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यूरोपीय सभ्यता के नात्रो दाम की कहानी: खंडित युग में एक गिरजाघर का जलना

रोजर कोहेन Updated Thu, 18 Apr 2019 06:46 AM IST
नात्रो दाम कैथेड्रल
नात्रो दाम कैथेड्रल
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पेरिस का नात्रो दाम, वह जगह है, जहां से फ्रांस में दूरियां मापी जाती हैं, जिसका लोग आरंभ या अंत के रूप में संदर्भ देते हैं, जैसा कि राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां इसे फ्रांस का प्रमुख केंद्र कहते हैं। यही वजह है कि बहुत से लोग, चाहे वे धार्मिक हों अथवा नहीं, इस महान गिरिजाघर के जलने पर रो रहे थे। उन्हें अपना खुद का एक हिस्सा जलता हुआ महसूस हुआ।
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इसे पादरी विरोधी उन्माद में क्रांति के दौरान लूटा गया और 19वीं शताब्दी में पुनर्निर्माण कर फिर से इसे बहाल किया गया। शाही राज्याभिषेक, राष्ट्रीय मुक्ति और राष्ट्रपतियों की अंत्येष्टि स्थल के रूप में यह एक तरह से राष्ट्र की आत्मा बन गया। यह ऐसी जगह है, जहां फ्रांस ने अपने उतार-चढ़ाव से भरे राजतंत्रीय तथा गणतंत्रात्मक और धार्मिक तथा धर्मनिरपेक्ष अतीत को सहेज रखा है।
   
शताब्दियों से यह गिरिजाघरों का प्रतिनिधित्व करता रहा है। पेरिस में जन्मे और पले-बढ़े कलाकार क्लेयर इल्यूज कहते हैं, वक्त ने कैथेड्रल को फ्रांस के भीतर और बाहर हर किसी के लिए यादों की खान बना दिया। यह हम सभी के लिए यादों का एक खजाना है। आखिर फ्रांस है क्या? सुंदरता। इस सुंदरता को जलते हुए देखना खौफनाक था। आठ सौ साल पुरानी बीम पर टिका शानदार शिखर जहन्नुम में गिर गया। यहां मानव जाति की सबसे अच्छी चीजें थीं, ऐसी अभिव्यक्ति मानो अलौकिक हों, और सब धुएं में विलीन हो रही थीं।

मानव जीवन के नुकसान को देखना भयानक होता है, लेकिन सौंदर्य का विनाश देखना उससे कम भयावह नहीं होता। बेचैनी, भौंडेपन, नफरत और झूठ के इस समय में यह ज्वाला अपशकुनी लगी। जॉन कीट्स ने लिखा है-'सुंदर ही सत्य है, सत्य ही सुंदर है' और यह कि 'आप सभी को इसे जानने की जरूरत है।'

पेरिस में रहने वाली एक मित्र साराह क्लीवलैंड ने मुझे लिखा-'सब कुछ अजीब तरह से शांत और स्थिर नजर आ रहा था, मानो लोग समाधि में हों और देगची की तरह कैथेड्रल के भीतर आग को उबलते हुए देख रहे हों। वह दृश्य ऐसा था, मानो सब प्रार्थना में लीन हों। कोई चीज, जो इतनी यादगार हो, वह इतनी नाजुक भी हो सकती है, यह कल्पना ही असंभव लग रही थी।'

सभ्यता नाजुक है, लोकतंत्र नाजुक है, कैथेड्रल की मीनार की तरह। इसे नजरंदाज करना आज असंभव है, ऐसा करना वाकई बहुत खतरनाक हो सकता है। जब एक सार्वभौमिक संदर्भ धुएं में विलीन हो जाता है, तो एक रसातल खुलता है।

मुझे इसके विशाल आंतरिक भाग की शीतलता की याद आ रही है। यह तब की बात है, जब 1976 में मैं पहली बार पेरिस में रह रहा था। लू चल रही थी। नदियां सिमट गई थीं, झरने सूख गए थे, दुकानों में पानी की बोतलें खत्म हो गई थीं। लोग स्तब्ध होकर तमाशबीन बने बैठे थे। कुछ लोग प्रार्थना कर रहे थे। बच्चे खेल रहे थे। बूढ़े और जवान, मासूम और ज्ञानी लोग इकट्ठा थे। प्रवेश द्वार के ऊपर गुलाबी खिड़कियों के शानदार शीशे से छनकर नीली रोशनी आ रही थी। हवा में पत्थर और मोमबत्ती की खुशबू घुली हुई थी।

