फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   battle with Corona: This is not an era of logic read P Chidambaram article

कोरोना से लड़ाई में कोताही: यह तर्क का युग नहीं है

Sun, 16 May 2021 04:34 AM IST
पी. चिदंबरम पी चिदंबरम
पी चिदंबरम Published by: पी. चिदंबरम Updated Sun, 16 May 2021 04:34 AM IST
विज्ञापन
battle with Corona: This is not an era of logic read P Chidambaram article
corona virus in India - फोटो : PTI

भारत के लोग-या कहें आबादी का बड़ा हिस्सा-उस स्थिति तक पहुंच गए हैं, जहां उन्हें लगता है कि उन्हें अपना जीवन बचाने के लिए केवल खुद पर और अपने परिजनों तथा दोस्तों पर भरोसा करना होगा। कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में राज्य, विशेष रूप से केंद्र सरकार ने मायूस किया है। केरल और ओडिशा जैसी कुछ राज्य सरकारों का ही थोड़ा भरोसा कायम है। चूंकि तमिलनाडु और पुडुचेरी में सरकार बदली है, तो उनके बारे में राय बनाने के लिए थोड़ा इंतजार करना होगा।


loader

कोई भी पार्टी दोष से बच नहीं सकती। कुछ ने बाधाओं के बावजूद कठोर प्रयास किए हैं, कुछ लड़खड़ाई हैं, और कुछ ने तथ्यों को दफन कर दिया और झांसा देने पर भरोसा किया। पीड़ित तो लोग हैं।

इस भयानक स्थिति के लिए मुख्य रूप से कौन जिम्मेदार है, इसका जवाब तर्क से नहीं मिलेगा, क्योंकि यह तर्क का युग नहीं है। इसके बजाय, कुछ निर्विवाद तथ्यों को फिर से बताना और हर व्यक्ति से अपेक्षा करना कि वह उस प्रश्न का उत्तर दे, राजनीतिक कौशल है। नीचे मैं अपनी सूची दे रहा हूं :

मांग बनाम आपूर्ति


1. बुनियादी टेबिल

 
समावेशन की तिथि                    लक्षित समूह                                       अनुमानित आबादी

16-01-2021                          स्वास्थ्य सेवा कर्मचारी                                70 लाख

                                            ग्रिम मोर्चे के कर्मचारी                              200 लाख                                                                              

01-03-2021                          साठ वर्ष से अधिक उम्र के लोग                              2,600 लाख                          

                                            और 45-59 वर्ष के ऐसे लोग जो किसी बीमारी से ग्रस्त हैं

01-04-2021                          अन्य 45-59 वर्ष के लोग


01-05-2021                          18-44 वर्ष के लोग                                        7,300 लाख

हर लक्षित समूह का अनुमानित आकार उपलब्ध है और सरकार को इसकी जानकारी थी। लिहाजा, हर लक्षित तारीख पर मांग की ओर जो संख्या जुड़ती, वह गणना योग्य थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इस तरह टीके की खुराक की आवश्यक संख्या हो गई, मांग की संख्या गुणा दो। वैक्सीन को लेकर शुरुआती हिचक के बाद, टीके की संभावित खुराक की गणना करना संभव था। लेकिन यह भी कभी नहीं किया गया।

2. दोनों भारतीय निर्माताओं, सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बॉयोटेक की नियत क्षमता से सरकार वाकिफ थी। फैक्टरी के मुआयने और आवर्ती ऑडिट के जरिये वास्तविक निर्माण क्षमता और आनुपातिक वृद्धि का पता लगाया जा सकता था।      

टीके के बिना टीकाकरण!

3. सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बॉयोटेक को स्पष्ट आदेश 11.01.2021 को ही जारी किए गए। इन दोनों कंपनियों ने शुरुआती आपूर्ति खुद के जोखिम से किए गए निर्माण से की। इस तरह इन दोनों कंपनियों को उत्पादन वृद्धि के लिए प्रोत्साहित करने में देर हुई।

4. कम से कम एक कंपनी (सीरम इंस्टीट्यूट) और संभवतः दोनों को क्षमता बढ़ाने के लिए फंड की जरूरत थी। क्षमता वृद्धि के लिए वित्तीय मदद को आज की तारीख तक मंजूरी नहीं मिली है। आपूर्ति अग्रिम की घोषणा 19 अप्रैल, 2021 को की गई थी, लेकिन यह आपूर्ति के लिए अग्रिम भुगतान था, न कि क्षमता बढ़ाने के लिए पूंजीगत अनुदान या ऋण।

