21वीं सदी: धर्म, शिक्षा, समाज और गांधी

सुनील वत्स Updated Sat, 01 Feb 2014 09:31 PM IST
book review
21वीं सदी: धर्म, शिक्षा, समाज और गांधी
रोहित कौशिक
शिल्पायन पब्लिशर्स दिल्ली
मूल्य- 300 रुपए



आजकल विभिन्न अखबारों और पत्र पत्रिकाओं में छपे अपने लेखों को संकलित कर उसे किताब की शक्ल देने की परंपरा चल पड़ी है। जिसका सबसे बड़ा खतरा इस बात का रहता है कि किताब में विषय वस्तु का प्रवाह टूटता है और उसकी रोचकता बरकरार नहीं रह पाती। ऐसी किताबें विभिन्न विषयों पर अपने विचार व्यक्त तो करती हैं, मगर किसी एक विषय पर गहनता से पड़ताल कर पाने में विफल रहती हैं।

हां, इसका  फायदा इतना है कि पाठक को कई विषयों पर एक ही किताब में पठनीय सामग्री मिल जाती है। लेखक रोहित कौशिक की ‘21वीं सदी- धर्म, शिक्षा, समाज और गांधी’ एक ऐसी ही पुस्तक है, जिसमें शीर्षक के मुताबिक ही विषयों पर गंभीरता से विश्लेषण किया गया है। इन लेखों में चिंतन परंपरा की झलक तो मिलती है, मगर विषय की गहनता से पड़ताल की कमी खटकती है। शायद इसकी वजह लेखों की शब्द सीमा भी रही है।

अपने कुछ लेखों में वह अपने समय को खंगालने की कोशिश करते नजर आते हैं, जो हमेशा से प्रासंगिक रहे हैं, यथा- 'अधर्म की राह पर धर्माचार्य', 'शिक्षा का निजीकरण कितना उचित है', 'किताबों के उजड़े हुए घर', 'कहां है किताबों पर संकट', 'बदल रही है गांवों की तस्वीर', 'आखिरी विकल्प नहीं है आरक्षण', 'सतही गांधीगीरी' और 'आंधी में गांधी'। अपने समय से साक्षात्कार करना और समय के प्रति सचेत रहना शायद इंसान के जिंदा होने का यकीन दिलाता है ताकि शब्दों के जरिये अपने समय के सच से बेहतर तरीके से रूबरू हुआ जा सके।

जैसा कि किताब की भूमिका में खुद कौशिक भी कहते हैं कि निराशा के गहन अंधेरे में शब्द ही हमें रोशनी देते हैं। मूल्यहीनता और संवेदनहीनता के दौर में लगातार कगार पर खिसकते जा रहे जीवन मूल्यों को बचाने का संकट आ खड़ा हुआ है। भूमंडलीकरण की बुलेट रफ्तार में किसी को फुरसत नहीं है अपने पीछे देखने की और न ही यह जानने की कि हम इस तेजी में क्या खो रहे हैं और क्या पा रहे हैं। यह किताब कुछ ऐसे ही जीवंत सवालों से पाठक को रूबरू कराती है। त्रिलोचन, प्रभाष जोशी के बारे में संस्मरण पढ़ते हुए वह नीरसता जरूर दूर होती है, जो शुष्क आलेखों की वजह से सहज ही पाठक में ऊब पैदा कर देती है।

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