत कृषि का अभाव है। चंबल जैसी बड़ी नदी के किनारे रहते हुए भी क्षेत्र पेयजल एवं बिजली से वंचित है। ऐतिहासिक धरोहर खंडहर और अपराधियों की शरण स्थली बन गए हैं।

खनन क्षेत्र में  सिलिकोसिस, टीबी जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। कई स्थानों पर औसत उम्र बहुत कम है, तो अनेक छोटे-छोटे गांवों में मात्र विधवा स्त्रियां रह रही हैं। सरकारी भूमि पर अवैध खनन होने से खनन माफिया और दस्यु एक दूसरे से जुड़ गए हैं। डाकुओं को शरण, सुरक्षा, भोजन और पुलिसिया गतिविधियों की सूचना देना तथा उनके छिपने व भागने में मदद करना आम है। दस्यु समस्या के कारण क्षेत्र का विकास रुका है। लोग नए उद्योग व व्यवसाय लगाने से डरते हैं। डांग क्षेत्र में पुलिस बल की ज्यादा जरूरत होने के बावजूद संख्या कम है। नाकारा पुलिसकर्मियों की पोस्टिंग की जाती है, जो दस्युओं के मददगार होते हैं। 

यहां पुलिस चेक पोस्टों की कमी है तथा पुलिसकर्मी अपने हथियार सुरक्षित नहीं रख पाते। अपराध रोकने के लिए खुफिया तंत्र भी मजबूत नहीं है। डांग क्षेत्र के विकास के लिए विशेष नीति बनानी होगी। पुलिस व राजस्व आदि महकमों में पदस्थापन नीति में बदलाव होना चाहिए। नए थानों, चेक पोस्टों व उनमें पर्याप्त पुलिसकर्मी तथा बिजली, कंप्यूटर, ई-मेल, इंटरनेट आदि की जरूरत है। शिक्षा, पेयजल, सिंचाई, बिजली, सड़क परिवहन और संचार के बुनियादी ढांचे हेतु विशेष प्रावधान होना चाहिए। यहां जाति पंचायतों का बोलबाला है। डाकुओं को चौथ वसूली व अपनी जाति में प्रभाव जमाने का मौका मिल रहा है। 

जाति आधारित भ्रष्ट अधिकारी एवं कर्मचारी अवैध खनन को प्रश्रय देते हैं। राज्य सरकार ने बजरी भराई आदि खनन के छोटे मामलों में भी पड़ोसी राज्यों की नीति को ध्यान में रखकर नई नीति नहीं बनाई। वैध खनन पर रोड़े अटकाए जाते हैं। प्राकृतिक व पर्यावरण आधारित पर्यटन परियोजनाएं विकसित नहीं की गईं। मध्य प्रदेश सरकार की तरह बीहड़ों को समतल कर कृषि योग्य बनाना आवश्यक है। राजस्थान की गहलोत सरकार ने इस कार्यक्रम को स्वीकार कर जिलाधीशों को धनराशि उपलब्ध कराई, ताकि बीहड़ अपराधियों की शरण स्थली न बन सके, भूमिहीनों को खेती की जमीन मिले और वैध खनन व नए उद्योग शुरू किए जा सकें। पर शुरुआत में ही इस योजना पर अमल करना रोक दिया गया। क्षेत्र में योजनाबद्ध तरीके से विकास कार्य नहीं किया गया, तो कानून-व्यवस्था की स्थिति और खराब होगी। 
 

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