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गोवा में उठा बुनियादी सवाल

Tue, 22 Nov 2016 08:05 PM IST
उमेश चतुर्वेदी
उमेश चतुर्वेदी Updated Tue, 22 Nov 2016 08:05 PM IST
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Basic Questions rise in Goa
उमेश चतुर्वेदी

वैश्विक स्तर पर अगर किसी भारतीय शिक्षा संस्थान की पहचान है, तो वह है आईआईटी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए दुनिया भर में अपनी साख जमा चुके आईआईटी की स्थापना जहां होगी, जाहिर है लोग खुश ही होंगे। लेकिन गोवा में ऐसा नहीं है। यहां के एक गांव लोलियम ने आईआईटी के लिए जमीन देने से इन्कार कर दिया है। गांव वालों का कहना है कि जिस जगह आईआईटी बनाने का सरकार ने फैसला लिया है, वह सार्वजनिक और पवित्र भूमि है। जिसका इस्तेमाल मवेशी को चरने, गांव वालों के सार्वजनिक आयोजन मसलन पूजा, विवाह, स्थानीय त्योहार आदि के आयोजन के लिए होता है। नोटबंदी की खबरों की आपाधापी के बीच यह खबर कहीं दबी रह गई। गांव वालों की चिंता आईआईटी से गर्वोन्नत होने के बजाय अपनी सामाजिक और सार्वजनिक जिंदगी को लेकर कहीं ज्यादा है।

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आजादी के बाद भाखड़ा नांगल बांध और भिलाई इस्पात कारखाना जब शुरू हुए थे, तब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इन्हें आधुनिक भारत का मंदिर कहा था। समाजवादी अर्थव्यवस्था के जरिये आजाद भारत की तस्वीर बदलने का सपना देखने वाले नेहरू का यह नजरिया ही कमोबेश आजतक आधुनिक सोच का पर्याय माना जाता है। लेकिन गोवा के लोलियम गांव ने इसे चुनौती दी है। इसके जरिये उसने विकासवाद और आधुनिकता के सामने बलि चढ़ती सामाजिकता और सार्वजनिक जिंदगी की समस्या को उभारा है। चूंकि सरकार के पास ताकत होती है, लिहाजा यह भी हो सकता है कि गोवा सरकार अपनी सत्ता की ताकत का इस्तेमाल करे और जमीन का जबरिया अधिग्रहण करके आईआईटी को सौंप दे।
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वैसे भी देश में जमीन के सबसे ज्यादा विवाद सार्वजनिक भूमि को ही लेकर हैं। मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस की एक शोध रिपोर्ट भी इसकी ही तस्दीक करती है। एक स्वतंत्र शोध समूह राइट्स एंड रिसोर्सेज इनीशिएटिव की अध्ययन रिपोर्ट का कहना है कि जनवरी 2000 से अक्तूबर 2016 के बीच देश में करीब 40 हजार करोड़ रुपये की योजनाओं का एलान हुआ। जिनमें से 86 फीसदी पर काम तो शुरू हो गया या पूरा हो गया, लेकिन 14 फीसदी योजनाएं जमीन विवाद के चलते फंस गईं। प. बंगाल में टाटा की सिंगूर परियोजना इसका चर्चित उदाहरण है।
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आखिर ये विवाद क्यों उभरते हैं? इसकी बड़ी वजह यह है कि खेती या अन्य सार्वजनिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होने वाली जमीनों को उद्योग, टाउनशिप या इंस्टीट्यूशन खड़ा करने के लिए अधिगृहीत किया जाना। उदारीकरण बेशक मौजूदा व्यवस्था को ज्यादा उद्योग और सेवा केंद्रित बना रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि जब मंदी आती है, तो बुनियादी अर्थव्यव्थाएं ही लोगों के काम आती हैं। ग्रामीण अर्थव्यस्था अब भी बुनियादी जरूरतों मसलन भोजन, पानी और कपड़ा को स्वावलंबी आधार पर पूरा करने की सोच पर केंद्रित है।

लोलियम गांव के लोगों का एक तर्क यह है कि गांव के लोगों के लिए यहां भरपूर पानी नहीं है तो आईआईटी के हजारों छात्रों, प्रोफेसरों और दूसरे कर्मचारियों और उसके जरिए बढ़ी मंडी के लिए पानी कहां से आएगा।


सिंगूर आंदोलन के दौरान मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी ने एक बड़ी बात कही थी कि उद्योगों के लिए बंजर और दलदली भूमि का अधिग्रहण क्यों नहीं हो सकता। कृषि योग्य भूमि का ही अधिग्रहण क्यों। महाश्वेता का वह सुझाव आज भी मौजूं है। गोवा की पंचायत ने यही संदेश देने की कोशिश की है।

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