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संगठन और सरकार के बीच की दूरी
अवधेश कुमार
Updated Mon, 12 Nov 2012 11:40 AM IST
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कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और सरकार के बीच सूरजकुंड में आयोजित संवाद से जो कुछ बाहर निकला है, उससे साफ है कि इसके द्वारा पार्टी ने विपक्ष के हमलों एवं भावी चुनाव के बीच अपने राजनीतिक उद्देश्य से कुछ महत्वपूर्ण संदेश देने की कोशिश की है। कांग्रेस के प्रमुख नेताओं की भी शिकायत रहती है कि सरकार के मंत्री पार्टी नेताओं की बातें सुनते ही नहीं। यानी अध्यक्ष और प्रमुख नेताओं को छोड़ दें, तो सरकार एवं पार्टी के बीच संवादहीनता है, यानी संवाद और सामंजस्य है ही नहीं।
इस संवाद के द्वारा कांग्रेस नेतृत्व यह संदेश दे रहा है कि वह विपक्ष के विरोधों एवं पार्टी व सरकार-विरोधी प्रचारों तथा कार्यकर्ताओं के मनोभावों के प्रति बिलकुल सजग है। वह अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह संदेश देना चाहती है कि सरकार पर पार्टी का नियंत्रण है और इस बात के प्रति वह पूरी तरह संकल्पबद्ध है कि सरकार हर हाल में कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भावनाओं के अनुरूप काम करे। अगर ये बातें साकार हो जाएं, तो किसी भी पार्टी के लिए राजनीति करना और चुनाव जीतना आसान हो जाएगा। तो क्या सूरजकुंड की मनोरम पहाड़ियों से कांग्रेस इस लक्ष्य की ओर वाकई अग्रसर हुई है?
प्रधानमंत्री, पार्टी अध्यक्ष एवं राहुल गांधी के साथ कार्यसमिति के 19 सदस्यों, 16 आमंत्रित सदस्यों, 23 कैबिनेट तथा 12 स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्रियों का एक साथ बैठकर बात करना ही सरकार और पार्टी के लिए महत्वपूर्ण घटना है। दो बसों से साथ सूरजकुंड जाना इस आयोजन को कायम परंपरा से अलग साबित कर रहा था। बस के अंदर भी संवाद चलता रहा। बिहार में नीतीश कुमार ने ऐसे ही बसों से चलकर मंत्रिमंडल की बैठक किसी गांव या कसबे में की और उसका लाभ भी उन्हें मिला। शायद कांग्रेस को इसी से प्रेरणा मिली हो। जो भी हो, इसे बेहतर पहल कहा जा सकता है।
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अगर सोनिया गांधी के भाषण के बाहर आए अंशों को आधार बनाएं, तो उसमें यकीनन कार्यकर्ताओं, आम कांग्रेस समर्थकों की भावनाओं तथा सरकार व पार्टी की चुनौतियों के सिंहावलोकन के साथ भूमिका का स्पष्ट मार्गदर्शन है। उन्होंने मंत्रियों को मार्ग निर्देश दिया कि वे कार्यकर्ताओं की बातों और चिंताओं पर ध्यान दें। साफ है कि विपक्ष के हमलों ने कांग्रेस अध्यक्ष एवं उनके रणनीतिकारों को सजग किया है, क्योंकि भ्रष्टाचार के लगातार आरोप एवं महंगाई के कारण विरोधी सरकार को कठघरे में खड़ा करने में सफल हो रहे हैं।
जाहिर है, आम चुनाव को ध्यान में रखें, तो सरकार एवं पार्टी, दोनों स्तरों पर चुनौतियां हैं। सरकार को बेहतर प्रदर्शन कर जनता का दिल जीतना है, तो पार्टी कार्यकर्ताओं-नेताओं के सतत संपर्क में रहते हुए जो काम वे कर रहे हैं, उनसे अवगत कराना तथा उसके प्रति उनका समर्थन भी पाना है। इनमें से एक करते हैं और दूसरा छूट जाता है, तो आप चुनाव में सफलता की उम्मीद नहीं कर सकते। एक प्रमुख चुनौती विपक्ष की आक्रामकता का प्रत्युत्तर देने की भी है और सोनिया गांधी कई महीनों से मुंहतोड़ जवाब देने का आह्वान कर रही हैं।
संसदीय दल की बैठकों से लेकर रामलीला मैदान की रैली की तरह संवाद में भी उन्होंने कहा कि विपक्ष के झूठे प्रचार का जवाब सख्ती से दें। किंतु जमीनी स्तर पर जवाब तो स्थानीय नेता और कार्यकर्ता ही दे सकते हैं। स्वयं पार्टी में ही नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच जिस ढंग से खाई चौड़ी हो चुकी है, चाटुकारों की जमात हावी हो रही है, उसे देखते हुए सफलता आसान नहीं है, लेकिन कम से कम पहल तो सही है।
सरकार और संगठन के बीच प्रकट-अप्रकट मतभेद का सामना हर सत्ताधारी पार्टी करती है। भाजपा के नेतृत्व में जब राजग की सरकार थी, तब पार्टी के साथ संघ के अनुषांगिक संगठन पीड़ा व्यक्त करते थे तथा बाद में कई संगठन सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतरने भी लगे थे। कांग्रेस के एकाधिकारवादी ढांचे की हम आलोचना करते हैं और यह अनुचित भी नहीं है, पर भारत के राजनीतिक ढांचे में सरकार और संगठन के बीच तालमेल, संवाद और विश्वास सचमुच बहुत बड़ी चुनौती है।
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इस संवाद के द्वारा कांग्रेस नेतृत्व यह संदेश दे रहा है कि वह विपक्ष के विरोधों एवं पार्टी व सरकार-विरोधी प्रचारों तथा कार्यकर्ताओं के मनोभावों के प्रति बिलकुल सजग है। वह अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह संदेश देना चाहती है कि सरकार पर पार्टी का नियंत्रण है और इस बात के प्रति वह पूरी तरह संकल्पबद्ध है कि सरकार हर हाल में कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भावनाओं के अनुरूप काम करे। अगर ये बातें साकार हो जाएं, तो किसी भी पार्टी के लिए राजनीति करना और चुनाव जीतना आसान हो जाएगा। तो क्या सूरजकुंड की मनोरम पहाड़ियों से कांग्रेस इस लक्ष्य की ओर वाकई अग्रसर हुई है?
