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बजट 2023: पाठ में संदर्भ की उपेक्षा, जानिए क्या सवाल उठा रहे हैं चिदंबरम

Sun, 05 Feb 2023 06:12 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 05 Feb 2023 06:12 AM IST
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सार
मंत्रालयों (जैसे, रेलवे और सड़क) की बाधाओं और अवशोषण क्षमता को अनदेखा करते हुए, वित्तमंत्री ने 10,00,961 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं! यहां तक कि पूंजीगत व्यय के पैरोकार भी बौखलाए हुए हैं।
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Budget 2023: Ignoring the context in the text, article by Chidambaram
Union budget 2023 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

2022-23 में पूंजीगत व्यय के लिए आवंटित धन को खर्च करने में नाकाम रहने के बाद वित्त मंत्री ने 2023-24 में पूंजीगत व्यय 33 फीसदी तक बढ़ा दिया, तो सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के खर्च में निर्ममता से कटौती करने के बाद गरीबों को आश्वस्त करना चाहा है कि उनका कल्याण सर्वोपरि है।  



पिछला हफ्ता बजट की चर्चाओं में बीता। केंद्रीय बजट अब एक वित्तीय वर्ष में केंद्र सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और खर्च के वार्षिक विवरण से अधिक मायने रखता है। अब यह लोगों को सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों से अवगत कराने का मुख्य साधन है। लोग अब विशेष प्रस्तावों के साथ ही संकेतों को समझने के लिए बजट देखते हैं।


बेजुबान अब भी हालांकि बेजुबान ही रहेंगे। सरकार के नीति निर्माताओं तक उनकी कोई पहुंच नहीं है और वे राजनीतिक दलों और सांसदों पर ही निर्भर होते हैं कि वे उन तक पहुंचने के लिए पुल का काम करें। लोकसभा में बहुमत के साथ एक प्रभावशाली सरकार आम तौर पर आत्ममुग्ध होती है और वह राजनीतिक दलों या सांसदों से मशविरा नहीं करती।

सीईए ने संदर्भ उजागर किया
लोग और विशेषज्ञ आर्थिक हालात की अद्यतन जानकारी के लिए बजट की पूर्व संध्या में प्रस्तुत किए जाने वाले आर्थिक सर्वेक्षण को देखते हैं। हमेशा की तरह 2022-23 के आर्थिक सर्वेक्षण का पहला अध्याय अगले वर्ष के 'आउटलुक'(दृष्टिकोण) पर केंद्रित है। इस साल दिशाहीन तरीके से भटकने के बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) ने 2023-24 के आउटलुक का सार दो पैराग्राफ में संक्षेपित किया है, जिसे यहां दिया जा रहा है:  

1.30. जबकि भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट है, अगले वर्ष के लिए वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर विशेष प्रकार की चुनौतियों के संयोजन का बोझ है, जिससे गिरावट होने वाले जोखिम की संभावना है। बहु-दशकीय उच्च बैंकों को मुद्रास्फीति के अंकों ने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों को वित्तीय शर्तों को सख्त रखने के लिए मजबूर किया है। आर्थिक सख्ती का असर धीमी आर्थिक गतिविधियों, विशेषकर उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में दिखने लगा है। इसके अलावा, आपूर्ति शृंखलाओं में लंबे समय तक रहे तनाव से प्रतिकूल फैलाव और भू-राजनीतिक संघर्ष के कारण बढ़ी अनिश्चितता ने वैश्विक दृष्टिकोण को और अधिक खराब कर दिया है। इसलिए आईएमएफ के वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक, जनवरी, 2023 के मुताबिक, वैश्विक जीडीपी के वर्ष 2022 के 3.2 फीसदी से धीमा होकर वर्ष 2023 में 2.7 फीसदी होने का अनुमान है। आर्थिक उत्पादन में धीमी वृद्धि के साथ बढ़ती अनिश्चितता व्यापार वृद्धि को कम कर देगी। इसे वैश्विक व्यापार में वृद्धि के संबंध में विश्व व्यापार संगठन द्वारा किए गए कम पूर्वानुमान में देखा गया है, जिसकी वर्ष 2022 के 3.5 फीसदी से घटकर 2023 में एक फीसदी होने की संभावना है।

1.31. बाह्य दृष्टि से, चालू लेखा शेष के जोखिम अनेक स्रोतों से उत्पन्न होते हैं। जबकि वस्तुओं की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई से कम हो गई हैं, वे अब भी संघर्ष पूर्व की स्थिति से ऊपर हैं। वस्तुओं की उच्च कीमतों के बीच मजबूत घरेलू मांग से भारत के कुल आयात बिल में वृद्धि होगी और चालू खाता शेष में अलाभकारी विकास को बढ़ावा मिलेगा। वैश्विक मांग में कमी के कारण निर्यात वृद्धि को स्थिर करके इन्हें और बढ़ाया जा सकता है। यदि चालू खाते के घाटे में वृद्धि होती है, तो मुद्रा पर मूल्यह्रास का दबाव बढ़ेगा।

