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जेब काटने का बहाना चाहिए
मूलचंद गौतम
Updated Wed, 03 Apr 2013 12:20 AM IST
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हमारे यहां राज करने आए अंग्रेजों ने जान-बूझकर आय-व्यय का लेखा-जोखा अप्रैल से शुरू किया। उन्हें मालूम था कि भारत के लोग फागुन में बौरा जाते हैं। ऐसे में, वसंत पंचमी से लेकर मदनोत्सव तक इन बैशाखनंदनों की जेब मजे से काटी जा सकती है। किसी बिना बौराए चतुर को फिरंगियों की चाल का पता चल भी जाए, तो उसका रामबाण है-बुरा न मानो होली है।
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पद्माकर की गोपियों ने सोलह कलाओं में प्रवीण कृष्ण को ऐसे ही बेवकूफ बनाया था-लला फिरि आइयो खेलन होरी कहकर बेवकूफ बनाया ही था। छछिया भरि छाछ पे नाच नचाना क्या कोई मामूली कला है!
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बजट भी ऐसी ही कला है-कुछ न देकर सब कुछ लूट लेना। अब इस नए साल यानी वित्त वर्ष से हमारी-आपकी जेब कुछ और कटनी शुरू हो ही गई है। हम कभी नागिन की धुन सुनते ही सुध-बुध खो बैठते थे। अब बजट के नाम पर भी हम इसी तरह बेसुध हो जाते हैं।
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विदेशी निवेश के नाम पर हमारी सरकारें ऐसी-ऐसी करार कर रही हैं कि उनकी गोपनीय शर्तें तब खुलेंगी, जब सब कुछ लुट चुका होगा। हम तब भी नाच-नाचकर गाएंगे-बलि जाऊं लला इन बोलन की!
दरअसल इतनी भारी आबादी को लंबे समय तक मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। इसलिए हर रोज नई तरकीबें अपनानी पड़ती हैं। हमारी सरकार ने अंग्रेजों से और कुछ सीखा हो या नहीं, यह कला बहुत अच्छी तरह सीख ली है। फिर परेशान होने की जरूरत क्यों, टेलीविजन है न! ज्योंही कोई परेशानी खड़ी होती है, हम आम आदमी को बॉबी टाइप की कोई नई फिल्म दिखा दी जाती है।
क्रिकेट मैच तो ऐसी अचूक दवा है कि एनीस्थिसिया भी फेल। इस किस्म की कलाबाजी में बुद्धू बक्सा बड़े काम का साबित होता है। बच्चे तो बच्चे बूढ़े तक विज्ञापनों के दीवाने हो जाते हैं। सदी का महानायक तक चूरन-चटनी -तेल-फुलेल बेचता दिख जाता है। इन तमाम मनोरंजनों के बावजूद अगर कोई अन्ना हजारे बनने पर आमादा है, तो वह जंतर-मंतर पर मोमबत्ती जलाने को आजाद है।
बाकी देश की ज्यादातर आबादी तो खुश है। गांव के लोग शहरों की बड़ी-बड़ी सोसाइटियों में रहने लगे हैं। महानगरों के लोग चांद और मंगल पर जाने का प्लान बना रहे हैं। केवल हमीं हैं, जो इस नरक को भाग्य समझकर खुश हैं। अपना वित्त वर्ष तो दिवाली को आएगा। यह नया वित्त वर्ष आप ही को मुबारक हो।