श्रीलंका से दोस्ती और चीन पर नजर
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श्रीलंका में गोतबाया राजपक्षे के राष्ट्रपति पद पर आसीन होने के क्या मायने हैं? या नेपाल ने कालापानी की हदों पर ऐतराज क्यों दर्ज कराया है? ऐसे ही कुछ सवाल इन दिनों भारत के कूटनीतिक गलियारों में बड़ी तेजी से उभरे हैं। और इनका उभरना भी बेवजह नहीं है। भूटान को छोड़कर भारत के करीब-करीब सारे पड़ोसी देशों में चीन की मौजूदगी ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति का संतुलन खासा गड़बड़ा दिया है। अपनी व्यापारिक पहुंच में इजाफा करने की चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट और सड़क योजना ने एक विश्वव्यापी विवाद खड़ा कर दिया है। श्रीलंका में हम्बनटोटा बंदरगाह पर कब्जा, मालदीव में कर्ज का फंदा और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर भारत और पाकिस्तान के उथल-पुथल से लबालब बलूचिस्तान इलाके की क्रुद्ध प्रतिक्रिया उन चंद हालिया गतिविधियों में शामिल हैं, जिनसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय चिंतित है।
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नेपाल चीन की उक्त बेल्ट एवं सड़क पहल (बीआरआई) को एक संभाव्य जीवन रेखा के रूप में देखता है। पहाड़ों से गुजरते हुए रेलमार्ग का काम 2013 में शुरू हुआ, जो नेपाल की दृष्टि में आर्थिक वरदान साबित होगा और भारत की आर्थिक प्रभुसत्ता से उबरने का रास्ता भी। 2015 में भारत ने मधेसी अल्पसंख्यकों के अधिकारों के मुद्दे पर काठमांडू के अधिकारियों पर दबाव डालने हेतु पांच महीनों के लिए नेपाल की आर्थिक नाकाबंदी कर उसकी अर्थव्यवस्था पर शिकंजा कस दिया था। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, नेपाल का सकल घरेलू उत्पाद तीन प्रतिशत गिर गया, गरीबी आठ प्रतिशत बढ़ गई और मुद्रास्फीति 12 प्रतिशत पर जा पहुंची और खाद्यान्न और औषधियों की कमी से अनेक लोगों की जानें चली गईं। इससे नेपाल के भू-राजनीतिक तारणहार के रूप में चीन को राजनीतिक रूप से पेश किया गया। इसे नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा ओली की जीत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि चीनी मदद का समर्थन उनके चुनाव अभियान का एक हिस्सा था।
कहने की आवश्यकता नहीं कि नेपाल में पहले से ही मौजूद भारत विरोधी भावनाओं को अच्छी खासी हवा मिल रही है और ये भावनाएं दिन दूनी और रात चौगुनी गति से बढ़ रही हैं। वैसे भी नेपाल भारत के ‘बड़े भाई’ वाले रवैये के शुरू से ही खिलाफ रहा है। श्रीलंका पर भी यही बात लागू होती है, जहां 2014 में ही चीन ने पैर फैलाने शुरू कर दिए थे। आज वह इस द्वीप पर अच्छे-खासे पैर पसार चुका है। इन्हीं गोतबाया राजपक्षे के भाई महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में हम्बनटोटा बंदरगाह और विमानतल बनाने का ठेका चीन को दिया गया था। जानकार सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि श्रीलंका पर चीन का कर्ज इतना ज्यादा बढ़ गया था कि हम्बनटोटा बंदरगाह राजपक्षे ने यों ही चीन के हवाले कर दिया।
और तो और, इन्हीं महिंदा राजपक्षे ने नई दिल्ली को सूचित किए बगैर चीनी पनडुब्बियों को श्रीलंकाई जलसीमा में ठहरने की अनुमति दे दी थी। भारत ने उसी समय यह मामला उच्चतम स्तर पर उठाया था, किंतु राजपक्षे टस से मस नहीं हुए थे। दरअसल श्रीलंका की अर्थव्यवस्था और रणनीतिक सुरक्षा में चीन फिलहाल बड़ा खिलाड़ी है। श्रीलंका पर चीन का कर्ज इतना ज्यादा है कि उसे चुकाने में काफी वक्त लगेगा। अत: रणनीतिक और सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से भारत को श्रीलंका से अपने संबंधों को पुन: परिभाषित करना पड़ेगा। लगता है, भारत इसमें प्रयासरत है भी। जिस दिन श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे घोषित हुए, उसी दिन भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर नवनिर्वाचित राष्ट्रपति गोताबाया राजपक्षे को बधाई देने और उन्हें भारत आगमन हेतु आमंत्रित करने कोलंबो रवाना हो गए। श्रीलंकाई राष्ट्रपति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आमंत्रण पर 29 नवंबर को भारत आ रहे है। उनसे विभिन्न मुद्दों पर चर्चा होना स्वाभाविक भी है।
बहरहाल, चीन का मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर में भारत को घेरना नजर आता है। दरअसल श्रीलंका ‘मोतियों की लड़ी’ (स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स) का एक हिस्सा है। यह लड़ी हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी इरादों का एक बहुत पुराना भू-राजनीतिक सिद्धांत है, जो चीनी मुख्य भूभाग और पोर्ट सूडान के बीच पड़ने वाले देशों में चीन द्वारा विकसित की गई सैन्य और व्यापारिक सुविधाओं के नेटवर्क की स्थापना की ओर इंगित करती है। चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' का जवाब भारत की 'लुक ईस्ट पालिसी' को समझा जाता है।
लुक ईस्ट पालिसी शीत युद्ध के बाद के दौर में भारत की विदेश नीति की एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में उभरी थी। 1991 में इसे नरसिंहराव की सरकार ने लागू किया था। इसका उद्देश्य दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों से राजनीतिक संपर्क विकसित करना, आर्थिक एकात्मकता बढ़ाना और सुरक्षा सहयोग स्थापित करना था।
गौरतलब है कि इस नीति से भारत के राष्ट्रीय हितों के प्रति दक्षिणपूर्व एशिया के रणनीतिक और आर्थिक महत्व से दुनिया के बारे में भारत की समझ में बहुत परिवर्तन आया। इस नीति का दूसरा चरण 2003 में शुरू हुआ, जिसमें इस नीति का विस्तार ऑस्ट्रेलिया से पूर्वी एशिया तक हुआ जिसके सिरे पर आसियान (असोसिएशन ऑफ साउथईस्ट एशियन नेशंस) देश थे। इस नए चरण में फोकस व्यापार से बढ़कर वृहत्तर आर्थिक व सुरक्षा सहयोग, राजनीतिक भागीदारी और सड़क व रेलमार्ग के माध्यम से भौतिक संयोजकताओं तक जा पहुंचा है।
विश्व परिदृश्य के अध्येताओं का मानना है कि चीन का सबसे ज्यादा फोकस व्यापारिक है और किसी भी निवेशकर्ता का पहला उद्देश्य होता है अपने निवेश की रक्षा करना। फिर चीन विश्व बाजार पर कब्जा करने के लिए काफी लालायित है। फिर भी कहना मुश्किल है कि चीन कब व्यापारिक सुविधाओं का उपयोग रणनीतिक या सैन्य उद्देश्यों के लिए करने लगे। हम्बनटोटा बंदरगाह पर चीनी कब्जे से भारत की चिंता का कारण यही है, हालांकि वैश्विक परिदृश्य के मद्देनजर ऐसा होना सरल नहीं है।