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बढ़ती दूरियां चूकता निशाना
सुकांत नागार्जुन
Updated Tue, 11 Jun 2013 09:12 PM IST
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भाजपा का मौजूदा विवाद खुद पार्टी के लिए ही नहीं, राजग के भविष्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण सवाल बन गया है। इस प्रश्न की गंभीरता का अंदाजा बिहार की राजनीति से लगाया जा सकता है, जहां जनता दल (यूनाइटेड) और भाजपा का करीब 17 साल पुराना गठबंधन टूट की कगार पर पहुंच गया है।
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ऐसा होना तय भी था, क्योंकि नरेंद्र मोदी के संदर्भ में बिहार के मुखिया नीतीश कुमार अपनी आपत्तियां इतनी दूर तक ले गए हैं, जहां से उनकी वापसी की गुंजाइश नहीं है।
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और इन सबके बीच महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव के नतीजे ने जद (यू) और भाजपा के बीच बढ़ती दूरियों को ही उजागर किया है। बावजूद इसके कि इस उपचुनाव के नतीजे बहुत अप्रत्याशित नहीं हैं।
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दरअसल, महाराजगंज संसदीय उपचुनाव में नीतीश कुमार का तीर जिस तरह निशाने से चूका है, उसने राजग में बिखराव की प्रक्रिया तो तेज कर ही दी, खुद जद (यू) में भी घमासान पैदा कर दिया है।
उपचुनाव में जद (यू) प्रत्याशी व राज्य के मानव संसाधान विकास मंत्री प्रशांत कुमार शाही ने इस पराजय के लिए भाजपा के नेताओं-कार्यकर्ताओं के भीतरघात को जिम्मेदार बताते हुए गठबंधन पर पुनर्विचार की जरूरत जताई है।
मगर राजद नेता और महाराजगंज के नए ‘महाराज’ प्रभुनाथ सिंह ने चुनाव के दौरान जद (यू) के मंत्री विधायक और नेताओं से उन्हें सहयोग मिलने का खुलासा कर बिहार के सत्ताधारी समूह की राजनीतिक निष्ठा पर ही सवाल खड़ा कर दिया।
हालांकि यह चुनाव परिणाम राजनीति के विश्लेषकों की बड़ी जमात के लिए जिस तरह अप्रत्याशित नहीं है, वैसे ही चुनाव बाद जद (यू) का यह घमासान बिहार की मौजूदा सत्ता राजनीति के चाल-चरित्र के जानकारों के लिए प्रत्याशित ही है।
इसके बीज तभी पड़ गए थे, जब पीके शाही को महाराजगंज के वोटरों ने ऊपर से टपके बाहरी उम्मीदवार माना, जबकि 2009 का चुनाव जद (यू) प्रत्याशी के रूप में हारने के बावजूद प्रभुनाथ सिंह क्षेत्र में डटे रहे। रही-सही कसर नीतीश कुमार के मोदी विरोध ने निकाल दी।
आलम यह रहा कि महाराजगंज संसदीय क्षेत्र में ऊंची जातियों को नीतीश के सुर अपने विरोध की तरह लगे। वैसे राजग के समर्थक सामाजिक समूहों- भूमिहार और ब्राह्मण, का भी लालटेन को पसंद करना और अति पिछड़ा और महादलित समूह का किसी दबंग सामाजिक संरक्षण में मतदान केंद्रों तक आने की हिम्मत नहीं जुटा सकना भी जद (यू) की हार की वजह बनी। इसके अलावा राजनीतिक और चुनावी प्रबंधन के मोर्चे पर भी लालू नीतीश पर बीस साबित हुए।
बहरहाल, महाराजगंज उपचुनाव के परिणाम और नरेंद्र मोदी को चुनावी अभियान की कमान मिलने के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर दो स्तरों पर चलेगा- एनडीए के दोनों दलों में और जद (यू) के भीतर। बिहार में भाजपा और जद (यू) के रिश्ते पहले से ही समापन की ओर बढ़ रहे हैं, उसकी गति और तेज होगी। इन सबके बीच विश्लेषक 1994 के वैशाली संसदीय उपचुनाव भी याद कर रहे हैं, जिसमें सत्येंद्र नारायण सिंह की पत्नी किशोरी सिन्हा को जनता दल में लाकर उम्मीदवार बनाया गया था।
उनका मुकाबला युवा नेता आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद से था, जो बतौर निर्दलीय मैदान में थीं। उस उपचुनाव में भी जनता दल के बड़े-छोटे नेता क्षेत्र में रहते थे किशोरी सिन्हा के नाम पर और काम करते थे लवली आनंद के लिए। नतीजा प्रत्याशित ही रहा, और जीत लवली आनंद की हुई थी। इस उपचुनाव के दो-ढ़ाई महीने बाद ही समता पार्टी का गठन हुआ था।
मुद्दा, नीतीश कुमार का मोदी विरोध भी है। चुनावी अभियान की कमान मिलने के कारण परोक्ष रूप से मोदी ही भाजपा का चेहरा बन गए हैं, और नीतीश कुमार अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को मजबूत करने के लिए मोदी को किसी भी कीमत पर स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हैं।
हालांकि तमाम अंतर्विरोधों से जूझने के बाद भी भाजपा की बिहार इकाई अगर आज मोदी को स्वीकार करने को तैयार है और नीतीश पंथी सुशील कुमार मोदी भी नरेंद्र मोदी को खुद बिहार आने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं, तो इसकी स्पष्ट वजहें हैं। देखना दिलचस्प होगा कि आगामी 27 अक्तूबर को आयोजित की जा रही हुंकार रैली में शामिल होने के आमंत्रण को मोदी द्वारा स्वीकार करने पर राज्य की सियासत किस करवट बैठती है!