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वैश्विक मंचों पर बढ़ता दायरा

Fri, 09 Sep 2016 08:07 PM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Updated Fri, 09 Sep 2016 08:07 PM IST
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सुरेंद्र कुमार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले जी-20 समूह के शिखर सम्मेलन और फिर आसियान शिखर सम्मेलन में जिस तरह से आतंकवाद, काला धन, भ्रष्टाचार आदि मुद्दों पर पूरी दृढ़ता के साथ भारत का पक्ष रखा, उससे किसी को अब संदेह नहीं रहेगा कि भारत का इन मुद्दों पर रुख क्या है। आतंकवाद के मुद्दे पर उन्होंने दोनों मंचों पर पाकिस्तान पर तीखा हमला किया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आह्वान किया कि आतंकवाद को प्रश्रय देने और उसे प्रायोजित करने वाले मुल्क को समर्थन देने के बजाय उस पर कड़े प्रतिबंध लगाने चाहिए।

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चीन की धरती का स्वर्ग माने जाने वाले ह्वांगझाउ में जी-20 शिखर सम्मेलन में आतंकवाद, काला धन, मनी लॉन्डरिंग, अवैध धन की सुरक्षित शरणस्थली और काले धन का पता लगाने तथा भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए जानकारी साझा करने के प्रति कुछ देशों/बैंकों की अनिच्छा जैसे मुद्दे उठाकर प्रधानमंत्री मोदी सबसे प्रखर वक्ता के रूप में उभरे। पाकिस्तान का नाम लिए बिना उन्होंने जोर देकर कहा कि दक्षिण एशिया का मात्र एक देश हमारे क्षेत्र में आतंक के इन एजेंटों को फैला रहा है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आतंकवाद के खतरे से लड़ने के लिए तत्काल एकजुट होकर इसके खिलाफ आवाज बुलंद करने और कार्रवाई करने का आह्वान किया।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक अपराधियों के सुरक्षित ठिकानों को खत्म करने, मनी लॉन्डरिंग के अपराधियों को प्रत्यर्पित करने और जटिल अंतरराष्ट्रीय नियमों तथा भ्रष्टाचारियों व उनके कामों को छिपाने वाले बैंकों की अतिगोपनीयता के जाल को खत्म करने के जी-20 के प्रयासों को भारत के समर्थन की बात की। काले धन और आर्थिक अपराधियों के प्रत्यर्पण पर उनका यह रुख आगामी कुछ राज्यों में होने वाले चुनाव में उन्हें फायदा दिला सकता है।
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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय वार्ता में मोदी ने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता का मुद्दा उठाया और पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरने वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर पर भारत की आपत्ति भी जताई। प्रधानमंत्री मोदी ने द्विपक्षीय रिश्तों को उपयोगी बनाने के लिए एक मंत्र भी सुझाया। वह यह था कि 'सकारात्मक रिश्तों को बढ़ावा देने के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हम एक-दूसरे की आकांक्षाओं, चिंताओं और सामरिक हितों का सम्मान करें। हमें नकारात्मक धारणाओं को रोकने की भी जरूरत है।' अब यह तो समय ही बताएगा कि इसका कोई सकारात्मक नतीजा निकलता है या नहीं। लेकिन पुराने रिकॉर्ड को देखें, तो ऐसी संभावना कम ही है।

मोदी ने अमेरिका, फ्रांस, अर्जेंटीना एवं तुर्की के राष्ट्रपति तथा ब्रिटेन व ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एवं सऊदी अरब के राजकुमार से भी संक्षिप्त वार्ता की। ओबामा के साथ सुखद बातचीत उन दोनों के सहज रिश्ते को दर्शाती है। भारत एनएसजी की सदस्यता के लिए तुर्की और अर्जेंटीना का समर्थन चाहता है। माना जाता है कि फ्रैंकोइस होलांद से बातचीत में उन्होंने स्कॉर्पीन पनडुब्बी के संवेदनशील डाटा लीक होने का मुद्दा भी उठाया। बेशक आतंकवाद और दक्षिण चीन सागर पर भारत और अमेरिका का रुख मोटे तौर पर एक ही है, लेकिन अमेरिका पेरिस समझौते की पुष्टि करने के लिए भारत पर दबाव डालने में संकोच नहीं करेगा। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के पुनर्गठन के मुद्दे पर अमेरिका समेत विकसित देश बहुत ज्यादा पेशकश नहीं करने वाले। मोदी ने जिस जोश के साथ आतंकवाद में पाकिस्तान की भूमिका को उजागर किया, उसमें अमेरिका, चीन, सऊदी अरब और तुर्की के लिए संदेश निहित था। शिनझियांग प्रांत में बढ़ती आतंकी गतिविधियों को देखते हुए हो सकता है कि चीन को मोदी के आतंकवाद विरोधी अभियान में कुछ अच्छाई दिखे। लेकिन पाकिस्तान का सदाबहार मित्र चीन उसे नहीं छोड़ेगा।

जी-20 समूह की बैठक के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने लाओस की राजधानी विएनताइन में आयोजित आसियान शिखर सम्मेलन में दृढ़ता से आतंकवाद, सुरक्षा, समुद्री गलियारा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क के मुद्दे पर भारत के रुख को स्पष्ट किया। उन्होंने पाकिस्तान का नाम लिए बिना आतंकवाद में उसकी गहरी संलग्नता को रेखांकित करते हुए अन्य देशों से जिक्र किया कि 'जिसका प्रतिस्पर्धी लाभ आतंकवाद को पैदा करने और उसके निर्यात पर टिका है' और आह्वान किया कि जो देश आतंकवाद को अपने नीतिगत हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है, उसके खिलाफ हमें कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने प्रतिभागी नेताओं से कहा कि अगर वे आतंकवाद के खिलाफ गंभीरता से लड़ना चाहते हैं, तो असली खलनायक पर हमला कीजिए।

उन्होंने अपने प्रिय विषय को भी दोहराया-आसियान भारत की लुक ईस्ट पॉलिसी के केंद्र में है और भारत की इसमें भागीदारी के केंद्र में कनेक्टिविटी (संपर्क) है। उन्होंने भारत और आसियान के बीच सहज डिजिटल कनेक्टिविटी के दृष्टिकोण की भी पेशकश की। उन्होंने कहा कि हम साइबर सुरक्षा, आतंकवाद और कट्टरता का मुकाबला करने में सहयोग बढ़ाने के लिए ठोस कदमों की अपेक्षा करते हैं। भारत आसियान के साथ आर्थिक गतिविधि बढ़ाना चाहता है।


जी-20 सम्मेलन में दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर ओबामा और शी जिनपिंग के बीच कोई सहमति नहीं बनी, ओबामा ने जहां अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत कानूनी दायित्व का अनुपालन नहीं करने पर परिणाम भुगतने की बात कही, वहीं जिनपिंग ने चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री अधिकार की रक्षा के दृढ़ संकल्प को रेखांकित किया। लेकिन इस मुद्दे पर खुली चर्चा रोकने में चीन सफल रहा। जी-20 के नेताओं ने, जो दुनिया की दो तिहाई आबादी, 85 फीसदी वैश्विक व्यापार और 90 फीसदी विश्व जीडीपी  का प्रतिनिधित्व करते हैं, महसूस किया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का विकास सुविचारित नीतियों और निकट सहयोग से ही हो सकता है।

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