फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Brave women Wing Comm Vyomika and Colonel Sofiya resembles with Savitribai Phule and Fatima Sheikh in 2025 fil

मुद्दा: आज की वीरांगनाएं विंग कमांडर व्योमिका-कर्नल सोफिया; फिल्म में सावित्री बाई फुले-फातिमा शेख की छवि से..

Shyouraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Wed, 21 May 2025 05:36 AM IST
विज्ञापन
सार
फुले  फिल्म में जो छवि सावित्री बाई फुले व फातिमा शेख की दर्शाई गई है, वही जीवंत छवि हम विंग कमांडर व्योमिका और कर्नल सोफिया के रूप में देख रहे हैं।
loader
Brave women Wing Comm Vyomika and Colonel Sofiya resembles with Savitribai Phule and Fatima Sheikh in 2025 fil
ऑपरेशन सिंदूर पर भारतीय सेना की महिला अधिकारियों- विंग कमांडर व्योमिका और कर्नल सोफिया ने दी जानकारी - फोटो : यूट्यूब वीडियो ग्रैब- एएनआई

विस्तार

ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम देने में सैन्य वीरों के साथ-साथ वीरांगनाओं ने भी देश की सुरक्षा व्यवस्था को गौरवान्वित किया है। प्रतीकात्मक रूप से हम यह साफ देख रहे हैं कि कलात्मक दृष्टि से फिल्में भी अतीत को दर्शा रही हैं। सांस्कृतिक रूप से सजग हो रहे समाज पर फिल्मों का असर उत्तरोत्तर बढ़ते क्रम में दिखाई पड़ता है। आत्मकथाओं और जीवनियों पर आधारित बायोपिक भी काफी प्रेरणास्पद रही हैं। यह ऐतिहासिक संयोग है कि जिस तरह ‘सावित्री बाई फुले’ और ‘फातिमा शेख’ की यथार्थ छवि फुले फिल्म में अज्ञान से युद्ध के रूप में  दर्शाई गई है, प्रकारांतर से वही जीवंत छवि हम विंग कमांडर ‘व्योमिका सिंह’ और कर्नल ‘सोफिया कुरैशी’ के रूप में देख रहे हैं।



फुलेकालीन युद्ध अशिक्षा के खिलाफ लड़ा गया था और मौजूदा युद्ध आतंकवाद के खिलाफ लड़ा जा रहा है। कल और आज के मोर्चे अलग-अलग हैं, वीरांगनाएं भी अलग-अलग हैं, लेकिन लक्ष्य एक है, भावना एक है और भारत एक है। बेशक युद्ध विराम हो चुका है, परंतु भारतीय सेना ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता का इतिहास रच चुकी है। 

विंग कमांडर व्योमिका सिंह, कर्नल सोफिया कुरैशी
विंग कमांडर व्योमिका सिंह, कर्नल सोफिया कुरैशी - फोटो : ANI
हाल ही में आई फुले फिल्म आरंभिक विरोध और गलत-फहमी से निकलकर सिनेमाघरों में चल निकली। मिस कैथरीन मेयो कृत मदर इंडिया किताब के नाम पर बनी फिल्म मदर इंडिया हो या अछूत कन्या अथवा बूटपॉलिश आदि फिल्में समाज के उपेक्षित समुदाय का सच सामने लाई हैं। फुले फिल्म दलितों में विद्या-विस्तार की दृष्टि से समाज सुधारक एवं शिक्षक फुले दंपती के रचनात्मक समर्पण और सार्थक संघर्ष की कहानी है। देश-काल परिस्थितियों को देखें, तो जब यह फिल्म प्रदर्शित हुई, तब राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता के प्रति सजग भारतीय सेना सीमा पार से आने वाले आतंकवाद का मुंहतोड़ जवाब दे रही थी, लेकिन जिन दिनों महाराष्ट्र के ‘पूना’ में यह कहानी चरितार्थ हुई थी, भारत में ब्रिटिशराज अपने उपनिवेश के सौ साल पूरे कर चुका था। जिन भारतीयों को अंग्रेजी विद्या प्राप्त हो चुकी थी, उनके मन में अंग्रेजी राज के प्रति असंतोष पनपने लगा था। आशय यह नहीं कि अंग्रेजी विद्या में ब्रिटिशराज को समाप्त करने का कोई पाठ पढ़ाया जा रहा था, बल्कि अंग्रेजी ने ‘फुले’ पर फ्रांस की क्रांति का प्रभाव डाला था। 

