त्योहार: गौरवबोध का दिन है दीपावली... लक्ष्मी का उपयोग होता है, उपभोग के दुस्साहस पर रावण जैसी दुर्गति
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विस्तार
दीपावली भारतीय मनोभूमि से प्रकट हुआ ऐसा अनोखा पर्व है, जिसका संबंध रोशनी से है। रोशनी शब्द ईरानी है, पर इसका मूल संस्कृत रूप रोचना है, जिसका तात्पर्य है द्युति। इससे माता लक्ष्मी का एक नाम रोचनावती पड़ा। रोशनी से भारत का सनातन संबंध है। ऋग्वेद का आरंभ अग्नि शब्द से हुआ है, जो प्रकाश का मूर्तिमान स्वरूप है। इससे ही दीपों की माला के त्योहार का सृजन हुआ है। दीपावली शब्द दो शब्दों से बना है दीप और आवलि, जिसका अर्थ है दीपों की पंक्ति। दीपावली मिट्टी से बने दीपों का पर्व है, जिन्हें मानव ने अपनी कर्म साधना से बनाया है। दीप वैदिक यज्ञ संस्कृति का लघु स्वरूप है। यह दीप वास्तव में माता लक्ष्मी का मुख है। दीपावली में अनेक धर्म-साधनाएं, विश्वास और आचार पद्धतियां अपनी स्मृतियां बनाए हुए हैं। दीपावली की रात पूजी जा रहीं माता लक्ष्मी वेद-पुराणों के साथ ही बौद्ध साहित्य में आचार्या, भगवती, भट्टारिका और महाचार्यश्री विशेषणों के साथ उपस्थित हैं। यक्षपूजा से बौद्ध और शाक्त मार्ग में ‘श्री-सुंदरी’ की साधना का प्रवेश हुआ है और यक्ष संस्कृति के दीपदान का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन ही दीपावली है।
भारतरत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे ने धर्मशास्त्र का इतिहास में दीपावली के सुखरात्रि, यक्षरात्रि तथा सुखसुप्तिका नाम लिखे हैं। यह किसी देव या देवी के सम्मान में किया गया केवल एकदिवसीय उत्सव नहीं है, बल्कि पांच दिनों तक चलता है और इसमें अनेक कृत्य संपादित होते हैं। धन पूजा, नरक चतुर्दशी, हनुमान जयंती, अन्नकूट तथा भाईदूज। इनमें सबसे खास है भगवती महालक्ष्मी की पूजा। लक्ष्मी जी का संबंध मात्र धन से ही नहीं, बल्कि उनकी पवित्रता से भी है, क्योंकि लक्ष्मी अशुद्ध, अपवित्र और अप्राकृतिक से कभी नहीं जुड़ती। लक्ष्मी भगवान नारायण के साथ प्रतिष्ठित हैं। शास्त्रों में वे श्री, शोभा, समृद्धि और सौभाग्य के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वात्स्यायन के कामसूत्र में दीपावली ‘यक्ष-रात्रि’ है। यक्ष-रात्रि से तात्पर्य है कि इस दिन यक्षराज कुबेर की पूजा होती थी। दीपावली के साथ यक्षों के जुड़ने का तात्पर्य ऋग्वेद के श्रीसूक्त से स्पष्ट है। इसके एक मंत्र में ‘मणिना सह’ शब्द का प्रयोग है, जिसका संबंध यक्षों द्वारा किए जाने वाले ‘मणिभद्र यज्ञ’ से है। महाभारत में मणिभद्र एक यक्ष हैं, जो यक्षस्वामी कुबेर के साथ वर्णित हैं। यक्षों से संबंध होने से कामसूत्र ने दीपावली को यक्ष रात्रि कहा है।
शास्त्र दीप को निर्जीव नहीं, वरन देवता मानते हैं-भो दीप देवरूपस्त्वम्...। दीप के देवता में परिवर्तित हो जाने का एक सुंदर इतिहास है। पुराकाल में अग्नि को बचाए रखने के तमाम उपायों में दीप सबसे आसान तरीका था। वह सहारा था जीवन का और लौकिक व्यवहारों का। आचार्य यास्क के अनुसार, ‘भरत’ का अर्थ आदित्य है और उससे उत्पन्न प्रजा ‘भारती’ है। इस प्रकार भारत शब्द का अर्थ है सूर्य संतान यानी प्रकाश की प्रजा। हमारे देश भारत का मतलब ही प्रकाश में रत है, जो प्रकाशोत्सव मनाता है। वेद कहते हैं कि माता लक्ष्मी सुखी दांपत्य, स्वादिष्ट अन्न, लहलहाती फसल तथा गौ माता से जुड़ी है। दीपावली मनुष्य के लिए गौरव बोध का पर्व है। आचार्य कुबेरनाथ राय दीपावली को मनुष्य के हाथों अंधकार पर विजय की रात्रि मानते हैं। धरती की बेटी माता सीता के सगे भाई हैं ये दीप। लक्ष्मी का उपयोग होता है, उपभोग नहीं। जो उसके उपभोग का दुस्साहस करता है, वह रावण जैसी दुर्गति को प्राप्त होता है।