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प्रधानमंत्री, पार्टी अध्यक्ष एवं राहुल गांधी के साथ कार्यसमिति के 19 सदस्यों, 16 आमंत्रित सदस्यों, 23 कैबिनेट तथा 12 स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्रियों का एक साथ बैठकर बात करना ही सरकार और पार्टी के लिए महत्वपूर्ण घटना है। दो बसों से साथ सूरजकुंड जाना इस आयोजन को कायम परंपरा से अलग साबित कर रहा था। बस के अंदर भी संवाद चलता रहा। बिहार में नीतीश कुमार ने ऐसे ही बसों से चलकर मंत्रिमंडल की बैठक किसी गांव या कसबे में की और उसका लाभ भी उन्हें मिला। शायद कांग्रेस को इसी से प्रेरणा मिली हो। जो भी हो, इसे बेहतर पहल कहा जा सकता है।
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अगर सोनिया गांधी के भाषण के बाहर आए अंशों को आधार बनाएं, तो उसमें यकीनन कार्यकर्ताओं, आम कांग्रेस समर्थकों की भावनाओं तथा सरकार व पार्टी की चुनौतियों के सिंहावलोकन के साथ भूमिका का स्पष्ट मार्गदर्शन है। उन्होंने मंत्रियों को मार्ग निर्देश दिया कि वे कार्यकर्ताओं की बातों और चिंताओं पर ध्यान दें। साफ है कि विपक्ष के हमलों ने कांग्रेस अध्यक्ष एवं उनके रणनीतिकारों को सजग किया है, क्योंकि भ्रष्टाचार के लगातार आरोप एवं महंगाई के कारण विरोधी सरकार को कठघरे में खड़ा करने में सफल हो रहे हैं।
जाहिर है, आम चुनाव को ध्यान में रखें, तो सरकार एवं पार्टी, दोनों स्तरों पर चुनौतियां हैं। सरकार को बेहतर प्रदर्शन कर जनता का दिल जीतना है, तो पार्टी कार्यकर्ताओं-नेताओं के सतत संपर्क में रहते हुए जो काम वे कर रहे हैं, उनसे अवगत कराना तथा उसके प्रति उनका समर्थन भी पाना है। इनमें से एक करते हैं और दूसरा छूट जाता है, तो आप चुनाव में सफलता की उम्मीद नहीं कर सकते। एक प्रमुख चुनौती विपक्ष की आक्रामकता का प्रत्युत्तर देने की भी है और सोनिया गांधी कई महीनों से मुंहतोड़ जवाब देने का आह्वान कर रही हैं।
संसदीय दल की बैठकों से लेकर रामलीला मैदान की रैली की तरह संवाद में भी उन्होंने कहा कि विपक्ष के झूठे प्रचार का जवाब सख्ती से दें। किंतु जमीनी स्तर पर जवाब तो स्थानीय नेता और कार्यकर्ता ही दे सकते हैं। स्वयं पार्टी में ही नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच जिस ढंग से खाई चौड़ी हो चुकी है, चाटुकारों की जमात हावी हो रही है, उसे देखते हुए सफलता आसान नहीं है, लेकिन कम से कम पहल तो सही है।
सरकार और संगठन के बीच प्रकट-अप्रकट मतभेद का सामना हर सत्ताधारी पार्टी करती है। भाजपा के नेतृत्व में जब राजग की सरकार थी, तब पार्टी के साथ संघ के अनुषांगिक संगठन पीड़ा व्यक्त करते थे तथा बाद में कई संगठन सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतरने भी लगे थे। कांग्रेस के एकाधिकारवादी ढांचे की हम आलोचना करते हैं और यह अनुचित भी नहीं है, पर भारत के राजनीतिक ढांचे में सरकार और संगठन के बीच तालमेल, संवाद और विश्वास सचमुच बहुत बड़ी चुनौती है।