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बिहार चुनाव की पहेली

Fri, 16 Oct 2015 06:14 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Fri, 16 Oct 2015 06:14 PM IST
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Bihar election puzzle

बिहार चुनावों के मद्देनजर चुनावी सर्वे एजेंसियां जिस तेजी के साथ अपने पूर्वानुमानों को अदल-बदल रही हैं, वह देखना वाकई दिलचस्प है। मजे की बात यह है कि ये बदलाव कुछ ही हफ्तों के भीतर देखने में आए हैं। हालांकि सामान्य समझ यह बताती है कि ज्यादातर मतदाता वास्तविक चुनाव से कुछ ही हफ्ते पहले अपना मन बनाते हैं। लेकिन अगर इन तमाम सर्वे की मानें, तो यही लगता है कि बिहारी मतदाताओं ने चुनावी विश्लेषकों को चकरा कर रख दिया है। अब आनंद बाजार पत्रिका समूह के लिए ए सी नीलसन के सर्वे को ही देखें। जुलाई में इसने दिखाया कि एनडीए 32 फीसदी वोट के साथ जदयू नेतृत्व वाले गठबंधन से पूरे 10 फीसदी वोट से पीछे है। तब इसका अनुमान था कि नीतीश-लालू मिलकर एनडीए की 112 सीटों की तुलना में 129 सीटें जीत रहे हैं। नरेंद्र मोदी की कुछ बड़ी सार्वजनिक सभाओं के बाद सितंबर में इसका यह अनुमान थोड़ा बदलता दिखा। तब नीतीश के गठबंधन को 122 सीटों के साथ एनडीए से महज चार सीटें आगे दिखाया गया। तब तक वोट शेयर के मामले में जदयू की बढ़त भी चार फीसदी प्वॉइंट तक आ गई। तब नीतीश के नेतृत्व वाले गठबंधन को भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन के 39 फीसदी वोट के मुकाबले 43 फीसदी वोट से आगे दिखाया जा रहा था।

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अक्तूबर के आते-आते ए सी नीलसन सर्वे का अनुमान एक दम से पलट गया। अब यह भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन को दो फीसदी वोट की बढ़त दिखा रहा है। इससे एनडीए को 128 सीटें और जदयू गठबंधन को 122 सीटें मिलती बताई गईं। मैंने ए सी नीलसन के एक वरिष्ठ चुनावी विश्लेषक से पूछा कि महज ढाई महीने के भीतर दस फीसदी प्वॉइंट वोट एनडीए के पाले में कैसे पहुंच गए। उनके मुताबिक, ऐसा तब होता है, जब खासकर चुनाव से ठीक पहले किसी एक पार्टी के पक्ष में जो माहौल है, उसमें एकदम से बदलाव आए। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि अक्तूबर की शुरुआत में कराए गए ताजा नीलसन सर्वे में गोमांस विवाद पर गौर नहीं किया गया है। दरअसल, भाजपा गोमांस विवाद के जरिये सांप्रदायिक आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण चाह रही है। मगर, इससे पार्टी को फायदा होगा या नुकसान, यह देखना अभी बाकी है। हालांकि नीलसन के अक्तूबर के सर्वे में मोहन भागवत के उस बयान पर जरूर ध्यान दिया गया है, जिसमें उन्होंने आरक्षण्ा की वर्तमान नीति पर पुनर्विचार की बात कही है। हैरत की बात है कि भाजपा खुद समझ रही है कि भागवत के बयान से उसे नुकसान ही पहुंचेगा।
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दिलचस्प बात यह है कि इंडिया टुडे समूह के लिए सिसरो ने जो चुनाव पूर्व सर्वे किया है, उसके नतीजे नीलसन से ठीक उलट हैं। एक महीने पहले सिसरो ने दिखाया था कि महागठबंधन की 106 सीटों की तुलना में एनडीए गठबंधन 125 सीटों के साथ कहीं आगे है। मगर अक्तूबर में जारी इसके ताजा सर्वे में जदयू गठबंधन को 122 सीटें और एनडीए को महज 111 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। साफ शब्दों में कहें, तो एबीपी-ए सी नीलसन सर्वे में माहौल को एनडीए के पक्ष में बनता हुआ, जबकि इंडिया टुडे-सिसरो सर्वे में इसे जदयू गठबंधन के पक्ष में बनता हुआ दिखाया जा रहा है।
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एक और दिलचस्प सर्वे इंडियन एक्सप्रेस के लिए सीएसडीएस लोकनीति का है। यह एनडीए गठबंधन के लिए चार फीसदी प्वॉइंट की बढ़त दिखा रहा है, मगर साथ ही, एनडीए के लिए एक आशंका की ओर भी इशारा कर रहा है। इसके अनुसार फिलहाल एनडीए समर्थकों में 12 फीसदी ऐसे हैं, जो ऐन चुनाव के दिन अपना मन बदल सकते हैं, जबकि जदयू के मामले में यह आठ फीसदी हैं।