ब्रिटिश मिशनरियां भारत में शूद्रों को अंग्रेजी अध्ययन के रास्ते ईसाई चर्च की ओर उन्मुख कर रही थीं। लेकिन ‘फुले’ उनको अपनी जड़ों से जोड़ रहे थे। वे उन्हें ‘शूद्र’ ‘अछूत’ संबोधन के बजाय एक वर्गीय ‘दलित’ शब्द दे रहे थे। फुले अंग्रेजी पढ़े और अंग्रेजों के विद्यादान के प्रशंसक भी बने, पर ईसाई नहीं बने। कबीर, बुद्ध और फुले को गुरु मानने वाले डॉ. बीआर आंबेडकर के पिता भी ब्रिटिशों की भारतीय सेना में रहे, लेकिन न तो खुद ईसाई बने और न बच्चों को गैर-भारतीय संस्कार दिए। डॉ. आंबेडकर ने मोहम्मद अली जिन्ना को सलाह दी थी, धर्म के आधार पर देश के विभाजन की मांग छोड़ दो और अखंड भारत में ही मुस्लिम-प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कराओ। उन्होंने द्विराष्ट्र सिद्धांत पर पुस्तक लिखी, जो जिन्ना ने पढ़ी, लेकिन उनकी सलाह स्वीकार नहीं की। तब डॉ. आंबेडकर ने टिप्पणी की, ‘करा लो बंटवारा, एक दिन मूर्खता का पता चल जाएगा।’

फुले
फुले - फोटो : अमर उजाला
फुले फिल्म की कहानी कला के माध्यम से तत्कालीन देश-काल की कई उपकथाएं कहती है। फुले कहते हैं, ‘अंग्रेजों की गुलामी तो सौ साल की है, मैं शूद्रों को अविद्या के अंधकार से निकालकर तीन हजार साल की गुलामी समाप्त करने की कोशिश कर रहा हूं।’ फुले के इस कथन के करीब सौ साल बाद ऐसा ही जवाब डॉ. बीआर आंबेडकर ने स्वराज के आंदोलनकारियों को दिया ‘अस्पृश्यता को बनाए रखने वाला स्वराज, तो हमारे ऊपर गैर दलितों का राज होगा। इसलिए स्वराज हो तो ऐसा, जिसमें हमारा भी थोड़ा-बहुत राज हो।’  

फुले अपनी पत्नी को प्रशिक्षित कराकर शिक्षिका बनाते हैं, उनके कार्य में कुछ उदार ब्राह्मण शिक्षक, ‘उस्मान शेख’ और उनकी बहन ‘फातिमा शेख’ कंधे से कंधा मिलाकर विद्यालयों की स्थापना करते हैं। अनुभव के तौर पर कई विरोधाभास सामने आते हैं-फुले एक ब्राह्मण मित्र की बरात से बेइज्जत कर निकाले जाते हैं, पर जब पाठशाला शुरू करते हैं, तो एक अन्य ब्राह्मण मित्र से जगह और संरक्षण पाते हैं। फ्रांस की क्रांति पर लिखी गई थॉमस पेन की किताब राइट्स ऑफ मैन से प्रभावित होकर वह गुलामगिरी लिखते हैं। अफ्रीकी-अमेरिकी अश्वेतों की दास प्रथा से सबक लेते हैं। जिसके लिए चर्च ने क्षमा याचना की, व्यक्ति स्वातंत्र्य के पक्षधर श्वेतों की तरह भारत की उच्च सशक्त जातियों में देश-बंधु भाव जगाने का प्रयास करते हैं। कुल मिलाकर एक जीवंत कथा-विंग कमांडर व्योमिका सिंह और कर्नल सोफिया कुरैशी ने रची है। 

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे हैं)
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed