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अवध से टकराकर लौटती भाजपा की लहर
शीतला सिंह
Updated Mon, 28 Apr 2014 08:10 PM IST
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राजनीति में अवध की पहचान पुरानी है। यहां से अटल बिहारी वाजपेयी 1957 में पहली बार कांग्रेस के हैदर हुसैन को हराकर चुनाव जीते थे। इसी क्षेत्र में सोशलिस्ट नेता रामसेवक यादव बाराबंकी से तीन बार विजयी हुए थे। वाजपेयी तो 1962 में कांग्रेस की सुभद्रा जोशी से चुनाव हार गए थे, पर रामसेवक यादव 1962 और 1967 में भी चुनाव जीते थे। अयोध्या आंदोलन की लहर में बजरंग दल के नेता विनय कटियार यहां से तीन बार चुनाव जीते, पर 1998 में हारने के बाद लड़ने की हिम्मत नहीं कर पाए।
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अवध क्षेत्र में दो मंडल फैजाबाद और लखनऊ थे, जिसमें 12 जिले आते थे। फैजाबाद मंडल मायावती काल में विभाजित होकर अब सरयू के उस पार का मंडल देवीपाटन बन गया है और प्रतापगढ़ (अवध) इलाहाबाद मंडल में शामिल कर दिया गया है। राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी जिस अमेठी क्षेत्र से चुनाव लड़े और जीते, वह फैजाबाद मंडल का ही अंग है।
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फैजाबाद चर्चा का विषय अयोध्या आंदोलन के कारण बना, जिसकी शुरुआत विश्व हिंदू परिषद ने की थी। सोमनाथ से लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा निकाली थी, पर बिहार में लालू यादव ने उन्हें गिरफ्तार कर अयोध्या पहुंचने से रोक दिया था। उसी आंदोलन के बल पर उत्तर प्रदेश में भाजपा के नेतृत्व वाली पहली सरकार बनी, जिसे बाबरी विध्वंस के बाद राष्ट्रपति ने बर्खास्त कर दिया था। उस आंदोलन के प्रभाव से कल्याण सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश की 85 में से 57 सीटों पर भाजपा जीती थी।
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पर लगता है कि इस बार भाजपा की लहर अवध क्षेत्र से टक्कर खाकर लौट रही है, क्योंकि फैजाबाद लोकसभा सीट के, जिसमें अयोध्या आती है, संत-महंत भी भाजपा उम्मीदवार का खुलेआम विरोध कर रहे हैं। जबकि विहिप के वेदांती टिकट न मिलने से नाराज हैं। यहां की अंबेडकरनगर सीट से मायावती सांसद व विधायक रही हैं। वह भी भाजपा के लिए संकट का संदेश दे रही हैं, क्योंकि वहां की मुख्य लड़ाई में सपा-बसपा को ही गिना जा रहा है। अमेठी से राहुल गांधी के विरुद्ध भाजपा से स्मृति ईरानी हैं, पर वहां विरोधियों में चर्चा कुमार विश्वास की अधिक है। जबकि वरुण गांधी सुलतानपुर से अपनी सीट बचाने के प्रयास में हैं। बाराबंकी में भाजपा की चर्चा ही नहीं है। नरेंद्र मोदी ने इस क्षेत्र में अपना चुनाव अभियान बहराइच से शुरू किया था। वहां दलित सीट पर बेल्हा से चुनी गई विधायक सावित्री बाई फुले भाजपा उम्मीदवार हैं, पर मोदी लहर से उन्हें फायदा नहीं हो रहा।
वाजपेयी जिस बलरामपुर से चुनाव लड़े थे, वह अब श्रावस्ती के नाम से बनी है, जहां सपा से अतीक अहमद, बसपा से लालजी वर्मा और पीस पार्टी से रिजवान जहीर प्रत्याशी हैं। भाजपा ने वहां दद्दन मिश्रा को उतारा है, जो इस गणित में लगे हैं कि मुस्लिम बहुल इस इलाके में दोनों दबंग माफिया मुस्लिम वोटों का विभाजन किस तरह करवा पाते हैं। गोंडा से बेनी प्रसाद वर्मा यह मान रहे हैं कि पिछड़े वर्ग का कुर्मी समुदाय और सपा के उनके पुराने साथी इस बार भी उनके मददगार होंगे। उनका मुकाबला मनकापुर के राजकुमार कीर्तिवर्धन सिंह से है, जो सपा से टिकट न मिलने के कारण भाजपाई बन गए हैं। जबकि कैसरगंज में भाजपा उम्मीदवार बृजभूषण सिंह बहुत उत्साहित नहीं हैं।
अवध में भाजपा को चुनौती अपनी ही पार्टी से है। लखनऊ से राजनाथ सिंह लालजी टंडन को किनारे कर उम्मीदवार तो बने हैं, पर अब पुराने साथी को कैसे पटाएं, यह समस्या बनी हुई है। इसी तरह कल्याण सिंह, विनय कटियार, ओमप्रकाश सिंह, पार्टी अध्यक्ष रहे सूर्य प्रताप शाही, आदित्य नाथ मिश्र और केशरीनाथ अपने को पार्टी में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। ऐसे में, भाजपा मान रही है कि यदि सपा का मुस्लिम-यादव समीकरण टूटे और दलित-ब्राह्मण गठजोड़ भी समाप्त हो, तभी यहां सफलता मिल सकती है।