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मन की आंखों से देखने वाला
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 01 Feb 2013 12:39 AM IST
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हमारे नीतिग्रंथों में कई ऐसे प्रसंग हैं, जिसमें बताया गया है कि असल चक्षु वह नहीं है, जिससे हम देखते हैं, बल्कि मन की आंखों से देखने वाला व्यक्ति ही असली चक्षुवान है। जिसने मन की आंखें जागृत कर लीं, समझो, उसने दिव्य चक्षु पा लिया है।
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एक बार महाप्रभु वल्लभाचार्य जी अडैल से वृंदावन आ रहे थे। जमदग्नि मुनि के आश्रम के पास उन्होंने एक नेत्रहीन के मुख से सुना- अबके माधव मोहि उधारि, मगन हौ भव अंबु निधि में कृपासिंधु मुरारि। महाप्रभु गायक के पास पहुंचे और बोले, तुम्हारे गीत में संवेदनशीलता है, तुम्हारा गला सुरीला है। तुम भगवान के सामने रिरियाते क्यों हो? तुम प्रभु श्रीकृष्ण की बाल-लीला का गायन करो।
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तुम्हारे लिखे गीत भक्ति की भागीरथी प्रवाहित करेंगे। यही युवक वल्लभाचार्य जी का आशीर्वाद पाकर सूरदास के नाम से विख्यात हुआ। उसके सिर पर महाप्रभु का हाथ रखे जाते ही जैसे उसकी अंदर की आंखें खुल गईं। महाप्रभु उन्हें वृंदावन ले आए और श्रीनाथ मंदिर में आरती के समय नया पद सुनाने का आदेश दिया। वह श्रीकृष्ण लीला का सजीव वर्णन करते, तो बड़े-बड़े आचार्य भाव-विभोर हो उठते।
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एक दिन मंदिर के पुजारी ने श्रीकृष्ण के विग्रह को कोई पोशाक नहीं पहनाई। सूरदास से कहा गया, ठाकुर की शोभा का वर्णन करो। सूरदास ने गाया- देखी री हरि नंगम नंगा। पुजारी सूरदास के चरणों में झुक गया।