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सीबीआई की अंग्रेजी सुधारने वाले
राजेंद्र शर्मा
Updated Wed, 24 Apr 2013 10:44 PM IST
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घोटाला कोल ब्लॉक आवंटन का और सफाई की मांग कानून मंत्री से, यह तो विपक्ष की ज्यादती है। कोयला मंत्री पर बस नहीं चला, तो लगे कानून मंत्री पर दबाव बनाने।
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बेचारे का कुसूर ही क्या है? यही न कि बेचारे ने कोयला घोटाले पर सीबीआई जांच रिपोर्ट की अंग्रेजी दुरुस्त कर दी।
एक रिपोर्ट में दस-बीस जगह हिज्जे सही करने और व्याकरण की छोटी-मोटी गलतियां दुरुस्त करने की इतनी बड़ी सजा! अंग्रेजी से बैर निकालने का यह कैसा तरीका है?
कुछ चतुर सुजान कह रहे हैं कि कानून मंत्री अति-उत्साह में यानी ज्यादा वफादारी दिखाने के चक्कर में मारे गए। वर्ना उन्हें ही नक्कू बनने की क्या जरूरत थी? पर नहीं लगता कि यह सच है।
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घोटाला भले ही सामूहिक क्रिया न हो, पर घोटाले के आरोपों से सरकार को बचाना तो मंत्रियों की सामूहिक जिम्मेदारी है। और केवल घोटाले से बचाना ही क्यों, सरकार की छवि को बिगड़ने से बचाना भी मंत्रियों की सामूहिक जिम्मेदारी है।
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सीबीआई सरकार की भले न सुने, पर सरकार को सीबीआई के लिए सारी दुनिया के बोल सुनने पड़ते हैं। जरा सोचिए, अगर सीबीआई ने अपनी गलत-सलत अंग्रेजी में सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट दे दी होती, तो सरकार की कितनी हंसी उड़ती? और जो कहीं अंग्रेजी की गलती की वजह से अदालत कुछ का कुछ समझ बैठती, तब तो भगवान ही मालिक था!
हम भी मानते हैं कि कानून मंत्री का अपनी ही सरकार के खिलाफ घोटाले के आरोपों की सीबीआई जांच को प्रभावित करना सही नहीं है। लेकिन, सिर्फ बैठक करने या मिलकर बैठने-बतियाने में बुराई ही क्या है? अगर इस पर भी आपत्तियां होने लगीं, तब तो बेचारे काम के अभाव में बैठे के बैठे ही रह जाएंगे। वैसे भी कोयले का मामला होता ही कालिखमय है।
कोयले से हाथ काले करने के लिए उसकी दलाली करने की जरूरत नहीं होती। कालिख लगवाने के लिए तो कोयले की कोठरी में जाना ही काफी होता है। वहां अंग्रेजी सुधारते बैठने वालों का तो कहना ही क्या? और सरकार कोयले की कोठरी से कम तो किसी भी तरह नहीं होती।
सो कोयले की कोठरी में रहकर यहां-वहां कालिख लगने की परवाह क्या करना! पर देश के चेहरे पर गलत अंग्रेजी की कालिख लग जाए, इसकी इजाजत हर्गिज नहीं दी जा सकती।
देश को कालिख लगने से बचाने के लिए एक मंत्री को अपने चेहरे की जरा-सी सफेदी कुर्बान भी करनी पड़ जाए, तो क्या गम है!