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बनारस बहुत कुछ तय करेगा

Sun, 11 May 2014 05:52 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
नीलांजन मुखोपाध्याय Updated Sun, 11 May 2014 05:52 PM IST
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Banaras fix many things

शनिवार को चुनावी अभियान शांति के बीच खत्म हो गया। कुछेक घटनाओं को छोड़ इस बार मतदान भी शांतिपूर्ण ही रहा है। बेहद लंबी चुनावी प्रक्रिया के दौरान नेताओं के बीच लगातार तीखे व्यंग्यबाण चले। पर शुक्र है कि इस चुनावी जंग में मतदाता नहीं कूदे, न ही इसका आम जनमानस पर कोई प्रतिकूल, हिंसक असर देखने को मिला। वाराणसी के जरिये इसे सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। बनारस सबके आकर्षण का केंद्र केवल इसलिए नहीं बना कि नरेंद्र मोदी यहां से चुनाव लड़ रहे हैं, बल्कि इसलिए भी बना, क्योंकि उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी ने अपने प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव प्रचार करने के लिए ठीक आखिरी दिन चुना। इन दो दिग्गजों के अलावा अरविंद केजरीवाल की मौजूदगी के कारण भी काशी का राजनीतिक तापमान चरम पर पहुंच गया।

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पिछले साल नरेंद्र मोदी को जब भाजपा ने अपने प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया, तब चुनावी प्रक्रिया के सांप्रदायिक रंग लेने की आशंका जताई जा रही थी। तब यह कहा जा रहा था कि भाजपा कठोर हिंदुत्ववादी रवैया अपनाते हुए आक्रामक चुनाव प्रचार में उतरेगी, जिससे मतदाता ध्रुवीकृत होंगे और सामाजिक विद्वेष फैलेगा। मतदाता धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत हुए हैं या नहीं, और हिंदू वोट एकमुश्त नरेंद्र मोदी के पाले में गए हैं या नहीं, इसका पता तो नतीजा आने के बाद ही चलेगा। लेकिन अभी इतना जरूर कहा जा सकता है कि चुनाव में सामाजिक ध्रुवीकरण नहीं हुआ और न ही आशंका के बावजूद हिंदू और अल्पसंख्यक मुस्लिमों के बीच प्रत्याशियों के चयन से लेकर वोटिंग के पैटर्न तक में किसी तरह की धड़ेबंदी देखी गई।
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बनारस में मुझे एक ऐसा अद्भुत अनुभव हुआ, जो हमेशा मेरी स्मृति में ताजा रहेगा और भारत के शांतिपूर्ण भविष्य की याद दिलाएगा। यह वाराणसी में चुनाव प्रचार के आखिरी दौर की एक शाम थी, जब अरविंद केजरीवाल अपना रोड शो कर रहे थे। कुछेक लोगों से बात करने और रोड शो में थोड़ी दूर तक चलने के बाद हमने प्रसिद्ध गंगा आरती देखने का फैसला लिया, पिछले ही शाम मोदी जिसका राजनीतिकरण करना चाहते थे। लेकिन लोगों की भीड़ के कारण दशाश्वमेध घाट के नजदीक की पार्किंग तक पहुंचने वाली सभी सड़कें बंद कर दी गई थीं। ऐसे में, ऑटो चालक ने प्रस्ताव रखा कि वह हमें केदार घाट ले जा सकता है, जहां हम टहल सकते हैं या चाहें, तो नौका विहार कर सकते हैं।
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हमने पैदल चलने का फैसला किया, तो आम आदमी पार्टी समर्थक ऑटो ड्राइवर धर्मेंद्र सहज ही हमारा गाइड बन गया। थोड़ी-थोड़ी दूर पर ऊंचे भवनों के बीच से गंगा बीच-बीच में दिखाई दे रही थी। हम मुख्य घाट पर आरती देखने पहुंचने ही वाले थे कि अजान की आवाज सुनाई पड़ी। आरती देखने के लिए भारी संख्या में घाट पर पहुंचे लोगों ने तत्काल श्रद्धा से अपना सिर झुकाया। चुनाव अभियान के आखिरी दौर में जब राजनीतिक आक्रामकता पराकाष्ठा पर थी, तब बनारस की इस बहुलतावादी संस्कृति ने रास्ता दिखाया। एक बेहद कर्कश चुनाव में बनारस के लोगों ने समरसता का यह अर्थपूर्ण संदेश पूरे देश को दिया है। यह बहुत महत्वपूर्ण संदेश इसलिए है, क्योंकि वाराणसी को पुराने समय से देश की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता है। ठीक उसी तरह, जैसे मुंबई को देश की आर्थिक और दिल्ली को राजनीतिक राजधानी कहा जाता है। बेहद जोरदार चुनावी लड़ाई का केंद्र बनने के बावजूद अगर सांस्कृतिक राजधानी अपनी शालीनता का परिचय दे सकती है, तो देश के दूसरे हिस्से भी शांत रह सकते हैं।
 
यह चुनाव मोदी पर केंद्रित रहा है और जनादेश के केंद्र में भी वही रहेंगे। पर सच यह है कि बनारस ने उनके चुनाव अभियान को संयमित किया। यह बनारस की समन्वयवादी संस्कृति ही है, जिसने मोदी को एक भाषण में गंगा-जमुनी तहजीब का जिक्र करने को विवश किया। ऐसे में कुछ लोगों की भौहें तनना स्वाभाविक है, क्योंकि यह मुहावरा उस नेहरूवादी शब्दकोश का हिस्सा है, जिसकी चर्चा अक्सर देश की धर्मनिरपेक्ष विरासत के लिए की जाती रही है और जो संघ परिवार के लिए असुविधाजनक है।

अगर मोदी को निर्णायक जनादेश मिलता है, तो यह खुद उनके लिए अपने उन आलोचकों को जवाब देने का एक अवसर होगा, जो मानते हैं कि मोदी सामाजिक साझा के पक्षधर नहीं हैं। बेशक मोदी की अपनी सीमाएं हैं, जो संघ परिवार की विश्वदृष्टि और उसके प्रति उनकी अटूट आस्था का नतीजा है। मोदी का व्यक्तित्व एक कठोर अधिनायकवादी का भी है, जिसे सामंजस्य की राजनीति में यकीन नहीं। उनकी कुछ स्वभावगत विशेषताएं इंदिरा गांधी से मिलती-जुलती हैं। 1971 में श्रीमती गांधी ने मतदाताओं को अस्थिरता का भय दिखा भारी बहुमत हासिल कर निरंकुश राजनीतिक शक्ति हासिल कर ली थी। वाराणसी में भी प्रचार के दौरान भारत को खंडित करने वाले खतरों से बचाने वाले मसीहे के रूप में मोदी को पेश किया गया। यह प्रचार विकास के लिए कम, मोदी को पूर्ण बहुमत दिलाने के लिए ज्यादा था।


एक उदार शासक बनने के लिए मोदी को उस बनारस से एक-दो सबक सीखने पड़ेंगे, जहां से उन्हें जीत की उम्मीद है। मगर यदि वह नहीं जीत पाए, तो यह उस शहर की तरफ से उनके लिए एक कठोर सबक होगा, जो भद्र आचरण में यकीन रखता है। इसके उलट यदि वहां मतदाता ध्रुवीकृत हुए, तो यह सामाजिक सद्भाव की कमी को रेखांकित करेगा, जिसकी भरपाई मुश्किल होगी। यह सिर्फ बनारस के लिए ही नहीं, पूरे देश के लिए बड़ी त्रासदी होगी।

वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी ः द मैन, द टाइम्स के लेखक

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