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कुसंग के कारण मंद पड़ा तेज
शिवकुमार गोयल
Updated Sun, 11 Aug 2013 08:52 PM IST
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ब्राह्मण किशोर भूरिश्रवा को महर्षि ऋचीक के गुरुकुल में विद्या व शास्त्रों के अध्ययन के लिए भेजा गया। ऋचीक अग्रणी तत्वज्ञानी और ब्रह्मनिष्ठ ऋषि थे। वह शिष्यों को भी संयम व तप के महत्व से परिचित कराकर सांसारिक प्रपंचों में न पड़ने की प्रेरणा दिया करते थे। भूरिश्रवा ने अध्ययन पूरा किया, तो गुरु ने विदा करने से पूर्व कहा, वत्स, हमेशा सत्पुरुषों के सत्संग में रत रहना। गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने के बाद भी संयम का निरंतर पालन करना। संयम, सत्संग रूपी तप ही पथभ्रष्ट होने से बचाता है।
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भूरिश्रवा का विवाह शुचिता नामक शीलवती कन्या से हुआ। कुछ दिन वह धर्ममय जीवन बिताते रहे, फिर दुर्व्यसनी के संग के कारण संध्या, गायत्री, वेदाध्ययन आदि छूटते गए। पत्नी के समझाने के बावजूद वह अधर्म के कार्यों में लगे रहे। नगर के लोग उनसे घृणा करने लगे। उनका तेज, धन, यश-सब गायब हो गया।
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आचार्य ऋचीक को इस बारे में पता चला, तो वह उनके घर जा पहुंचे। भूरिश्रवा और उनकी पत्नी ने देखते ही उन्हें आदर से बिठाया। आचार्य ने कहा, वत्स, कुसंग ने तुम्हारे तेज, तप, संयम, यश सब कुछ हर लिए हैं। इसलिए दुष्ट जनों का कुसंग त्याग दो। मर्यादा एवं संयम का दृढ़ता से पालन करो।
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भूरिश्रवा गुरु के वचन सुनकर रो पड़े। उन्होंने दुष्टों का संग त्यागने का संकल्प लिया। संयम और तप ने उन्हें पुनः तेजस्वी और यशस्वी बना दिया।