फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   BIMSTEC nation first deal with own burden

पहले अपने बोझ से तो उबरें बिम्सटेक देश

Fri, 07 Mar 2014 07:25 PM IST
रहीस सिंह
रहीस सिंह Updated Fri, 07 Mar 2014 07:25 PM IST
विज्ञापन
BIMSTEC nation first deal with own burden

भारत में उदारीकरण की शुरुआत मनमोहन सिंह ने की थी। यह वही दौर था, जब दुनिया को बताया जा रहा था कि सोवियत नेतृत्व वाली राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था का अंत हो चुका है, और पूंजीवाद ही नियति है। पिछले दो दशकों में उदारीकरण की बयार खूब चली, लेकिन भारत इसका उतना फायदा नहीं उठा पाया, जितना चीन या दक्षिण पूर्व एशिया के देशों ने उठाया। वैश्वीकरण के लिए यह भी जरूरी था कि भारत यदि दुनिया की भौगोलिक सीमाओं को आच्छादित न कर सके, तो कम से कम अपने पड़ोसी देशों की भौगोलिक सीमाओं को अपनी बाजार की सीमाओं से आच्छादित कर दे। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने म्यांमार के नाएप्यीदॉ में बिम्सटेक के तीसरे शिखर सम्मेलन में जो बताने का प्रयास किया, क्या उसका सार्थक हल निकलने वाला है?

विज्ञापन


नाएप्यीदॉ शिखर वार्ता के दौरान मनमोहन सिंह ने न सिर्फ दूसरे देशों की शिकायतें सुनीं, बल्कि सदस्य देशों को हर तरह की सहायता का भरोसा दिलाया और मजबूती के साथ भारत का पक्ष भी रखा। इसके बावजूद कई शंकाएं हैं। दरअसल बिम्सटेक के सदस्य देश बांग्लादेश के साथ तीस्ता नदी बंटवारा संधि को लेकर भारत का संबंधों में अवरोध बना हुआ है, तो मानवाधिकार एवं तमिल समस्या को लेकर श्रीलंका से मनमुटाव है। शेष देशों से भले ही हमारे संबंध सामान्य हों, पर वे अपनी आंतरिक समस्याओं से बुरी तरह घिरे हुए हैं।
विज्ञापन


म्यांमार में बेशक लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल हो रही हो, पर वह उतनी प्राकृतिक नहीं है, जितनी दिख रही है। वहां यदि प्रस्तावित मैरिज बिल कानून की शक्ल ले लेता है, तो मानवाधिकार हनन का एक अध्याय और शुरू हो जाएगा। इस विधेयक के मुताबिक रोहिंग्या यदि बौद्ध समुदाय की किसी लड़की से बिना माता-पिता की अनुमति के शादी करता है, तो उसे 10 साल जेल की सजा हो सकती है। गौरतलब है कि रोहिंग्या समुदाय पहले ही संयुक्त राष्ट्र द्वारा दुनिया का सबसे सताया गया समूह घोषित किया जा चुका है। थाइलैंड भी अब हिंसा की राह पर चल पड़ा है। वर्षों के क्षेत्रीय विभाजन और वर्ग-भेदभाव ने वहां इस तरह के संकट को जन्म दिया है, जो अभी खत्म होने वाला नहीं है। ऐसे में, बिम्सटेक से क्या उम्मीद करें?
विज्ञापन
विज्ञापन


जून, 1997 में गठित बिम्सटेक का उद्देश्य मित्र देशों के बीच आपसी संबंधों को मजबूत करना था। पर पिछले सोलह वर्षों में ऐसा कुछ नहीं हुआ। हां, यह मंच भारत की ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ को जरूर प्रोत्साहन दे सकता है, क्योंकि इसके कुछ देश आसियान के भी सदस्य हैं। पर ध्यान देने लायक है कि 2004 में बिम्सटेक देशों के वित्त और व्यापार मंत्रियों ने मुक्त व्यापार क्षेत्र स्थापित करने पर सहमति कायम की थी और इसके लिए जून, 2010 की समय सीमा निर्धारित की थी। लेकिन शुल्क और छूट के आकार को लेकर मतभेद के कारण प्रस्तावित समझौते पर आज तक हस्ताक्षर नहीं हो पाए। जबकि यह समझौता होने पर आपसी व्यापार में शुल्क घटेगा और वस्तु, सेवा तथा निवेश क्षेत्र का उदारीकरण होगा। पर कुछ इसलिए नहीं हो पाया, क्योंकि या तो द्विपक्षीय संबंध अच्छे नहीं हैं या फिर हर देश अपने राष्ट्रीय हितों के कारण दूसरे देश को शंका की दृष्टि से देखता है।


इन देशों में दुनिया की 20 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या निवास करती है और उनका जीडीपी 2.5 लाख करोड़ डॉलर से ज्यादा है। भारत सहित एशिया के तमाम देश लंबे समय से आतंकवाद और दूसरी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। इससे उनका आर्थिक ढांचा कमजोर पड़ रहा है। बिम्सटेक के सभी देश मिलकर इन सबके खिलाफ साझा रणनीति बना सकते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed