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Balochistan: अंतरराष्ट्रीय अखाड़ा बनता बलूचिस्तान, तेल-खनिज और समुद्री मार्ग पर प्रभाव बढ़ाने की होड़

Mon, 22 Jun 2026 06:54 AM IST
K C Tyagi केसी त्यागी
Updated Mon, 22 Jun 2026 06:54 AM IST
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सार
बलूचिस्तान में चीन के हस्तक्षेप को देखते हुए अमेरिका भी ग्वादर और बलूचिस्तान के अन्य हिस्सों में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है।
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balochistan becoming international battleground us and china
बलूचिस्तान का ध्वज - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

अमेरिका-ईरान युद्ध का भू-राजनीतिक असर दिखने लगा है। बलूचिस्तान की जमीन को अमेरिका अपने सामरिक हितों के लिए उपयोगी महसूस करता रहा है। इस समय वह ग्वादर बंदरगाह एवं बलूचिस्तान की तटीय रेखा पर प्रभावी होना चाहता है। फलस्तीन को लेकर पाकिस्तानी रुझानों से भी उसकी नाराजगी स्पष्ट दिख रही है। इसकी एक बानगी संयुक्त राष्ट्र में तब देखने को मिली, जब पाकिस्तान-चीन द्वारा सुरक्षा परिषद में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) के आत्मघाती दस्ते मजीद ब्रिगेड को ब्लैक लिस्ट करने के प्रयास को अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने रोक दिया। हाल के वर्षों में चीनी नागरिकों और परियोजनाओं को निशाना बनाकर किए गए हमलों ने बीजिंग की सुरक्षा चिताओं को बढ़ा दिया है।


इस समूचे प्रकरण को समझने के लिए अतीत में जाना होगा। पाकिस्तानी प्रांत बलूचिस्तान सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है। इसकी सीमाएं ईरान और अफगानिस्तान से लगी हैं। बलूचिस्तान के लोगों में पाकिस्तान से अलगाव की इच्छा के पीछे न्याय, पहचान और आत्म-सम्मान का सवाल भी जुड़ा है। 1947 के बाद पाकिस्तान परियोजना के विरोधी और जिन्ना की नीति की प्रतिक्रिया में, रियासती शासकों के तत्वावधान में बलूच राष्ट्रवाद का उभार हुआ। शासक खान ऑफ कलात (अहमद यार खान) ने 1946 में ही घोषणा की थी कि हम स्वतंत्र थे, हम स्वतंत्र हैं और हम स्वतंत्र रहना चाहते हैं। पाकिस्तान या भारत में शामिल होना हमारी इच्छा नहीं है।


इससे पूर्व ब्रिटिश प्रशासक सर रॉबर्ट सेंडमन का यह बयान भी काफी महत्वपूर्ण है कि बलूच स्वतंत्र प्रवृत्ति के लोग हैं। उन्हें उनकी आदत और परंपराओं के अनुसार चलने देना ही शांति और स्थिरता की कुंजी है। मो. अली जिन्ना इस प्रांत के भू-राजनीतिक महत्व को समझते हुए इसे पाकिस्तान में मिलना चाहते थे। 1947 में सरदार कलात ने स्वतंत्र बलूच प्रांत की घोषणा कर जिन्ना को हैरान कर दिया, लेकिन 27 मार्च, 1948 को बलपूर्वक और जनता की इच्छा के विरुद्ध इसे पाकिस्तान में मिला लिया गया। बाद में कलात खान द्वारा की गई टिप्पणी कि ‘मैंने दबाव में आकर पाकिस्तान में विलय किया। बलूच जनता की भावना स्वतंत्रता की ओर थी' ने स्वायत्त बलूच की भावना को और तेज कर दिया।

पाकिस्तान 1948 में सेना भेज कर उसे अपने साथ विलय कराने में अवश्य सफल हो गया, लेकिन रक्षा, विदेश मामलों और संचार को छोड़कर सभी विषय राज्य के अधिकार में रहने की घोषणा की। मगर यह मात्र एक मृत घोषणा बनकर रह गई। इसी के विरोध में बलूच राष्ट्रवाद के ध्वजावाहक के रूप में पीपुल्स पार्टी की स्थापना की गई, जिसके नेता अब्दुल करीम बने। विलय के बाद से ही बलूचों के विरोध प्रारंभ हो गए। 1960 के दशक में तीन छोटे विद्रोह, 1973-1977 के बीच एक बड़ा विद्रोह और 2000 के दशक के प्रारंभ में शुरू हुए छोटे-मोटे संघर्ष आज तक जारी हैं। बलूच विद्रोही पाकिस्तान के बुनियादी ढांचे और कर्मचारियों तक को निशाना बनाते हैं और कभी-कभी प्रांत की गैर-बलूची आबादी को भी निशाना बनाते हैं।

हाल ही में, बलूचिस्तान राजनीतिक हिंसा में सबसे ज्यादा प्रभावित पाकिस्तानी प्रांतों में एक है। अकेले राजधानी क्वेटा में आतंकी हमलों में पिछले वर्ष की तुलना में 39 फीसदी की वृद्धि हुई है। भले ही आत्मनिर्णय के लिए बलूच आंदोलन अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाए और एक बार फिर कुचल दिया जाए, लेकिन यह संभवत कुछ समय बाद फिर से उभरेगा, खासकर यदि प्रांत के खनिज संसाधनों का दोहन जारी रहता है। पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर इन आंतरिक खतरों से अच्छी तरह वाकिफ हैं, लिहाजा अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध से पाक सरकार को मदद जरूर मिलेगी।

बलूचिस्तान की जमीन अमेरिका के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। चीन के प्राकृतिक संसाधन और अरब जगत का तेल आने वाले 30-40 वर्षों में खत्म हो जाएगा। तब अमेरिका को मध्य एशिया, ईरान और अफगानिस्तान पर निर्भर रहना पड़ेगा। बलूचिस्तान में चीन के हस्तक्षेप के कारण अमेरिका के लिए प्रभावशाली स्थिति हासिल करना संभव नहीं होगा।

अमेरिका लंबे समय तक अपना आर्थिक आधिपत्य नहीं बना पाएगा, उसकी जगह चीन ले सकता है, जिसका ग्वादर बंदरगाह और बलूचिस्तान की तटीय रेखा पर प्रभाव होगा। चीन के सहयोग से ग्वादर बंदरगाह के निर्माण के चलते अमेरिका नाराज है। अमेरिका भी ग्वादर और बलूचिस्तान के अन्य हिस्सों में अपना प्रभाव बढ़ाने में रुचि रखता है।
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