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चिकित्सा के पेशे पर धब्बा

Wed, 13 Nov 2013 09:06 PM IST
सुभाष गताडे
सुभाष गताडे Updated Wed, 13 Nov 2013 09:06 PM IST
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Blot on Medical profession

इंस्टीट्यूट ऑन मेडिसिन एज ए प्रोफेशन और ओपन सोसाइटी फाउंडेशन के 19 सदस्यीय कार्यदल ने दो साल तक समीक्षा कर एक रिपोर्ट तैयार की है, जो अमेरिकी शासकों की आंखों की किरकिरी बन रही है। यह रिपोर्ट बताती है कि अमेरिकी सेना के लिए काम कर रहे डॉक्टर एवं मनोवैज्ञानिक किस तरह अपने पेशे की नीतिगत संहिताओं को लांघ रहे हैं और बंदियों को यातना देते हुए अन्य तरह के दुर्व्यवहार कर रहे हैं। इस कार्यदल ने इस बात के विवरण प्रस्तुत किए है कि अमेरिकी सेना और सीआईए के निर्देश पर सैनिकों एवं गुप्तचर सेवाओं के साथ जुड़े स्वास्थ्य प्रोफेशनल्स ने बंदियों के साथ क्रूर, अमानवीय और अपमानित करनेवाले व्यवहार एवं यातना देने के कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की और उसमें हिस्सा लिया। अमेरिकी सेना का इन डॉक्टरों एवं अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को निर्देश था कि वे बीमारों का इलाज नहीं कर रहे, इसलिए सख्त रुख अपनाएं।

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वैसे आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर जब से अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया तथा बंदियों को रखने के लिए गुआंतोनामो से लेकर अबू गरेब जैसे जेल बनाए, तभी से निकली तमाम रिपोर्टों में यह बात सामने आती रही है। दो साल पहले गुआंतोनामो जेल में लंबे समय से तैनात मनोवैज्ञानिक डॉ. जान लेसो पर मुकदमा चला था। उन पर आरोप था कि उन्होंने बंदियों को यातना देने के नए-नए तरीके इजाद किए थे। लेसो ने कैदियों को यातना देने की तीन श्रेणियां तय की थीं। ये श्रेणियां बंदियों की प्रतिरोध क्षमता पर आधारित थीं। मसलन, यातना की तीसरी श्रेणी में शारीरिक हिंसा का तत्व भी शामिल था। उसमें बीस घंटे तक लगातार पूछताछ चलती रहती थी और बंदी को अलग रखा जाता था। गुआंतोनामो जेल के हालात ऐसे थे कि बंदियों ने विरोध में लंबी भूख हड़तालें की। तब उन्हें कुर्सी से बांधकर जबरन खिलाया गया। निराश होकर कुछ कैदियों ने आत्महत्या भी की।
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यह ताजा रिपोर्ट चंद साल पहले 17 मुल्कों के 266 मेडिकल डॉक्टरों द्वारा जारी किए गए खुले पत्र की याद ताजा करती है, जिसमें उन्होंने बंदियों को यातना देने और उनकी हत्या में अमेरिकी चिकित्सा सेवा की सहभागिता को निशाना बनाया था। द लान्सेट में प्रकाशित उस पत्र में मांग की गई थी कि शपथ का उल्लंघन करने वाले तमाम चिकित्सकों/ मनोवैज्ञानिकों को संबंधित पेशेवर संगठनों द्वारा अनुशासित किया जाना चाहिए। पत्र लेखक डॉक्टरों का गुस्सा विशेष तौर पर गुआंतोनामो अस्पताल के पूर्व निदेशक जॉन एडमांडसन पर केंद्रित था, जिन्हें चिकित्सा सेवा में ‘प्रेरक नेतृत्व’ प्रदान करने के लिए अमेरिकी सेना द्वारा पुरस्कृत किया गया! यह जानने योग्य है कि बाद में अपने बचाव में एडमांडसन ने कहा कि वह महज सेनाधिकारियों की आज्ञा का पालन कर रहे थे। दुनिया भर के डॉक्टरों ने उनकी उस सफाई की तुलना ‘न्यूरेम्बर्ग बचाव’ से करते हुए उसे खारिज कर दिया था। दरअसल दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद नाजी युद्धापराधियों पर न्यूरेम्बर्ग में मुकदमा चला था, जिसमें नाजी दौर के अधिकारियों ने यह कहते हुए सफाई दी थी कि वे महज आज्ञा का पालन कर रहे थे।
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यह आश्चर्यजनक ही है कि अंतरराष्ट्रीय मांग और दबाव के बावजूद कैदियों को यातना देने वाले किसी डॉक्टर या मनोवैज्ञानिक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। पर इससे अमेरिकी सेना के गुनाह छिप नहीं पाए। वहां के कुछ कॉलेजों ने एक प्रस्ताव पारित कर अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन को भेजा है कि वह अपने उन सदस्यों पर पाबंदी लगा दे, जो गुआंतोनामो या सीआईए द्वारा संचालित दूसरे बंदी स्थानों के लिए यातना कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने में मुब्तिला थे। यहां यह बताना जरूरी है कि 17 देशों के 266 डॉक्टरों द्वारा जारी किया गया वह खुला पत्र महान रंगभेद विरोधी नेता स्टीव बिको की शहादत की सालगिरह पर जारी किया गया। स्टीव बिको को दक्षिण अफ्रीका की पुलिस ने मार डाला था, लेकिन उसमें दो डॉक्टरों की भी भूमिका थी, जिनमें से एक ने बाद में पश्चाताप किया था। चिकित्सकों की यह अपील बताती है कि डाक्टरों को यातना में सहायक नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका हरसंभव प्रतिरोध करना चाहिए।

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