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नौकरशाही की बेरुखी भी महंगाई की वजह

Tue, 26 Jul 2016 06:59 PM IST
उमेश चतुर्वेदी
उमेश चतुर्वेदी Updated Tue, 26 Jul 2016 06:59 PM IST
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bureaucratic indifference is also responsible for inflation
उमेश चतुर्वेदी

दालों और सब्जियों के दामों में लगातार जारी तेजी ने आम आदमी की थाली को बेस्वाद बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अच्छे दिन लाने का वायदा भी पीछे छूटता नजर आ रहा है। ऐसे में आम लोगों का परेशान होना स्वाभाविक है। शायद यही वजह है कि अब केंद्र सरकार को राज्यों को कहना पड़ रहा है कि जरूरी चीजों की कीमतों पर काबू करने के लिए राज्य आवश्यक वस्तु अधिनियम के जरिये दालों और कुछ सब्जियों की मूल्य नीति तय करे। केंद्र चाहता है कि राज्य सरकारें स्थानीय करों से जरूरी जिंस को छूट दें, ताकि कीमतें स्थिर रह सकें और आम आदमी की थाली सजी रहे।

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मोदी सरकार के इस आदेश को आम आदमी को सहूलियत की दिशा में बेहतर कदम बताया जा रहा है। लेकिन खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर नजर रखने वाले बाजार के जानकारों को इस आदेश के जरिये कीमतें काबू में रखने को लेकर संदेह है। इसकी वजह नौकरशाही की वह सोच है, जो अपने पारंपरिक सामंती सोच के दायरे से बाहर नहीं निकल रही है। हाल ही में एक अनौपचारिक बैठक में केंद्र सरकार के एक जिम्मेदार नौकरशाह ने टमाटर की कीमतों में आई तेजी को लेकर मानसून की सक्रियता के साथ ही आम लोगों की मौजूदा सोच को भी जिम्मेदार ठहराया था। उनका कहना था कि लोग पचास लाख से लेकर करोड़ों के फ्लैट में रह रहे हैं, लेकिन उन्हें टमाटर महंगा लग रहा है। हालांकि ऐसा कहते वक्त वे भूल गए कि इस देश में अब भी करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें कायदे से सिर पर छत मयस्सर नहीं है। यूपीए सरकार के दौरान बढ़ती महंगाई को लेकर भी उसके कर्णधार ऐसे ही तर्क देते थे।
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भारतीय अतीत में अल्लाउद्दीन खिलजी पहला शासक था, जिसने दामों को नियंत्रित किया था। आजादी के बाद डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने भी दाम बांधो नीति लागू करने का सुझाव दिया था। बहरहाल कल्याणकारी राज्य के समाजवादी अवधारणा वाले दौर में जब ऐसा नहीं हो सका, तो अब तो उदारवादी अर्थव्यवस्था है।
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महंगाई बढ़ने को लेकर अधिकारी एक ही तर्क देते हैं, आधुनिक बाजार के सिद्धांत के मुताबिक मांग और आपूर्ति के बीच अंतर का। बेशक देश को 22-23 लाख टन सालाना दाल की जरूरत है और उसका उत्पादन महज 17 लाख टन के करीब ही है। लेकिन एक और वजह है, जिसकी वजह से कीमतें चढ़ने लगती हैं। जब भी डीजल या पेट्रोल का दाम बढ़ाया जाता है, बढ़े दामों की तुलना में ट्रकों के जरिए माल-ढुलाई का खर्च बढ़ जाता है और उसका सीधा असर जिंस की खुदरा कीमतों पर दिखने लगता है। अगर डीजल की कीमत में सिर्फ एक रुपया प्रति लीटर की बढ़ोतरी होती है, तो सब्जियों की कीमतें पांच रुपये प्रति किलो तक बढ़ जाती है। जमीनी स्तर पर इसका फायदा किसानों को नहीं मिलता। दुर्भाग्यवश भारतीय नौकरशाही को इसकी जानकारी नहीं है या जानकारी है भी, तो वह इस प्रवृत्ति पर लगाम लगाने की कोशिश नहीं करती।


राष्ट्रीय राजमार्गों पर लग रहे टोल टैक्स ने भी जिंसों की कीमतों को बढ़ाने में योगदान दिया है। बेशक राजमार्गों के लिए इसके जरिये पैसे जुटाना जरूरी है, लेकिन सरकार को इस बारे में भी विचार करना चाहिए कि वह राजमार्गों के जरिये जरूरी जिंसों की आपूर्ति के लिए या तो शुल्क में छूट दे या फिर उसे माफ करे। इसके साथ ही सबसे ज्यादा जरूरी जमाखोरों पर लगाम लगाना है। इसके लिए राज्य और केंद्र सरकारें गंभीरता से राजनीति से दूर होकर साथ-साथ काम करें।

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