यदि सीईए सोचते हैं कि उन्होंने अपना काम कर दिया, तो वह गलत हैं। उन्हें भारतीय संदर्भ में 'आउटलुक' का कठोर विश्लेषण करना चाहिए था और सरकार के सामने पूर्वनिर्धारित या सुधारात्मक उपाय करने के विकल्प रखने चाहिए थे। इसके साथ ही माननीय वित्तमंत्री आर्थिक सर्वेक्षण के पहले अध्याय को पढ़कर संसद के साथ अपना आकलन साझा करने और उन पर उठाए जाने वाले कदमों की जानकारी देने के लिए बाध्य थीं। दोनों नाकाम साबित हुए। नतीजतन बजट भाषण के पाठ की उस संदर्भ के साथ कोई प्रासंगिकता नहीं है, जिसमें बजट प्रस्तुत किया गया। 90 मिनट का भाषण बस खुद को तसल्ली देने जैसा था कि हालात बुरे नहीं है।

तीन संदेहास्पद प्रमुख बातें
बजट से तीन बातें निकलती हैं : (1) 2022-23 में पूंजीगत व्यय के लिए आवंटित धन खर्च करने में नाकाम रहने के बाद वित्तमंत्री ने 2023-24 में पूंजीगत व्यय के लिए बजट अनुमानों को 33 फीसदी तक बढ़ा दिया। (2) सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के खर्च में निर्ममता से कटौती करने के बाद वित्तमंत्री ने गरीबों और वंचितों को आश्वस्त करना चाहा है कि उनका कल्याण सर्वोपरि है। (3) नई (बिना छूट वाली) कर व्यवस्था (एनटीआर), जिसे उन्होंने 2020 में प्रस्तुत किया था, को अपनाने के लिए लोगों को प्रेरित करने में नाकाम रहने के बाद वित्तमंत्री ने संदिग्ध गणना की है कि एनटीआर कैसे मध्यवर्ग के करदाताओं के लिए लाभकारी है।

जिन तीन बिंदुओं का उल्लेख किया गया है, उनमें से कोई भी बारीकी से जांच के दायरे में नहीं आएगा। पहला, सरकार का पूंजीगत व्यय। वित्तमंत्री ने मौन रूप से स्वीकार किया है कि विकास के अन्य तीन इंजन लड़खड़ा रहे हैं। निर्यात नीचे हैं; वित्तमंत्री की उद्योगपतियों को फटकार के बावजूद निजी निवेश सुस्त है; और खपत स्थिर है और नीचे गिर सकती है।

वित्तमंत्री के पास सिवाय इसके कोई विकल्प नहीं था कि सरकार के पूंजीगत व्यय में वृद्धि करें। 2022-23 में 7,50,246 लाख करोड़ रुपये के बजट अनुमानों के विपरीत संशोधित अनुमान घटकर 7,28,274 करोड़ रुपये रह जाएगा, जो कि सरकारी परियोजनाओं के क्रियान्वयन में अंतर्निहित कमजोरियों को उजागर करता है।

मंत्रालयों (जैसे, रेलवे और सड़क) की बाधाओं और अवशोषण क्षमता को अनदेखा करते हुए, वित्तमंत्री ने 10,00,961 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं! यहां तक कि पूंजीगत व्यय के पैरोकार भी बौखलाए हुए हैं।

दूसरा, कल्याण पर खर्च बढ़ाने का वादा। 2022-23 में विभिन्न प्रमुख वर्गों-कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण, शहरी विकास, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यकों और वंचित समूहों के विकास की अंब्रेला योजनाएं इत्यादि- में सरकार ने लक्षित समूहों को छोटा कर बजट अनुमानों को झूठे वादों में बदल दिया। अगले वर्ष के लिए उर्वरक और खाद्य पर सब्सिडी चालू वर्ष के संशोधित अनुमान के मुकाबले 1,40,000 करोड़ रुपये कम कर दी गई है। मनरेगा के लिए आवंटन में 29,400 करोड़ रुपये की कटौती की गई है। जो शेष रह गया है, वह केवल सुखदायी शब्द हैं।

कौन है दोषी
अंत में, नई कर व्यवस्था का रहस्य। गुत्थी पहले ही सुलझ चुकी है। इस पर अलग से लिखने की जरूरत है। एक बात स्पष्ट है : सरकार व्यक्तिगत आयकर से हर तरह की छूट वापस लेना चाहती है।
अनिश्चित वर्ष में उतार-चढ़ाव भरे सफर के लिए खुद को तैयार कर लें।
 

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