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दक्षिण में नए साथी की तलाश में भाजपा, आर. राजगोपालन से जानिए राजनीतिक समीकरण

Thu, 08 Oct 2020 02:29 AM IST
r.rajgopalan राजगोपालन आर. राजगोपालन
Updated Thu, 08 Oct 2020 02:29 AM IST
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BJP in search of new partner in South, Know political equations from R Rajagopalan
मुखौटा पहने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक। - फोटो : PTI

दक्षिण भारत की राजनीति में अचानक नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बढ़ती दिखाई दे रही है। जगन मोहन रेड्डी एनडीए में शामिल होने के इच्छुक हैं और उसी तरह चंद्रबाबू नायडू भी। दोनों नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करने के लिए एक-दूसरे से होड़ कर रहे हैं। वास्तव में छह दक्षिणी राज्यों में अजीब-सी स्थिति है।


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इसकी तुलना उत्तरी भारत के राज्यों से की जाए, जहां शिव सेना, शिरोमणि अकाली दल एनडीए के खेमे से बाहर हो गई हैं और लोजपा (लोक जनशक्ति पार्टी) ने बिहार में अलग राह चुन ली है, तो सवाल उठता है कि अचानक दक्षिण भारत के राजनीतिक दलों में एनडीए में शामिल होने की होड़ क्यों मची है।

बिहार में मुख्यमंत्री होने के नाते नीतीश कुमार आगामी विधानसभा चुनाव में एनडीए का चेहरा हैं। इसे संयोग ही कहेंगे कि बिहार के बाद तमिलनाडु में एनडीए ने अन्नाद्रमुक के पलानीस्वामी को आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपना चेहरा चुना है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी एनडीए ने अन्नाद्रमुक को ही अपना चेहरा बनाया था।

पलानीस्वामी और पन्नीरसेलवम के बीच गंभीर मतभेद के बावजूद अन्नाद्रमुक ने लोकतांत्रिक ढंग से पलानीस्वामी को अपना मुख्यमंत्री चुना। इस तरह की राजनीति उत्तर भारत में संभव नहीं है। वैसे जयललिता के बाद अन्नाद्रमुक ने जो भी कहा और किया, लेकिन वह एनडीए से अलग नहीं हुई। दो करोड़ कार्यकर्ताओं वाली पार्टी जया की मौत के बाद भी एनडीए के साथ जुड़ी रही। अप्रैल, 2021 में दक्षिण भारत के तीन राज्यों-केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। तीनों जगह अलग-अलग पार्टी की सरकार है।

लेकिन एक बात निश्चित है कि भाजपा ने केरल में सबरीमाला आंदोलन और तमिलनाडु में नीट परीक्षा विवाद के जरिये अपनी राह बनाई है। बेशक द्रमुक तमिलनाडु में हिंदी थोपने के मुद्दे को लेकर आंदोलनरत है, लेकिन भाजपा हिंदी विरोध को लेकर परेशान नहीं है, क्योंकि कम से कम 80 फीसदी प्रवासी बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य हिंदी भाषी क्षेत्रों से हैं। एक दशक पहले तमिलनाडु में ऐसा नहीं था। अब तमिलनाडु के सुदूर दक्षिण जिलों में हॉस्पिटैलिटी उद्योग, बुनकर, किसान आदि सभी क्षेत्रों में हिंदीवालों का वर्चस्व है। इसी प्रकार दक्षिण भारत के अन्य चार राज्यों में भी।

यह हैरानी की बात है कि जहां उद्धव ठाकरे और प्रकाश सिंह बादल केंद्र से नाराज हैं, चाहे नए कृषि कानून को लेकर हो या सीएए या अन्य कारणों से, वहीं जगन रेड्डी एनडीए में शामिल होने को इच्छुक हैं। हाल ही में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष जगन मोहन रेड्डी तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच एनडीए में शामिल होने को लेकर दो दौर की वार्ता हुई है। इनके बीच क्या बातें हुईं, इसको लेकर कयास लगाए जा रहे हैं, लेकिन अंदरूनी सूत्रों ने इस बात की पुष्टि की है कि वाईएसआर कांग्रेस मोदी मंत्रिमंडल में दो सीटें चाहती है।

