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वर्षों की रणनीति से बना चक्रव्यूह : मोदी की सभाओं में आई भीड़ का मुकाबला कोई नेता नहीं कर सकता
Wed, 05 Jun 2019 06:12 AM IST
Raman Singh
प्रदीप कुमार
प्रदीप कुमार
Published by: Raman Singh
Updated Wed, 05 Jun 2019 06:12 AM IST
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
- फोटो : amar ujala
लोकसभा चुनाव में भाजपा की दूसरी महाविजय के बाद कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने जवाहर लाल नेहरू और नरेंद्र मोदी में साम्य ढूंढने की कोशिश की है। साम्य मुख्य रूप से लोकप्रियता तक सीमित है। आज मोदी की सभाओं में जुटने वाली भीड़ का मुकाबला कोई विपक्षी नेता नहीं कर सकता। यहां एक घटना का जिक्र जरूरी है।
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नवंबर 1949 के पहले हफ्ते में मुंबई के शिवाजी पार्क में सर संघचालक माधवराव सदाशिव गोलवलकर ने सभा की थी, जिसमें प्रेस रिपोर्टों के मुताबिक एक लाख श्रोता थे। एक हफ्ते के बाद नेहरू ने उसी पार्क में छह लाख लोगों को संबोधित कर 'हिंदू उग्रवाद' पर चोट की, सेक्युलर राजनीति की अनिवार्यता को रेखांकित किया और भारतीय जनसंघ को आरएसएस की 'नाजायज औलाद' बताया।
अब मोदी सूद सहित अच्छा रिटर्न दे रहे हैं। नेहरू के आख्यान पर मर्मांतक प्रहार किए जा रहे हैं। नेहरू जिन मूल्यों के लिए लड़ते रहे, उनकी रक्षा करने वाले शिथिल हैं। खुद कांग्रेस वैचारिक स्तर पर बिखराव से ग्रस्त है। यह नियति थी या अनिवार्य परिणति? यह सही है कि महात्मा गांधी ने सर्वाधिक प्रिय शिष्य नेहरू को अपना राजनीतिक वारिस घोषित किया था और लौह पुरुष सरदार पटेल ने इसे स्वीकार भी किया था।
लेकिन कल्पना करें,1950 में पटेल के बजाय नेहरू का निधन हो गया होता और पटेल प्रधानमंत्री बन जाते। जिस कांग्रेस वर्किंग कमेटी में नेहरू विरोधियों की खासी संख्या थी और जिससे बात मनवाने के लिए उन्हें इस्तीफे तक की धमकी देनी पड़ी, उसकी पौ बारह हो जाती। ऐसे में कांग्रेस और भारतीय राजनीति की दिशा की कल्पना आसानी से की जा सकती है।
नेहरू का आख्यान निजी भी था और करोड़ों भारतीयों का भी। लेकिन उसके समानांतर एक और आख्यान भी चल रहा था। वरिष्ठ प्रचारक एकनाथ रानाडे के नेतृत्व में विवेकानंद शिला स्मारक निर्माण से पहले कांग्रेसी नेताओं के नेतृत्व में सोमनाथ मंदिर का निर्माण हो चुका था। संघ परिवार के नेता तो अब अनुसूचित जाति वालों के पैर धो रहे हैं, नेहरू के ही समय में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद वाराणसी में पंडितों के पैर धोने जा रहे थे। गोवध पर संपूर्ण रोक के लिए 1965 में संसद पर हिंसक प्रदर्शन से पहले ठीक यही मांग कांग्रेस के अंदर से भी उठ रही थी।