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भारतभवनः एक और महाभारत
अरुण आदित्य
Updated Thu, 06 Sep 2012 06:02 PM IST
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एक जमाने में प्रख्यात व्यंग्यकार शरद जोशी ने भारत भवन को कल्चरल माफिया कहा था। उसके बाद भी समय-समय पर विवादों के केंद्र में रहने वाला भारत भवन एक बार फिर चर्चा में है। इस बार तीन कवियों राजेश जोशी, कुमार अंबुज और नीलेश रघुवंशी के एक संयुक्त वक्तव्य के बाद यह सिलसिला शुरू हुआ है। इन तीनों लेखकों ने प्रगतिशील जनवादी लेखकों से मप्र. के भारत भवन, साहित्य परिषद, उर्दू अकादमी और कला परिषद सहित कुछ सरकारी संस्थानों के बहिष्कार की अपील की है।
अपील के मुताबिक, `वर्तमान सरकार की अन्यथा स्पष्ट सांस्कृतिक नीतियों के चलते, इन संस्थानों का और साथ ही प्रदेश की मुक्तिबोध, प्रेमचंद और निराला सृजनपीठों का, वागर्थ, रंगमंडल आदि विभागों का, पिछले आठ-नौ वर्षों में सुनियोजित रूप से पराभव कर दिया गया है।
इन संस्थाओं के न्यासियों, सचिवों, उपसचिव और अध्यक्ष पदों पर, जहां हमेशा ही हिन्दी साहित्य के सर्वमान्य और चर्चित लेखकों-कलाकारों की गरिमामय उपस्थिति रही, वहां अधिकांश जगहों पर ऐसे लोगों की स्थापना की जाती रही है, जो किसी भी प्रकार से साहित्य या कला जगत के प्रतिनिधि हस्ताक्षर नहीं हैं। उनका हिन्दी साहित्य की प्रखर, तेजस्वी और उस धारा से जो निराला, प्रेमचंद, मुक्तिबोध से निसृत होती है, कोई संबंध नहीं बनता है। उनका हिन्दी साहित्य की विशाल परम्परा एवं समकालीन कला-साहित्य से गंभीर परिचय तक नहीं है, जिनकी हिन्दी साहित्य और वैश्विक साहित्य की समझ स्पष्ट रूप से संदिग्ध है। उनमें से अधिकांश की एकमात्र योग्यता सिर्फ यह है कि उनका वर्तमान सरकार की मूल राजनैतिक पार्टी या उनके अनुषंग संगठनों से जुड़ाव, सक्रियता और समर्थन है।’
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इन तीन लेखकों में से राजेश जोशी और नीलेश रघुवंशी जनवादी लेखक संघ से संबद्ध हैं और कुमार अंबुज प्रगतिशील लेखक संघ से। दोनों संगठनों की अपनी राजनीतिक लाइन है। तो क्या इस विरोध की वजह राजनीतिक है? इस बारे में वक्तव्य में साफ किया गया है, 'हमारा विरोध किसी राजनैतिक अनुशंसा से उतना नहीं है, क्योंकि व्यवस्था में इन पदों पर पहले भी राजनैतिक अनुशंसाओं से लोग नामित किए जाते रहे हैं, लेकिन वे सब असंदिग्ध रूप से हमारे समकालीन साहित्य के मान्य, समादृत हस्ताक्षर रहे हैं। यहां प्रश्न राजनैतिक पक्षधरता का न होकर, वामपंथी अथवा दक्षिणपंथी पदावलियों से भी बाहर, व्यापक रूप से उन लोगों की वर्तमान उपस्थिति से है, जिनमें से अधिकांश की कोई साहित्यिक पहचान नहीं है, कोई साहित्यिक कद नहीं है। उनका हमारी परंपरा, लेखकीय अस्मिता और समकालीनता से भी कोई संबंध नहीं बैठाया जा सकता।’
दोनों लेखक संघ अनौपचारिक तौर पर अपने सदस्यों को इन संस्थानों में भागीदारी न करने के सुझाव देते रहे हैं। लेकिन अलग-अलग तर्क का सहारा लेकर अनेक लेखक इन आयोजनों में भागीदारी करते रहे हैं। ऐसे लेखकों के बारे में यह वक्तव्य कहता है, 'इस भागीदारी से इन लेखकों ने प्रदेश के राजनैतिक-सांस्कृतिक कायांतरण में जाने-अनजाने ही अपना सहयोग, अपना तर्क और समर्थन दे दिया। उनके उदाहरण की ओट में दूसरे अपना औचित्य प्रतिपादित कर सकते हैं कि एक कहावत का सहारा लेकर कहें तोः ‘जब सोने में ही जंग लगने लगेगी तो फिर लोहा क्या करेगा।’
