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चिंता: असम डूब रहा है… नदी तटों की सुरक्षा के लिए दूरगामी योजना समय की मांग

Mon, 24 Jun 2024 07:01 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Mon, 24 Jun 2024 07:01 AM IST
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सार
ब्रह्मपुत्र और उसकी करीब 50 सहायक नदियों की वजह से असम में बड़े स्तर पर भूमि कटाव हो रहा है। गांव और कस्बे नदियों में समा रहे हैं।
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Assam Flood Major Concern rising water level demands long term and inclusive planning
असम में जलस्तर बढ़ने के बाद जलमग्न इलाके - फोटो : एएनआई

विस्तार

असम में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के किनारे बसे गांव-कस्बे साल दर साल सिकुड़ते जा रहे हैं। इंडियन जर्नल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी 2024 के अंक 17 में केवल मोरईगांव जिले में नदी से हो रहे कटाव के आंकड़ों का जो विश्लेषण किया गया है, उससे जाहिर है कि जिले का बड़ा हिस्सा नदी में समा चुका है। सन 1988 से 2022 तक के आंकड़े बताते हैं कि इस जिले में नदी के बाएं तट पर सालाना भूमि कटाव 81.54 मीटर है, जबकि दाएं तट पर हर साल 83.59 मीटर धरती कटकर नदी में समा रही है।



सदियों पहले नदियों के साथ बहकर आई जिस मिट्टी ने असम राज्य का निर्माण किया,  अब वे जल धाराएं ही यहां भूमि कटाव कर रही हैं। ब्रह्मपुत्र और बराक व उनकी कोई 50 सहायक नदियों का बेहद तेज बहाव अपने किनारों की बस्तियों-खेतों को उजाड़ रहा है। राष्ट्रीय  बाढ़ आयोग के आंकड़े बताते हैं कि छह दशक में असम की 4.27 लाख हेक्टेयर जमीन कटकर पानी में बह चुकी है, जो कि राज्य के कुल क्षेत्रफल का 7.40 प्रतिशत है। हर साल औसतन आठ हजार हेक्टेयर जमीन नदियों के तेज बहाव में कट रही है।


ब्रह्मपुत्र की औसत चौड़ाई 5.46 किलोमीटर है, लेकिन कटाव के चलते कई जगह इसका पाट 15 किलोमीटर चौड़ा हो गया है। वर्ष 2001 में कटाव की चपेट में 5,348 हेक्टेयर उपजाऊ जमीन आई, जिसमें 227 गांव प्रभावित हुए और 7,395 लोगों को विस्थापित होना पड़ा। वर्ष 2004 में यह आंकड़ा 20,724 हेक्टेयर जमीन, 1245 गांव और 62,258 लोगों के विस्थापन पर पहुंच गया। वर्ष 2010 से 2015 के बीच नदी के बहाव में 880 गांव पूरी तरह बह गए। इस साल बरसात की शुरुआत में ही बक्सा, बारपेटा, सोनितपुर, धुबरी, कामरूप, कोकराझाड, नलबाड़ी, उदालगुड़ी आदि जिलों में कटाव गंभीर हो गया है।

वैज्ञानिकों ने डिब्रूगढ़, लखीमपुर, करीमगंज जिलों में नदी किनारे कटावग्रस्त गांवों का भविष्य दस साल आंका है। करीब 25 लाख आबादी ऐसे गांवों में है, जहां हर वर्ष नदी उनके घरों के करीब आ रही है। ऐसे इलाकों को यहां ‘चार’ कहते हैं। चार अर्थात कछार यानी, जहां तक नदी का अधिकतम विस्तार होता है। हर बार ‘चार’ के संकट, जमीन का कटाव रोकना, मुआवजा, पुनर्वास चुनावी मुद्दा भी होते हैं। कई जगह लोगों की जमीन के साथ ही दस्तावेज भी बाढ़ व कटाव में बह गए और वे नागरिकता रजिस्टर में ‘डी’ श्रेणी में आ गए। इसके चलते आपसी विवाद, सामाजिक टकराव भी गहरा दर्द दे रहा है।

सन 2019 में संसद में जानकारी दी गई थी कि अब तक राज्य में 86,536 लोग कटाव के चलते भूमिहीन हो गए। दुनिया के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली का अस्तित्व ब्रह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों की वजह से हो रहे कटाव के चलते ही खतरे में है। माजुली का क्षेत्रफल पांच दशक में 1,250 वर्ग किलोमीटर से सिमटकर 800 वर्ग किलोमीटर रह गया है। हाल ही में रिमोट सेंसिंग से किए गए एक सर्वेक्षण में ब्रह्मपुत्र के अपने ही किनारों को निगलने की भयावह तस्वीर सामने आई है। पिछले 50 वर्षों के दौरान नदी के पश्चिमी तट की 758.42 वर्ग किलोमीटर भूमि बह गई। नदी के दक्षिण किनारों का कटाव 758.42 वर्ग किमी रहा।

असम के ऊपरी अपवाह में कई बांध बनाए गए। चीन ने भी अपने कब्जे वाले ब्रह्मपुत्र के उद्गम पर कई विशाल बांध बनाए हैं और जैसे ही वहां ज्यादा पानी एकत्र हो जाता है, तो उसे छोड़ दिया जाता है। इससे भूमि कटाव होता है। भारत सरकार की एक रिपोर्ट बताती है कि असम में नदी के कटाव को रोकने के लिए बनाए गए ज्यादातर तटबंध जर्जर हैं। कई जगह नष्ट हो गए हैं। राज्य में करीब 4,448 किलोमीटर नदी तटों पर पक्के तटबंध बनाए गए थे, लेकिन इनमें से आधे भी नहीं बचे हैं। वहीं नदियों ने अपना रास्ता भी बदला है।

भूमि कटाव का बड़ा कारण राज्य के जंगलों व आर्द्र भूमि पर हुआ अतिक्रमण भी है। जरूरत है कि नदियों में ड्रेजिंग के जरिये गहराई बढ़ाई जाए। रेत खनन पर रोक लगे। सघन वन भी कटाव रोकने में मददगार होंगे। अमेरिका की मिसीसिपी नदी भी कभी ऐसे ही भूमि कटाव करती थी। वहां 1989 में तटबंध को अलग तरीके से बनाया गया और उसके साथ खेती के प्रयोग किए गए। आज वहां नदी कटाव नियंत्रित है। ऐसे में असम के अस्तित्व को बचाने और नदी तटों की सुरक्षा के लिए दूरगामी योजना अनिवार्य है, जो यहां के जल और जन दोनों को बचा सके।

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