सीएनएन-आईबीएन और एक्सिस समूह के एक दूसरे चुनाव पूर्व सर्वे में एनडीए गठबंधन की 95 सीटों की तुलना में जदयू गठबंधन की 137 सीटों के साथ जीत पक्की बताई गई है। यह सर्वे 243 निर्वाचन क्षेत्रों में 24 हजार लोगों से बात करके तैयार किया गया है, जिनमें 87 फीसदी ग्रामीण और 13 फीसदी शहरी हैं। गौरतलब है कि वोट देने वाली बिहार की 88 फीसदी आबादी नतीजों पर खासा असर डालेगी। इस सर्वे में यादवों और मुसलमानों को दिलचस्प ढंग से नीतीश के नेतृत्व वाले महागठबंधन के साथ दिखाया गया है। इसके मुताबिक, अलग-थलग यादव समूह या निर्दलीय यादव प्रत्याशी, जो भाजपा के साथ जुड़े हैं, उससे लालू के गढ़ को कोई खतरा नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि बिहार में यादवों और मुसलमानों के क्रमशः 32 और 35 फीसदी वोट हैं। सर्वे के मुताबिक कुर्मी और कोइरी समुदाय का ज्यादातर हिस्सा नीतीश के साथ है। बिहार चुनाव में अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी, जिनका तकरीबन 32 फीसदी वोट है। यह वर्ग काफी बिखरा हुआ है, और सबसे ज्यादा अनिश्चित वोटर इसी वर्ग में होंगे। उच्च जातियों का वोट (16 फीसदी) ज्यादातर भाजपा के साथ है। वोट करने वाली आबादी का तकरीबन 15 फीसदी हिस्सा दलित और महादलित का है। इसका एक हिस्सा एनडीए के सहयोगी रामविलास पासवान के साथ है।


इन सबके बीच एक बड़ी पहेली है। 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी का जादू अपने चरम पर था। तब भाजपा को अकेले 31 फीसदी वोट मिले थे। मगर इसका वोट शेयर 38 फीसदी से आगे नहीं बढ़ सका था। इतना तो तय है कि तब से लेकर आज तक मोदी और भाजपा की लोकप्रियता बढ़ी तो बिल्कुल नहीं है, थोड़ी घटी जरूर है। तो किस आधार पर कुछ सर्वे में एनडीए के पक्ष में चार से पांच फीसदी प्वॉइंट अतिरिक्त वोटों का झुकाव दिखाया जा रहा है? खासकर तब, जबकि नीतीश कुमार के खिलाफ राज्य में कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं है। सभी सर्वे में उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय उम्मीदवार भी बताया जा रहा है। यह पहेली आठ नवंबर को ही सुलझेगी, जब बिहार चुनाव के नतीजे सामने आएंगे।

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