ईमेल के जरिए यह वक्तव्य जारी होते ही हलचल मच गई। भारत भवन के कार्यक्रमों में शामिल हो चुके कथाकार चंदन पांडेय ने सवाल किया, 'कृपया उन लोगों के नाम भी बताइए जो इन न्यासों/ पीठों/ अकादमियों के निर्णायक पदों पर आसीन हैं। अगर उनकी उपलब्धियां मालूम हो सकें, तो निर्णय लेने में सुविधा होगी। निमंत्रणकर्ता की उपलब्धियों को आधार बना कर कार्यक्रम में शिरकत करना भी एक किस्म की ज्यादती है, इसलिए मैं समझता हूं कि जब तक कोई गलत आदमी/ अपराधी का निमंत्रण न हो, तब तक शिरकत हो, बशर्ते आप सामने वाले की नीतियों से सहमत हों।’
साइबर स्पेस में इस वक्तव्य के फैलते ही वाद-विवाद का दौर शुरू हो गया। अशोक कुमार पांडेय ने इसे जनपक्ष ब्लॉग पर लगाया, तो ओम निश्चल ने कमेंट किया, `जब अशोक वाजपेयी थे तब भी एक समुदाय भारत भवन को संस्कृति का अजायबघर कह रहा था। वे नहीं है तब भाजपा शासन काल में भी यह हाल है जिसका बयान यह वक्तव्य करता है। सवाल केवल मप्र. के संस्थानों का सम्मान बचाने का नहीं है, दूसरे प्रदेशों में क्या हो रहा है, यह भी देखने का है।’ युवा कवि हरिओम राजोरिया ने भी राजेश जोशी को सवालों में घेरने की कोशिश की, `अशोक इस पोस्ट में जो बातें कही गई हैं उनसे मेरी सहमति है। इस विरोध को लेखक संगठनों के माध्यम से आना चाहिए था, पर ऐसा हुआ नहीं। इस मंशा को भी समझना होगा। राजेश जोशी जी का एक फोटो मैंने तुम्हारी वॉल पर शेयर किया है, यह क्या है?’
सफाई में राजेश जोशी का एक पूरक पत्र जारी किया गया, जिसमें उन्होंने लिखा, `मुझे ज्ञात हुआ है कि भारत भवन में युवा-3 के अवसर पर दीप जलाते हुए मेरी एक तस्वीर किसी मित्र ने अपनी फेसबुक पर लगाई है। मैं एक दर्शक के रूप में ही वहां गया था और बतौर एक श्रोता उपस्थित था।’ राजेश की इस सफाई पर हरिओम ने एक और सवाल उठाया, 'हम नुक्ता में तो जाएंगे पर पंगत में नहीं बैठेंगे, इसका क्या मतलब है?’
पार्टनर! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? बार-बार पूछे जा रहे इस सवाल के जवाब में राजेश जोशी ने अपने पत्र में विश्वास दिलाया है, ‘साथियो, इंतजार करें और भरोसा भी। हमारा ‘स्टैण्ड’ स्पष्ट है और उस पर हम कायम हैं।’
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अपील के मुताबिक, `वर्तमान सरकार की अन्यथा स्पष्ट सांस्कृतिक नीतियों के चलते, इन संस्थानों का और साथ ही प्रदेश की मुक्तिबोध, प्रेमचंद और निराला सृजनपीठों का, वागर्थ, रंगमंडल आदि विभागों का, पिछले आठ-नौ वर्षों में सुनियोजित रूप से पराभव कर दिया गया है।
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इन संस्थाओं के न्यासियों, सचिवों, उपसचिव और अध्यक्ष पदों पर, जहां हमेशा ही हिन्दी साहित्य के सर्वमान्य और चर्चित लेखकों-कलाकारों की गरिमामय उपस्थिति रही, वहां अधिकांश जगहों पर ऐसे लोगों की स्थापना की जाती रही है, जो किसी भी प्रकार से साहित्य या कला जगत के प्रतिनिधि हस्ताक्षर नहीं हैं। उनका हिन्दी साहित्य की प्रखर, तेजस्वी और उस धारा से जो निराला, प्रेमचंद, मुक्तिबोध से निसृत होती है, कोई संबंध नहीं बनता है। उनका हिन्दी साहित्य की विशाल परम्परा एवं समकालीन कला-साहित्य से गंभीर परिचय तक नहीं है, जिनकी हिन्दी साहित्य और वैश्विक साहित्य की समझ स्पष्ट रूप से संदिग्ध है। उनमें से अधिकांश की एकमात्र योग्यता सिर्फ यह है कि उनका वर्तमान सरकार की मूल राजनैतिक पार्टी या उनके अनुषंग संगठनों से जुड़ाव, सक्रियता और समर्थन है।’
