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जब समय से बाहर कदम रखती है कला
देव प्रकाश चौधरी
Updated Sat, 20 Jul 2013 09:11 PM IST
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कवि इलियट याद आते हैं-''हम क्या हैं, यह हम तभी जान सकते हैं जब हम यह जान लें कि हमें क्या होना चाहिए, लेकिन हमें क्या होना चाहिए यह तभी जाना जा सकता है जब हमें पता चल जाए कि हम क्या हैं।" अपने समय के मशहूर चित्रकार यामिनी रॉय, जो लंबे समय तक आलोचनाएं झेलते रहे, ने भी न जाने कितनी बार खुद को ऐसे सवालों के सामने खड़ा पाया होगा। उनके न रहने के लगभग 41 साल बाद भी सवाल वहीं खड़े हैं। उन्हें क्या होना चाहिए था? आखिर वह क्या हो पाए?
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यामिनी रॉय की सम्पूर्ण कला में यह प्रश्न तीर की तरह बंधा है, जिसका जख्म अपने भीतर दबाए वह जिंदगी भर चलते रहे, लेकिन एक नई दिशा में। शायद यह एक बड़ा कारण है कि उनके बनाए चित्र कला के तमाम मानकों को भेदते हुए एक नई दुनिया में हमें लेकर जाते हैं, जहां मशहूर चित्रकार मातीस के रंगों जैसा कोई बिखराव नहीं दिखता, बल्कि एक ऐसे शख्स की कूची का कमाल दिखता है, जो हर जीवित तत्व में सौंदर्य और चमत्कार खोज लेता है।
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ऐसे चमत्कार से साक्षात्कार कराने की जिम्मेदारी उठाई है नई दिल्ली स्थित नेशनल गैलरी ऑफ मॉर्डन आर्ट ने। यामिनी रॉय के जन्म की 125वीं वर्षगांठ के मौके पर 'जर्नी टू द रूट्स' नाम से एक महत्वपूर्ण प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है। प्रदर्शनी में पेंटिग्स, मूर्ति शिल्प, ड्राइंग्स और स्केचेज सहित यामिनी रॉय की 200 कलाकृतियां दर्शायी गई हैं। प्रदर्शनी 25 अगस्त तक के लिए है।
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एक तरफ जब देश के बड़े-बड़े कलाकार पश्चिम की कला या फिर राजपूत या मुगल काल की कला परम्परा से प्रेरणा ले रहे थे, तब पशि्चम बंगाल के यामिनी रॉय लोक कला की ओर मुड़े और साबित किया कि मुगल या राजपूत परंपरा के बाद भारत की कला ठहर नहीं गई है। वह 1903 में लगभग 16 साल की उम्र में तब के कलकत्ता कला स्कूल में भर्ती हुए थे। उनका जन्म बांकुड़ा जिले के बेलियाटोर गांव में हुआ था। कोलकाता के शुरुआती दिनों में वह चित्रकार अवनीन्द्र नाथ की कला से गहरे प्रभावित रहे, लेकिन कुछ समय के बाद की शहर की मशीनी जीवन शैली से ऊब गए और गांवों की ओर लौटे, जहां उनका बचपन बीता था। रॉय ने स्वरूपों की सहजता को अपनाया, सशक्त एवं सपाट रंगों एवं माध्यमों को चुना। स्थानीय लोक कलाओं के विषय-वस्तु का अपनी कला में समावेश किया।
उन्होंने कीमती कैनवास एवं ऑयल पेंट्स को छोड़कर सस्ती सामग्रियों का इस्तेमाल शुरू किया, जो उन दिनों लोक कला के लोग किया करते थे। रामायण एवं कृष्ण लीला के दृश्यों को अपनी कला में उतारा। गांव के आम स्त्री-पुरुष का चित्रण किया। पट चित्रकला के लोकप्रिय नमूनों को लोगों के बीच पेश किया। समकालीन आलोचक, जो कला आलोचना का औजार पश्चिम से उधार लेकर आए थे, उनकी खुलकर आलोचना करने लगे। कई ने तो उन्हें कलाकार मानने से इंकार कर दिया। फिर भी वह अपनी सतरंगी दुनिया तक सीमित रहे। भारतीय लाल, पीला, हरा, सिंदूरी, भूरा, नीला और सफेद रंगों को अपनी कला में जगह दी। इनमें अधिकांश जमीनी या प्राकृतिक रंग थे।
द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब कोलकाता सिपाहियों की छावनी बना तो उनके चित्रों की बिक्री काफी बढ़ गई। लेकिन इसी दौर में उनके एक फैसले ने उन्हें विवादों के मुहाने पर खड़ा कर दिया। उन्होंने एक स्टूडियो तैयार किया, जिसमें कई छात्रों को रखा। वे छात्र यामिनी रॉय के चित्रों की अनुकृतियां बाजार के लिए तैयार करने लगे। लेकिन शायद सिर्फ शैली और रंग किसी कला को कलाकृति नहीं बना पाते। उसके पीछे कलाकार की संवेदना और निष्ठा भी होती है। इस फैसले ने उनकी कला दुनिया को बहुत नुकसान पहुंचाया।
फिर भी उन्होंने भारतीय कला को पश्चिम, अजन्ता, मुगल या राजपूत कला परंपरा से अलग लोककला की उस धारा की ओर मोड़ा, जो बहुत सहज थी और जिंदगी के करीब भी। प्रसिद्ध और लोकप्रिय होने के बाद भी वे अपने चित्रों को आश्चर्यजनक रूप से सस्ते दामों पर गांव के बाजार में बेचते थे। कलाकार की शानोशौकत से दूर वे अपने को जीवन पर्यन्त एक कला शिल्पी ही मानते रहे, इस बात पर चिंता किए बगैर की वह समकालीन कला दुनिया के परिदृश्य पर कहां खड़े हैं, उनसे क्या चूक हुई और उनका क्या महत्व है? उन्होंने कभी आलोचनाओं का पलट कर जवाब नहीं दिया। बस काम में लगे रहे। एक आम आदमी की तरह। एक ऐसा आदमी, जिसे आज देखकर सहसा कवि विनोदकुमार शुक्ल की पंक्तियां याद आ जाएं...“मैं हमेशा जाता हुआ दिखाई देता हूं, मैं अपनी पीठ अच्छी तरह पहचानता हूं।”