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थाईलैंड जैसा विकास भारत में क्यों नहीं
तवलीन सिंह
Updated Sun, 07 Aug 2016 07:02 PM IST
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तवलीन सिंह
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यह लेख थाईलैंड के हुआ हिन नाम के एक छोटे से शहर में बैठकर लिख रही हूं। खिड़की से समंदर की सुहानी हवाएं आ रही हैं। पिछली बार जब मैं हुआ हिन आई थी, तब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद संभाले कोई दो महीने हुए थे। मेरे जैसे लोगों को यकीन था कि मोदी के दौर में विकास आंधी की रफ्तार से आएगा। ऐसा अपने भारत महान में अभी हुआ नहीं, पर बिना विकास के नारों के, बिना जनतंत्र के, हुआ हिन के रास्तों में मैंने परिवर्तन देखा।
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बैंकॉक से हुआ हिन सड़क मार्ग से करीब तीन घंटे का सफर है। वर्ष 1999 में जब मैं पहली बार इस रास्ते से हुआ हिन आई थी, तब सड़क वैसी ही थी, जैसी अक्सर अपने देश में होती है। सड़क के दोनों तरफ वैसे ही ग्रामीण नजारे दिखते थे, जो अपने देश के हर प्रांत में दिखते हैं। खेत, खलिहान, कच्चे-अधपक्के मकान और हर जगह गरीबी के निशान। धीरे-धीरे गांव छोटे शहर बनते गए और सड़क आधुनिक हाईवे में तब्दील हो गई। थाईलैंड में विकास की यह तेजी इस बार मुझे इतनी दिखी कि हुआ हिन पहुंचते हुए आश्चर्य के साथ-साथ मन में एक उदासी छा गई। वह इसलिए कि भारत में ऐसी कोई सड़क नहीं है, जिस पर सफर करते हुए आपको दो वर्षों में इतना परिवर्तन दिखे। इस देश में दो साल पहले जहां गांव और खेत थे, आज वहां सुंदर छोटे शहर बन गए हैं, जिनमें वे सारी सुविधाएं हैं, जो हमारे बड़े शहरों में दिखती हैं। चूंकि ये शहर सुनियोजित ढंग से बने हैं, जैसे विकसित पश्चिमी देशों के शहर दिखते हैं। इसलिए यहां न गंदगी है, न कूड़े के ढेर और न ही बदबू भरी वैसी नालियां, जो भारतीय कस्बों की हर गली की पहचान हैं।
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हुआ हिन पहुंचने के बाद मैंने अपने एक भारतीय दोस्त को फोन कर पूछा कि अगर थाईलैंड इस रफ्तार से परिवर्तन ला सकता है, तो हम क्यों नहीं? दोस्त ने कहा कि ऐसा परिवर्तन तभी आता है, जब स्थानीय अधिकारियों को परिवर्तन लाने के लिए पूरे अधिकार दिए जाते हैं। हर शहर को अगर ऐसे महापौर चलाएं, जो चुनाव जीतकर आए हों, तो उन्हें इजाजत मांगने के लिए मुख्यमंत्री के पास न जाना पड़े।
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हम ये बातें कर ही रहे थे कि मैंने टीवी पर सोनिया गांधी की बनारस यात्रा की तस्वीरें देखीं। सोनिया गांधी के स्वागत में उत्साहित लोग उसी तरह निकल पड़े थे, जैसे दो साल पहले नरेंद्र मोदी के लिए निकलते थे। यह देखकर ख्याल आया कि प्रधानमंत्री अगर अपने ही चुनाव क्षेत्र में पिछले दो वर्षों में तू्फानी परिवर्तन लाए होते, तो उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत की संभावना कहीं ज्यादा होती। बनारस में ऐसा बदलाव क्यों नहीं हुआ? क्या इसलिए कि प्रधानमंत्री के आसपास ऐसे लोग हैं, जो उन्हें जमीनी यथार्थ से दूर रखने में चतुर हैं? या इसलिए कि प्रधानमंत्री ने बनारस को चमकाने पर उतना ध्यान नहीं दिया? जापान के प्रधानमंत्री को वह बनारस इस उम्मीद से ले गए थे कि बनारस भारत का क्योटो बन जाए। ऐसा हुआ क्यों नहीं?
थाईलैंड में आधुनिकता आई है, लेकिन यहां के लोगों ने न तो अपनी भाषा गंवाई है, न अपनी सभ्यता और न ही अपनी अलग पहचान। हम ऐसा क्यों नहीं कर पाए? मोदी सरकार के आने के बाद राष्ट्रीयता और भारतीयता के नाम पर गो रक्षा करने ऐसे गुंडे निकल आए हैं, जिन्हें न भारतीय सभ्यता के बारे में मालूम है, न सनातन धर्म की समझ है। आधुनिक हिंदुत्ववादियों की अगर यही पहचान है, तो भारत को भगवान ही बचा सकता है।