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इन तीन लेखकों में से राजेश जोशी और नीलेश रघुवंशी जनवादी लेखक संघ से संबद्ध हैं और कुमार अंबुज प्रगतिशील लेखक संघ से। दोनों संगठनों की अपनी राजनीतिक लाइन है। तो क्या इस विरोध की वजह राजनीतिक है? इस बारे में वक्तव्य में साफ किया गया है, 'हमारा विरोध किसी राजनैतिक अनुशंसा से उतना नहीं है, क्योंकि व्यवस्था में इन पदों पर पहले भी राजनैतिक अनुशंसाओं से लोग नामित किए जाते रहे हैं, लेकिन वे सब असंदिग्ध रूप से हमारे समकालीन साहित्य के मान्य, समादृत हस्ताक्षर रहे हैं। यहां प्रश्न राजनैतिक पक्षधरता का न होकर, वामपंथी अथवा दक्षिणपंथी पदावलियों से भी बाहर, व्यापक रूप से उन लोगों की वर्तमान उपस्थिति से है, जिनमें से अधिकांश की कोई साहित्यिक पहचान नहीं है, कोई साहित्यिक कद नहीं है। उनका हमारी परंपरा, लेखकीय अस्मिता और समकालीनता से भी कोई संबंध नहीं बैठाया जा सकता।’
दोनों लेखक संघ अनौपचारिक तौर पर अपने सदस्यों को इन संस्थानों में भागीदारी न करने के सुझाव देते रहे हैं। लेकिन अलग-अलग तर्क का सहारा लेकर अनेक लेखक इन आयोजनों में भागीदारी करते रहे हैं। ऐसे लेखकों के बारे में यह वक्तव्य कहता है, 'इस भागीदारी से इन लेखकों ने प्रदेश के राजनैतिक-सांस्कृतिक कायांतरण में जाने-अनजाने ही अपना सहयोग, अपना तर्क और समर्थन दे दिया। उनके उदाहरण की ओट में दूसरे अपना औचित्य प्रतिपादित कर सकते हैं कि एक कहावत का सहारा लेकर कहें तोः ‘जब सोने में ही जंग लगने लगेगी तो फिर लोहा क्या करेगा।’
ईमेल के जरिए यह वक्तव्य जारी होते ही हलचल मच गई। भारत भवन के कार्यक्रमों में शामिल हो चुके कथाकार चंदन पांडेय ने सवाल किया, 'कृपया उन लोगों के नाम भी बताइए जो इन न्यासों/ पीठों/ अकादमियों के निर्णायक पदों पर आसीन हैं। अगर उनकी उपलब्धियां मालूम हो सकें, तो निर्णय लेने में सुविधा होगी। निमंत्रणकर्ता की उपलब्धियों को आधार बना कर कार्यक्रम में शिरकत करना भी एक किस्म की ज्यादती है, इसलिए मैं समझता हूं कि जब तक कोई गलत आदमी/ अपराधी का निमंत्रण न हो, तब तक शिरकत हो, बशर्ते आप सामने वाले की नीतियों से सहमत हों।’
साइबर स्पेस में इस वक्तव्य के फैलते ही वाद-विवाद का दौर शुरू हो गया। अशोक कुमार पांडेय ने इसे जनपक्ष ब्लॉग पर लगाया, तो ओम निश्चल ने कमेंट किया, `जब अशोक वाजपेयी थे तब भी एक समुदाय भारत भवन को संस्कृति का अजायबघर कह रहा था। वे नहीं है तब भाजपा शासन काल में भी यह हाल है जिसका बयान यह वक्तव्य करता है। सवाल केवल मप्र. के संस्थानों का सम्मान बचाने का नहीं है, दूसरे प्रदेशों में क्या हो रहा है, यह भी देखने का है।’ युवा कवि हरिओम राजोरिया ने भी राजेश जोशी को सवालों में घेरने की कोशिश की, `अशोक इस पोस्ट में जो बातें कही गई हैं उनसे मेरी सहमति है। इस विरोध को लेखक संगठनों के माध्यम से आना चाहिए था, पर ऐसा हुआ नहीं। इस मंशा को भी समझना होगा। राजेश जोशी जी का एक फोटो मैंने तुम्हारी वॉल पर शेयर किया है, यह क्या है?’
सफाई में राजेश जोशी का एक पूरक पत्र जारी किया गया, जिसमें उन्होंने लिखा, `मुझे ज्ञात हुआ है कि भारत भवन में युवा-3 के अवसर पर दीप जलाते हुए मेरी एक तस्वीर किसी मित्र ने अपनी फेसबुक पर लगाई है। मैं एक दर्शक के रूप में ही वहां गया था और बतौर एक श्रोता उपस्थित था।’ राजेश की इस सफाई पर हरिओम ने एक और सवाल उठाया, 'हम नुक्ता में तो जाएंगे पर पंगत में नहीं बैठेंगे, इसका क्या मतलब है?’
पार्टनर! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? बार-बार पूछे जा रहे इस सवाल के जवाब में राजेश जोशी ने अपने पत्र में विश्वास दिलाया है, ‘साथियो, इंतजार करें और भरोसा भी। हमारा ‘स्टैण्ड’ स्पष्ट है और उस पर हम कायम हैं।’