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काले धन पर भाजपा का झूठ

Fri, 24 Oct 2014 07:38 PM IST
मनीष तिवारी
मनीष तिवारी Updated Fri, 24 Oct 2014 07:38 PM IST
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BJP's Lie on Black money

आखिर काला धन क्या होता है? काला धन यानी ऐसी संपत्ति, जिसे किसी व्यक्ति या किसी कंपनी ने कानूनों का उल्लंघन कर अर्जित किया हो। व्यापक रूप में इसे ऐसी पूंजी कहा जा सकता है, जो कर अपवंचन के दायरे में आती है और अंततः अपराध को बढ़ावा देती है। सवाल है कि इस धन को आखिर कहां रखा जाता है? अमूमन यह धन स्वशासी क्षेत्राधिकार में रखा जाता है, जिसे आम बोलचाल में टैक्स हेवन यानी कर चोरों की पनाहगाह या फिर ऑफशोर फाइनेंस सेंटर्स (ओएफसी) कहा जाता है।

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ये ऐसे देश या क्षेत्र होते हैं, जो अपने संप्रभु अधिकार का उपयोग कर करों से बचने की ऐसी व्यवस्था कायम करते हैं, जिसमें खातेदारों को गोपनीयता बनाए रखने की गारंटी दी जाती है। द बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (बीआईएस) के आकलन के मुताबिक, 1980 के दशक की शुरुआत से अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग में तकरीबन आधा कारोबार ऐसे ही क्षेत्रों या देशों के जरिये हो रहा है। बहुराष्ट्रीय निगमों का एक तिहाई प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) ऐसे ही देशों के जरिये होता है। कॉरपोरेट्स द्वारा इस तरह किए जाने वाले कर अपवंचन का आकलन करना तो मुश्किल है, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर सालाना एक खरब डॉलर के कर अपवंचन का अनुमान है।
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भारत में काले धन ने दो खरब डॉलर की समानांतर अर्थव्यवस्था कायम कर ली है। यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के बराबर है। कहा जा सकता है कि भारत की औपचारिक अर्थव्यवस्था काले धन की तकरीबन इतनी ही बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ चल रही है। इसमें से अधिकांश धन या तो शेयर बाजारों में या फिर रियल एस्टेट सेक्टर में निवेश किया गया है। इसे जानना हो, तो देश के किसी भी हिस्से में जमीन, आवासों या व्यावसायिक परिसरों के बाजार भाव और उनके पंजीयन की कीमत की तुलना करके देख लीजिए। आज भी ऐसे सौदों में पचास से अस्सी फीसदी तक लेन-देन नकद में होता है।
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आखिर इन टैक्स हेवन की शुरुआत किस तरह हुई? आधुनिक युग की हर शुरुआत की तरह इसका संबंध भी अमेरिका से है। 1880 के दशक में न्यूजर्सी प्रांत को कोष की अत्यंत जरूरत महसूस हुई थी। न्यूयॉर्क के एक कॉरपोरेट वकील श्रीमान डेल ने न्यूजर्सी के गवर्नर लियोन एबोट को ऐसा कानून बनाने का सुझाव दिया, जिससे कॉरपोरेट इस प्रांत में अपने मुख्यालय स्थापित करने के लिए प्रेरित हों। कानून बना और इसमें दो प्रावधान थे, पहला था निगमीकरण की आसान सुविधा और दूसरा, कॉरपोरेट कर की न्यून दर।

बीसवीं सदी में पूरी दुनिया में तमाम टैक्स हेवन दो प्रमुख भू-राजनीतिक ध्रुवों के इर्द-गिर्द विकसित हुए। इनमें से एक का संबंध लंदन से है, जो आज भी महत्वपूर्ण वित्तीय केंद्र है। इसमें ब्रिटिश साम्राज्य के दायरे में आने वाले क्षेत्र शामिल थे, जिसमें चैनल द्वीप, जर्सी, इसले ऑफ मैन, केमन द्वीप, बरमूडा, ब्रिटिश वर्जिन आईलैंड जैसे नाम शामिल हैं। जबकि दूसरा भू-राजनीतिक ध्रुव यूरोप में विकसित हुआ, जिसमें बेल्जियम, नीदरलैंड, लक्जमबर्ग-आयरलैंड, स्विट्जरलैंड और लिकेंटस्टीन शामिल थे। बाद में इससे हांगकांग, सिंगापुर, दुबई और बहमास के साथ ही प्रशांत महासागर के नोरफोक, वानुअतू, नोरू, कूक, टोंगा, समोआ जैसे द्वीप भी जुड़ते चले गए। इस धुरी से सिर्फ पनामा और कुछ हद तक उरुग्वे को अलग कहा जा सकता है। बीती एक शताब्दी में ये टैक्स हेवन प्रभावी वैश्विक ताकतों के परोक्ष समर्थन से फलते-फूलते रहे हैं।

1990 के दशक में यूरोपीय आयोग ने यूरोपीय संघ में कर अपवंचन की जांच करने का फैसला करने के बाद 206 टैक्स हेवन की शिनाख्त की थी। पिछले दो दशकों में इनकी संख्या बढ़ी ही है। 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद दबाव बढ़ने पर विकसित अर्थव्यवस्थाओं का ध्यान इन टैक्स हेवन के स्रोतों की ओर गया। 2009 में जी-20 की बैठक की आधिकारिक विज्ञप्ति में एक पूरा हिस्सा टैक्स हैवन को नियंत्रित करने पर केंद्रित था।

भारत ने 2009-14 के दौरान इन देशों के साथ दोहरा कर बचाव संधियों और कर सूचना विनिमय समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इसकी वजह से वित्तीय अपराधों और गड़बड़ियों से संबंधित सूचनाओं का साझा करना बहुपक्षीय व्यवस्था का हिस्सा बन गया है। इस तरह पिछली यूपीए सरकार ने ऐसे क्षेत्रों और टैक्स हेवन में भारतीय नागरिकों और कंपनियों से संबंधित सूचनाओं तक पहुंच बनाने की बुनियाद रखी।

ऐसे सारे समझौतों में गोपनीयता का प्रावधान होता है और उनमें स्पष्ट होता है कि इन सूचनाओं का उपयोग सिर्फ वैध अभियोजन और उससे संबंधित कामों के लिए किया जा सकता है और जिन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। ऐसी सूचनाओं को आम तौर पर सार्वजनिक किए जाने से दूसरे देश भारत के साथ इस तरह के समझौते करने से इन्कार कर सकते हैं, यहां तक कि जिन्होंने ऐसे समझौते कर रखे हैं, वे भी पीछे हट सकते हैं।


पिछले पांच वर्ष से काले धन के मुद्दे पर शोर मचाने वाली भाजपा और उसके सहयोगी संगठन इस सच्चाई से वाकिफ हैं। मगर उन्होंने राजनीतिक फायदे के लिए यह दुष्प्रचारित किया कि यूपीए कुछ छिपाना चाहता है। काले धन के मुद्दे की निगरानी कर रही सर्वोच्च अदालत द्वारा अलग-थलग कर दिए जाने के बाद एनडीए सरकार को मजबूर होकर यह कहना पड़ा है कि वह दूसरे देशों से प्राप्त नामों को तब तक सार्वजनिक नहीं करेगी, जब तक ऐसे लोगों और कंपनियों के विरुद्ध न्यायिक प्रक्रिया निर्णायक स्थिति में न पहुंच जाए। क्या यूपीए सरकार ने भी ऐसा ही नहीं कहा था? वास्तव में भाजपा का झूठ सामने आ गया है।

(लेखक पिछली यूपीए सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे)

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