वहां की पवित्रता ने मुझे अपने में समाहित कर लिया। ऐसे समय में, जब अमेरिकी राष्ट्रपति शरणस्थलों पर थूकते हैं और दंड स्वरूप गरीब प्रवासियों को उन शहरों में फेंकना चाहते हैं, जो उन्हें उनके नाम से बुलाने की हिम्मत रखते हैं, नात्रो दाम ऐसा ही एक शरणस्थल है। आधे जले कैथेड्रल को पहली बार मैंने युवावस्था में देखा था। इसके द्वीप पुलों के अगले हिस्से का संकेत करते हैं, उसकी धमनियों पर नात्रो दाम ने लंगर डाला। कैथेड्रल हमेशा से सीन नदी के पार आश्वस्त करता है, इसका आगे का हिस्सा जुड़वां स्तंभों की तरह प्रभावशाली है। इसका पार्श्व भाग उड़ते हुए टेक और परनाले की तरह है, आप चाहे जिस कोण से भी देखें, यह चिरस्मरणीय है।

जलने के बाद भी 'अवर लेडी ऑफ पेरिस' (नात्रो दाम) अपने स्तंभों के साथ अब भी वहां मौजूद है, भले उसका ऊपरी हिस्सा न बचा हो। फ्रांस के राष्ट्रपति मैंक्रां ने गिरिजाघर के पुनर्निर्माण की कसम खाई है। उसके लिए पैसा बरस रहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति ने गरिमापूर्ण आचरण दिखाया, जिससे गरिमा की ताकत का ऐसे समय एहसास हुआ, जब व्हाइट हाउस से यह गायब हो चुकी है।

मैक्रां ने कहा, नात्रो दाम हमारा इतिहास है और हमारी काल्पनिकता है, दूसरे शब्दों में यह उन सभी के लिए याद करने लायक और प्रेरणास्पद है, जो आत्म से परे उत्कृष्टता की आकांक्षा रखते हैं। स्वयं को ही सब कुछ समझने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नात्रो दाम की आग बुझाने के लिए 'फ्लाइंग वाटर टैंकर' भेजने का सुझाव दिया था। उनकी सलाह की अनदेखी कर दी गई। शायद एक अमेरिकी के लिए नात्रो दाम से करीबी चीज अपने राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने की शक्ति में है। स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी भी एक फ्रेंच शिल्पकार का ही काम है।

खैर, इसे इस जादुई नतीजे के साथ अन्य दिनों के लिए छोड़ दें, कि स्वतंत्रता की जो मशाल हवा में तैर रही थी, जाहिर तौर पर अलग हो गई। मुझे याद नहीं आता कि फ्रांसीसी सभ्यता अपने जीवन में कब मुझे इतनी महत्वपूर्ण लगी। आने वाले हफ्तों में जैसे ही शोक खत्म होगा, इस पर बहुत खराब बहसें होंगी, इस बात पर कि कौन जिम्मेदार था, कैसे यह घटना हुई, कौन-सी लापरवाही बरती गई।

लेकिन पेरिस की सड़कों पर उन मूक, श्रद्धेय, प्रार्थना करने वाले लोगों की भीड़ में मुझे वह संभावना भी दिखी, जब सभी फ्रांसवासी केवल कैथेड्रल ही नहीं, बल्कि पीली जर्सी वाले आंदोलन की हिंसा और उसकी वजह से हुए विभाजन से पीड़ित राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए एकजुट होंगे। नात्रो दाम की कहानी धीरज और पुनर्जन्म की कहानी है। यह यूरोपीय सभ्यता की भी कहानी है। नात्रो दाम हिटलर से बच गया। यह इतना नाजुक था, जिसका एहसास अब हुआ है, इसलिए यूरोप को इस समय एकजुटता दिखाने की जरूरत है।  
 

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