पूर्वोत्तर की भाषाओं और हिंदी के सेतुबंध
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चार राष्ट्रीय तथा 53 जनजातीय भाषाओं से समृद्ध पूर्वोत्तर साहित्य के बारे में हिंदी जगत बहुत कम जानता है। पूर्वोत्तर की भाषाओं के साहित्य की हिंदी में जबर्दस्त उपेक्षा हुई है। इस उपेक्षा के खिलाफ जिन पत्रिकाओं ने पिछले दो-तीन दशकों के दौरान निरंतर रचनात्मक संघर्ष किया, वे हैं-उलुपी, महिप और समन्वय पूर्वोत्तर। वैसे उत्तरकाल, पूर्वांचल प्रहरी, सेंटिनल, प्रातः खबर और दैनिक पूर्वोदय भी यदा-कदा पूर्वोत्तर के साहित्य को हिंदी में अनूदित कर लाते रहे हैं, किंतु सुचिंतित तरीके से हिंदी और पूर्वोत्तर में भाषा सेतुबंधन का काम उलुपी, महिप और दैनिक पूर्वोत्तर आदि ने ही किया है।
रविशंकर रवि ने गुवाहाटी से 1997 में उलूपी का संपादन-प्रकाशन प्रारंभ किया था। इस पत्रिका का नाम पूर्वोत्तर की महाभारतकालीन नगा युवती उलुपी के नाम पर रखा गया। उलुपी ने क्षेत्रीय स्वायत्तता के सवाल पर अपने पति को युद्ध के लिए ललकारा था। ‘उलुपी’ के माध्यम से रवि शंकर रवि असमिया की शताधिक कहानियां अब तक हिंदी में ला चुके हैं। इस पत्रिका के जिन विशेषांकों को आज भी याद किया जाता है, वे हैं-असमिया कहानी विशेषांक, अवनी चक्रवर्ती पर केंद्रित अंक, ज्योति अंक, असमिया साहित्य सभा विशेषांक, शीलभद्र विशेषांक, पूर्वोत्तर में हिंदी विशेषांक। उलुपी के जरिये रवि ने हिंदी के एक लाख से अधिक पाठकों तक पूर्वोत्तर का साहित्य पहुंचाया है। इस पत्रिका के पिछले अंक में तीन दिवंगत विभूतियों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई हैं। ये विभूतियां हैं-संग्रीत सम्राट भूपेन हजारिका, असमिया की शीर्ष लेखिका मामोनी रायशम गोस्वामी और असमिया कला को नई पहचान देने वाले कलाकार शोभा ब्रह्म।
भारत का हिस्सा होकर भी पूर्वोत्तर कई बार भारत का अंग नहीं लगता। वहां के लोगों की कद-काठी, रहन-सहन सब कुछ अलग है। वहां उग्रवाद का इतिहास आधी सदी से भी अधिक पुराना है। आजादी के समय से ही नगालैंड और मणिपुर उग्रवाद की आग में सुलगने लगे थे। मणिपुर में 1945 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का गठन हो गया, तो नगा नेता फिजो स्वाधीन नगालैंड की जिद करने लगे। वर्ष1966 में मिजो नेशनल फ्रंट का गठन कर लालडेंगा ने स्वतंत्र मिजोरम के लिए बगावत कर दी। पूर्वोत्तर में उग्रवाद का विस्तार महज दिल्ली की उपेक्षा से नहीं हुआ है, राज्य में सत्ता प्राप्त करने और उग्रवादी संगठनों के बीच ताकतवर बनने की प्रवृत्ति भी इसके लिए जिम्मेदार है।
उलुपी के पांचवें अंक में रवि लिखते हैं कि प्रकृति से प्रेम, सहज जिंदगी, उन्मुक्त प्रेम और अतिथि सत्कार पूर्वोत्तर के लोगों की विशेषता रही है। लेकिन इस तरह के असंतोष का स्थायी समाधान क्या है? हत्याओं का आम जनता समर्थन नहीं करती।
महिप पत्रिका मणिपुर हिंदी परिषद पत्रिका का संक्षिप्त रूप है। 1985 में शुरू हुई इस पत्रिका के मणिपुर भाषा मांग विशेषांक, तुलसीदास तथा मैथिली शरण गुप्त अंक तथा मणिपुरी के लमाबम कमल, नीलवीर शास्त्री, हिजम अञ्डाहल, चाबोआ पर केंद्रित अंक बहुत प्रभावशाली निकले। इसने मणिपुरी उपन्यास, मणिपुरी लोककला, मणिपुरी लोकनाट्य पर आलोचनात्मक लेख प्रकाशित किए, तो मणिपुरी कविताएं भी छापीं। पत्रिका ने हिंदी सेवी सिद्धनाथ प्रसाद पारंग, राधागोविंद थोञगाम से भी हिंदी जगत को परिचित कराया।
अरुण प्रभा, मेघालय दर्पण और असम प्रदीप ने भी हिंदी तथा पूर्वोत्तर की भाषाओं के बीच सेतुबंधन का उल्लेखनीय कार्य किया है।। इस दिशा में सबसे व्यवस्थित काम केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा प्रकाशित समन्वय पूर्वोत्तर ने किया। उसने पूर्वोत्तर के आधुनिक व समकालीन और लोक साहित्य से हिंदी समाज को परिचित कराया। इसके जरिये हम पूर्वोत्तर की जनजातीय कविता का आरंभिक आकलन करते हुए देख सकते हैं कि वहां जनजातीय कवियों में अपने समय के उलझावों को पहचानने और उससे सामना करने का विलक्षण साहस है। पूर्वोत्तर के निवासियों के लिए आत्मपहचान का सवाल सबसे अहम है। पूर्वोत्तर के साहित्य की गंभीरता से पड़ताल करें, तो कई बार आश्चर्य होता है कि इतना स्तरीय साहित्य होने के बावजूद मुख्यधारा के साहित्य में इसका उल्लेख न के बराबर है। अब समय आ गया है कि हम पूर्वोत्तर भारत में फैले इस साहित्य का विवेचन-विश्लेषण करें। तभी पूर्वोत्तर के लोगों के प्रति हमारा नजरिया बदलेगा।