बोझ बनती परवरिश
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विकसित देशों में यह सोच आम है कि परिवार में बच्चा आता है, तो अपने साथ खर्च लेकर आता है। जबकि भारत में बच्चे के जन्म को परिवार की खुशी से जोड़ा जाता था। अब हमारे यहां भी बच्चों को जन्म देना इतना आर्थिक बोझ लगने लगा है कि बड़े शहरों के लोग एक से ज्यादा बच्चे के इच्छुक नहीं हैं। यह नया चलन हाल में औद्योगिक संगठन एसोचैम के एक सर्वेक्षण से भी साबित हुआ है। देश के दस बड़े शहरों में डेढ़ हजार कामकाजी महिलाओं से उनकी आर्थिक हैसियत के बारे में ये विवरण एसोचैम सोशल डेवलपमेंट फाउंडेशन ने जुटाए हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि 35 फीसदी महिलाएं परवरिश पर ज्यादा ध्यान की मांग और भारी खर्च के कारण सिर्फ एक बच्चे की हिमायती हैं। घर और दफ्तर में बेहतर प्रदर्शन का दबाव और करियर पर ध्यान देने की अपेक्षाओं के मुताबिक महिलाओं को सीमित परिवार जरूरी लगने लगा है। इस सर्वेक्षण में हालांकि यह साफ नहीं है कि एक बच्चे वाली मांओं में कितनी ऐसी हैं, जिनकी इकलौती संतान लड़की है। अब बेशक लोग लड़कियों को अहमियत देने लगे हैं, पर जिस परिवार में पहली संतान लड़की होती है, वहां महिलाओं पर दूसरा बच्चा यानी लड़का पैदा करने का पारिवारिक-सामाजिक दबाव होता है।
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एकल बच्चे का दबाव विकसित मुल्कों में भी है। ब्रिटेन में विगत अप्रैल में रॉयल जोड़े प्रिंस विलियम्स और केट मिडलटन के यहां तीसरी संतान हुई, तो सोशल मीडिया पर टिप्पणियां की गईं कि तीन बच्चे पैदा कर उनकी परवरिश करना तो अब सिर्फ शाही परिवारों के बूते की बात है। दरअसल उसी समय ब्रिटेन में सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स ऐंड बिजनेस रिसर्च (सीईबीआर) ने एक सर्वेक्षण कराया था, जिसमें पता चला कि वहां जन्म से 21 की उम्र तक एक बच्चे की मूलभूत जरूरतों पर खर्च 2.3 करोड़ रुपये है। तीन बच्चों पर यह खर्च करीब सात करोड़ रुपये है। ब्रिटेन में एक औसत मध्यवर्गीय परिवार की सालाना आमदनी करीब 30 लाख रुपये है। ऐसे परिवार भी अब एक से ज्यादा बच्चे के बारे में नहीं सोचते। भारत में भी 30 लाख की सालाना आय वाले परिवारों में एकल बच्चे की धारणा मजबूत हो रही है। हालांकि कुछ साल पहले एक सर्वेक्षण में कहा गया था कि बच्चों की परवरिश के मामले में भारत कई देशों से बेहतर है, क्योंकि यहां खर्च कम है।
पर अब भारत भी इस मामले में विदेशों से होड़ करने लगा है। अभिभावक बच्चों की इच्छाएं पूरी करने के लिए काफी खर्च उठा रहे हैं। उन्हें लगता है कि जो चीजें उन्हें उनके बचपन में हासिल नहीं थीं, उनका बच्चा उन चीजों से वंचित न रह जाए। इसके लिए वे बच्चे की पढ़ाई-लिखाई और ट्यूशन-कोचिंग ही नहीं, खानपान, महंगे जूते-कपड़े, मोबाइल फोन, गेमिंग गैजेट, पिज्जा-बर्गर, फिल्म और खेलकूद की ट्रेनिंग आदि पर बेतहाशा खर्च कर रहे हैं। कई मामलों में यह खर्च एक औसत मध्वर्गीय परिवार की आधी आय से ज्यादा है। ऑनलाइन शॉपिंग, हर हफ्ते शॉपिंग मॉल जाकर फिल्म देखना, खरीदारी करना, महंगा भोजन करना, फिटनेस के जरूरी उपकरण खरीदना और जिम जाना भी उनकी नई मांगों में शामिल है। अभिभावक दूसरा बच्चा पैदा करने के बजाय एकल बच्चे पर बेइंतहा खर्च करना बेहतर समझते हैं।
पर जब ये बच्चे लंबे समय तक बेरोजगार रहते हैं, तो अकेलेपन के अलावा उन सपनों के बोझ को अपने सीने पर महसूस करते हुए दबाव के कारण अवसाद में घिर जाते हैं, जो मां-बाप ने उनके तमाम खर्चे उठाते हुए देखे थे। सोचना होगा कि देश में बढ़ते अवसाद और आत्महत्याओं की घटनाओं की असली वजह यह बदलाव तो नहीं है।