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बांग्लादेश का तहरीर चौक
महेंद्र वेद
Updated Mon, 25 Feb 2013 09:48 PM IST
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जैसा कि मध्य एशिया और हाल ही में पश्चिम एशिया में हुआ, उसी तर्ज पर बांग्लादेश में हो रहे घटनाक्रमों को प्रदर्शित करने के लिए सर्वाधिक आकर्षक और वाजिब शब्द ‘ढाका वसंत’ होगा। इसमें अंतर यह है कि जहां अन्य देशों में यह बेहद अनिश्चित और एकबारगी होने वाली घटना थी, वहीं बांग्लादेश में यह एक सालाना होने वाला जलसा बन गया है। दरअसल, बंगाली अपनी पहचान को पुख्ता करना चाहते हैं, इसीलिए उनका यह वार्षिक कार्यक्रम इस वर्ष ज्यादा ही व्यवस्थित हो रहा है।
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हाल ही में राष्ट्र ने भाषायी आंदोलन की 61वीं वर्षगांठ मनाई। यह आंदोलन पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में बसे ढाका की यात्रा के साथ शुरू हुआ था, और जिसे युवा विद्यार्थियों का विरोध झेलना पड़ा था। ढाका के रामना मैदान में संपन्न रैली में जिन्ना ने कहा था कि पाकिस्तान की केवल एक राष्ट्रीय भाषा उर्दू है और किसी अन्य भाषा के लिए यहां जगह नहीं है। उन्होंने भारत की ओर इशारा करते हुए दुश्मन से सावधान रहने की भी बात की थी। देश के युवाओं ने बांग्ला भाषा का समर्थन करते हुए शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में उनके सामने चुनौती पेश की। यह वह समय था, जब इतिहास करवट ले रहा था।
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बंगाली युवाओं, विद्यार्थियों, शिक्षकों, कलाकारों, संगीतज्ञों और बौद्धिक लोगों ने जिन्ना की अवमानना करते हुए एक आंदोलन को जन्म दिया, जिसे निर्दयतापूर्वक कुचल दिया गया। 21 फरवरी, 1953 को सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों लोग जेलों में ठूसे गए। लेकिन 1971 में जब तक बंगालियों ने अपने राष्ट्र और अपनी भाषा की प्राप्ति नहीं कर ली, तब तक यह आग जलती रही। यही वजह है कि हर वर्ष 21 फरवरी को लाखों लोगों के दिलो-दिमाग में वही यादें ताजा हो जाती हैं। इसके महत्व को समझते हुए संयुक्त राष्ट्र इस दिन को विश्व मातृभाषा दिवस के तौर पर मनाने की बात कर चुका है।
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दरअसल आज बांग्लादेश में जो हो रहा है, उसे व्यापक पृष्ठभूमि में समझना जरूरी है। जमात-ए- इस्लामी और मुस्लिम लीग जैसे कई दल थे, जिन्होंने 1971 में पाकिस्तानी सेना की मदद की थी, और जिनकी भूमिका उससे भी ज्यादा जघन्य थी। उनकी मदद से पाकिस्तानी सेना ने उन सभी को कुचल दिया, जो पाकिस्तान का विरोध कर रहे थे। इस वर्ग के तमाम लोगों की पिछले चार दशकों में मौत हो चुकी है। दुखद है कि जो जीवित हैं, वे खुलेआम घूम रहे हैं, राजनीतिक और सामाजिक हलकों में सक्रिय हैं और चुनाव भी लड़ रहे हैं। 2001 से 2006 के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय संसद तक में जगह बनाई और बेगम खालिदा जिया की सरकार में मंत्री पद भी हासिल किए। यह इसलिए और भी ज्यादा दुखद है, क्योंकि खालिदा के पति आजादी के आंदोलन के एक महान नायक थे।
कहा जाता है कि देर से मिला न्याय, अन्याय होता है। लेकिन चार दशक बीत जाने के बाद भी बांग्लादेशी न्याय का इंतजार कर रहे हैं। इसकी एक वजह तो 1975 में शेख मुजीब की हत्या के बाद 15 वर्ष तक चलने वाला सैन्य शासन रहा, जिसके चलते न्याय तो दूर की बात ठहरी, देश ने लोकतंत्र को भी खो दिया। पिछले दो दशकों में बांग्लादेश ने बेगम जिया और मुजीब की पुत्री शेख हसीना के नेतृत्व में लोकतांत्रिक आबोहवा में सांस ली। शेख हसीना की सरकार ने 1971 के युद्ध अपराधियों को सजा दिलवाने के लिए अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल का गठन किया है। लेकिन इसका अंतिम नतीजा निकलना अभी बाकी है।
जमात-ए-इस्लामी के नेता इस कदम को राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं। और इसके समर्थक पिछले कई हफ्तों से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। और चूंकि इस वर्ष दिसंबर में होने वाले चुनावों में जीत के लिए बेगम जिया को इन गुटों की जरूरत पड़ेगी, सो वे उनका समर्थन कर रही हैं। पिछले कुछ दिनों से यह संघर्ष अपने चरम पर पहुंच रहा है। इसकी तस्दीक इस बात से होती है कि अब तक देश में इस्लामी गुटों और पुलिस के बीच हुई झड़प में कइयों की मौत और 100 से ज्यादा घायल हो चुके हैं।
पिछले सप्ताह बांग्लादेश में अहमद रजीब हैदर नामक एक ब्लॉगर की हत्या की वारदात ने सड़कों और इंटरनेट पर एक नए संघर्ष को जन्म दिया है। यह हत्या तब हुई, जब हैदर ने लोगों को शाहबाग में इकट्ठे होने की गुजारिश की थी। दरअसल, शाहबाग एक व्यस्ततम व्यापारिक जिला है। और इसे बांग्लादेश का तहरीर चौक माना जा सकता है। लोग न्याय की आस में यहां इकट्ठे हो रहे हैं।
गत 17 फरवरी को बांग्लादेश की संसद ने एक कानून बनाकर देश की सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी जमात-ए-इस्लामी पर मुकदमा चलाने की अनुमति दी है। दरअसल, जब शेख हसीना ने इस्लाम-विरोधी ब्लॉगर की हत्या में इस पार्टी के सदस्यों के शामिल होने की आशंका के चलते जमात पर प्रतिबंध लगाए जाने की मंशा जताई थी, तभी इस कानून के लिए रास्ता साफ हो गया था। बांग्लादेश में चल रही राजनीति को देखते हुए कहा जा सकता है कि जमात के नेताओं पर मुकदमा चलाए जाने से देश में हिंसा व्यापक हो सकती है और देश की अर्थव्यवस्था पर संकट खड़ा हो सकता है।
इसमें संदेह नहीं कि शेख हसीना ने आतंकवादी घटनाओं को रोकने और 1971 में हुए युद्ध अपराधों के संदर्भ में न्याय दिलवाने की मुहिम को तेज करने की हिम्मत दिखाई है। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव का समय पास आ रहा है, यह संघर्ष अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के बीच की लड़ाई बनता जा रहा है। लिहाजा इस लड़ाई को शेख हसीना किस अंजाम तक पहुंचाती हैं, इस पर सभी की नजर है।