पिछले चालीस वर्षों से दक्षिणी राज्यों की राजनीति पर नजर रखने के नाते मेरा मानना है कि मोदी-अमित शाह-नड्डा की तिकड़ी दक्षिण के छह राज्यों में भाजपा के लिए कम से कम 40 सीटें हासिल करने की रणनीति तैयार कर रही है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक और कर्नाटक में भाजपा मजबूत कैडर आधारित पार्टी है। तेलंगाना में भाजपा ने जड़ें जमा ली हैं, इसी तरह तमिलनाडु के कई जिलों में भाजपा के कार्यकर्ता मजबूत हैं, ऐसा पिछले छह या दस वर्षों में नहीं था।

जहां तक वाईएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी का सवाल है, वह इस दुविधा में फंसे हैं कि एनडीए में शामिल हों या नहीं। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि वह एनडीए में शामिल हो जाएं। हालांकि वाईएसआर प्रमुख को प्रलोभन दिया गया है, लेकिन स्थानीय राजनीतिक विचार उन्हें भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल होने से रोक रहे हैं।

वर्ष 2018 में चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व वाली तेदेपा के मोदी सरकार से बाहर हो जाने के बाद वाईएसआर कांग्रेस को एनडीए में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन जगन ने ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख को डर है कि एनडीए में शामिल होने से राज्य के मुस्लिम और ईसाई मतदाता उनके खिलाफ हो सकते हैं। राज्य की कुल आबादी में दस फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले अल्पसंख्यक जगन मोहन रेड्डी के कट्टर समर्थक हैं।

उन्हें यह भी चिंता है कि सरकार में शामिल होने से सरकार के साथ सौदेबाजी की उनकी शक्ति कम हो सकती है। उन्हें लगता है कि मुद्दा-आधारित समर्थन देते रहने से उन्हें मदद मिलेगी, क्योंकि तब केंद्र की विफलताओं के लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जाएगा।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के एक करीबी सहयोगी ने बताया कि, 'यह सही है कि हमें सरकार में शामिल होने का खुला प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन हमें स्थानीय विचारों को ध्यान में रखना होगा। ज्यादातर लोगों की राय सरकार में शामिल होने के खिलाफ है। खैर, हम सभी प्रमुख मुद्दों पर सरकार का समर्थन करते हैं। हमारा केंद्र के साथ बहुत अच्छा रिश्ता है।'

कुछ लोगों का कहना है कि अगर भाजपा तेदेपा प्रमुख नायडू के अमरावती भूमि घोटाले की सीबीआई जांच का आदेश देती है, तो जगन इस प्रस्ताव पर विचार कर सकते हैं। वह राज्य में चल रही कुछ परियोजनाओं को पूरा करने के लिए केंद्र से कुछ धन की भी उम्मीद कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल तेदेपा की जगह लेने की भाजपा की महत्वाकांक्षा बढ़ रही है। लेकिन अगर वाईएसआर कांग्रेस सरकार में शामिल होती है, तो इससे तेदेपा को पुनर्जीवित होने में मदद मिलेगी और भाजपा राज्य में आगे नहीं बढ़ पाएगी।

पिछले एक वर्ष में अपने दो पुराने सहयगियों -शिवसेना और शिरोमणि अकाली दल-को खो चुकी भाजपा फिलहाल नए साथी की तलाश में है, ताकि दुनिया को बता सके कि वह अब भी सहयोगियों के साथ काम करती है। अगर वाईएसआर कांग्रेस एनडीए में शामिल होती है, तो यह आंध्र प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव होगा। बहरहाल, हमें दिल थामकर इंतजार करना होगा कि क्या दक्षिण के ये राज्य 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को वांछित सफलता दिला पाएंगे!

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