5.  भारत निर्मित टीकों के निर्यात को मार्च, 2021 तक मंजूरी जारी रही। निर्यात को 29 मार्च, 2021 को प्रतिबंधित किया गया। इस बीच, टीके की 5.8 करोड़ खुराक का निर्यात हो चुका था।

6. फाइजर के टीके के आपात उपयोग की मंजूरी पर अड़ंगा लगाया गया, जिससे फाइजर ने अपना आवेदन ही वापस ले लिया। तीसरे टीके स्पुतनिक वी को 12 अप्रैल 2021 को ही आपात उपयोग की मंजूरी मिल सकी और इसकी पहली खेप एक मई, 2021 को भारत पहुंच सकी। आज की तारीख तक किसी और टीके के इस्तेमाल या भारत में आयात की मंजूरी नहीं मिली है।

7. 2020 में जो अतिरिक्त स्वास्थ्य ढांचा खड़ा किया गया था, उसे अक्तूबर, 2020 के बाद ढहा दिया गया और मार्च, 2021 में दूसरी लहर के आने के बाद उसे फिर से खड़ा करना पड़ा, जिससे अस्पतालों में बिस्तर, वेंटिलेटर और ऑक्सीजन टैंकर/ कंसंट्रेटर्स पर असहनीय दबाव पड़ा।

8. पहली लहर के स्थिर हो जाने के बाद जांच में भी भारी गिरावट आ गई। जब जांच के सैंपल की संख्या कम होगी, तो नए संक्रमित लोगों की संख्या भी गिरेगी। जांच नहीं बढ़ाई गई। सूरज जब चमक रहा था, तब छत ठीक नहीं थी और जब बारिश हो रही थी, तो छत टपक रही है।

9. रोजाना लगाए जाने वाले टीके की खुराकों की संख्या बढ़ने के बजाय घट रही है। दो अप्रैल, को उल्लेखनीय 42,65,157 खुराक लगाई गई। अप्रैल में रोजाना का औसत हालांकि सिर्फ तीस लाख ही था। मई में रोजाना का औसत और नीचे गिरकर 18.5 लाख रह गया है। टीकाकरण कार्यक्रम का दम टीके की कमी से घुट रहा है।

इन्कार, और इन्कार

10. आपात स्थिति में संभावित संसाधनों का मानचित्रण करने और दोहन करने की कोई योजना नहीं थी। उदाहरण के लिए, ऑक्सीजन के स्रोतों को बढ़ाने, नाइट्रोजन/ऑर्गन टैंकर्स को ऑक्सीजन टैंकर्स में बदलने, ऑक्सीजन के लिए पीएसए संयंत्र के निर्यात और उन्हें खड़ा करने तथा ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स तथा वेंटिलेटर्स के निर्यात की कोई योजना नहीं थी। नर्सों तथा पैरा मेडिकल कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने की कोई योजना नहीं थी।

11. जब दूसरी लहर शुरू हुई थी, तब यह माना गया कि यह पहली लहर की तरह होगी, धीरे से बढ़ेगी, उसके बाद स्थिर होगी और फिर उतरने लगेगी। अन्य संभावित परिदृश्यों यहां तक कि सबसे बदतर परिदृश्य के बारे में सोचा तक नहीं गया। यह माना जा सकता है कि तीसरी या चौथी लहर का मुकाबला करने के लिए कोई योजना नहीं है।

12. सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर आईईसी, यानी इन्फॉर्मेशन (सूचना), एजुकेशन (शिक्षा) और कम्युनिकेशन (संवाद) नहीं है। पहली लहर के समय सरकार का आग्रह प्रचार, भंगिमा और विजय भाव की ओर था। दूसरी लहर में उसका आग्रह इन्कार की ओर है ( 'ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है', 'राज्यों के पास टीके का पर्याप्त स्टॉक है।') और उसने सच को दफन कर दिया है और जिम्मेदारी राज्यों पर लाद दी है। नतीजा है, भारी अव्यवस्था और भ्रम तथा कोई जवाबदेही नहीं। कोई और देश होता, तो कई लोग निपट चुके होते।

फैसला पाठक सुनाएंगे।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed