पाकिस्तान के चुनाव में सेना
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ऐसा कहा जा रहा है कि पाकिस्तान में 25 जुलाई को होने वाला चुनाव हो चुका है। अब सिर्फ मतदान होना बाकी है! अगर हम पाकिस्तान में पिछले कुछ महीनों के दौरान घटी घटनाएं देखें, जिसके तहत न्यायपालिका ने पीएमएल (एन) को चुनाव से दूर रखने के लिए नवाज शरीफ, उनकी बेटी मरियम (जिन्हें उनकी राजनीतिक वारिस कहा जा रहा है) और उनके पति (एक पूर्व सेनाधिकारी) को जेल में डाल दिया, तो इस टिप्पणी में दम नजर आता है। जबकि अदालत ने अपने फैसले में यह माना है कि नवाज के खिलाफ लगे आरोपों को साबित कर पाना कठिन है, क्योंकि लंदन में उनके फ्लैट के मालिकाना हक का कोई सुबूत नहीं है। पर पाकिस्तान में, जो तब भी सेना के गहरे असर में होता है, जब वहां औपचारिक तौर पर सैन्य शासन नहीं होता, शासन के स्तर पर एक नए नागरिक-सैन्य समीकरण की परिभाषा तय करने के लिए वहां की न्यायपालिका ने अब सेना से हाथ मिला लिया है। पाक सेना ने वहां के समाज में अपनी वर्चस्ववादी स्थिति कायम कर रखी है, जिसका उसे कभी अफसोस भी नहीं रहा है।
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पाकिस्तान बनने के बाद से ही खुद को 'देश का अभिभावक' बताते हुए सेना हमेशा अपने एजेंडे पर चली है, यह भी सच्चाई है कि लगातार सैन्य तख्तापलट का पूरे देश में स्वागत किया गया, क्योंकि अपने आपसी लड़ाई-झगड़े और अयोग्यता के कारण पाक राजनेता कभी अपनी वैधता साबित नहीं कर पाए। अयूब खान ने पहले सैन्य तख्तापलट को 1958 में तब अंजाम दिया, जब आजादी के बाद के शुरुआती सात साल में पाकिस्तान ने छह प्रधानमंत्री देखे। ऐसे ही जनरल जिया ने जुल्फिकार अली भुट्टो के निरंकुश तौर-तरीकों को रोकने के लिए सैन्य तख्तापलट किया। जबकि परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ द्वारा कारगिल युद्ध के अपमान का ठीकरा उन पर फोड़ने पर तख्तापलट को अंजाम दिया। पाकिस्तान में यह अद्भुत अनुभव सिर्फ नवाज शरीफ के पास ही है कि पहले प्रधानमंत्री काल में भ्रष्टाचार के आरोप में सेना द्वारा नामित राष्ट्रपति इशाक खान ने उन्हें पद से हटा दिया, दूसरी बार सैन्य तख्तापलट में न केवल उनकी सत्ता गई, बल्कि उन्हें निर्वासन में जाना पड़ा, और तीसरी बार न्यायपालिका ने उन्हें सत्ता से बाहर कर जेल में डाल दिया। पर बात सिर्फ नवाज शरीफ की नहीं है, पाकिस्तान में कोई भी प्रधानमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है!
नवाज शरीफ को राजनीतिक परिदृश्य से हटाकर सेना ने अपने पसंदीदा इमरान खान के लिए प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ कर दिया है, क्योंकि भुट्टो की पीपीपी इस समय प्रभावहीन है। इस चुनाव के नतीजे को अपने हक में करने के लिए सेना ने पूरे देश में 3,70,000 जवान तैनात किए हैं। चुनावी रैलियों में बम धमाकों में लोगों की मौत भी सेना के खतरनाक इरादे की ही पुष्टि करती है। दरअसल जियाउल हक की मौत के बाद जनरल असलम बेग ने फैसला किया था कि तख्तापलट के बजाय कठपुतली सरकार सेना के हित में है। इसी के तहत सेना ने 1988 के चुनाव में बेनजीर भुट्टो और उनकी पार्टी को दरकिनार करके आईजीआई को समर्थन दिया और उसकी फंडिंग भी की। आईजीआई उन लोगों और उन पार्टियों का एक मिला-जुला संगठन था, जिसने जियाउल हक के शासन का समर्थन किया था। हालांकि ऊपरी तौर पर असलम बेग ने बेनजीर भुट्टो को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के बारे में आश्वस्त किया था, लेकिन अंदर ही अंदर आईएसआई ने उन्हें हराने की साजिश रची। इस चुनाव में भी सेना ठीक उसी तरह काम कर रही है, और इमरान खान तथा उनकी पार्टी के खिलाफ उठती आवाजों को सुनियोजित ढंग से खामोश कर रही है। यहां तक कि मीडिया को भी धमकाया और सेंसर किया जा रहा है।
सेना द्वारा नवाज शरीफ को पसंद न करने की कई वजहें हैं। इनमें सबसे प्रमुख वजह यह है कि नवाज सेना के भारत-विरोधी एजेंडे को लगातार चुनौती देते रहे हैं। इसके अलावा उस पंजाब में नवाज की बेहद मजबूत राजनीतिक पकड़ है, जहां से पाकिस्तान की संसद में सबसे अधिक जनप्रतिनिधि चुनकर आते हैं। अगर चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होते, तो नवाज की सत्ता में वापसी हो सकती थी। इसीलिए सेना अपने किसी विश्वासपात्र को-तीन दशक पहले खुद नवाज सेना के चहेते थे-सत्ता में लाना चाहती है, जो इस समय इमरान खान हैं। इमरान को आगे बढ़ाने की इस प्रक्रिया में उनके रंगीन अतीत को भी बिसरा दिया गया है। इमरान खान के अलावा सेना ने योजना के तहत कट्टर दक्षिणपंथियों को भी अपने पाले में रखा है, जिनमें हाफिज सईद की मिल्ली मुस्लिम लीग और अहल-ए-सुन्नत-वल-जमात, जो पहले उग्र सांप्रदायिक संगठन सिपह सहाबा के तौर पर कुख्यात थी, भी है।
सेना पाकिस्तान में दिखावे का लोकतंत्र बनाए रखना चाहती है, तो उसकी एक वजह अपने आर्थिक साम्राज्य को बरकरार रखने की चाहत भी है। पाकिस्तान बनने के बाद सेना ने फौजी फाउंडेशन और इस तरह की कई संस्थाएं बनाईं, जिसका उद्देश्य इनके जरिये कारोबारी और वित्तीय लेन-देन करना था। आज पाकिस्तान के रियल एस्टेट में सेना का वर्चस्व है। उसका बैंक, ट्रांसपोर्ट एजेंसी, अस्पताल, यहां तक कि उर्वरक इकाइयां भी हैं। सेना की ये तमाम संपत्तियां अरबों डॉलर की हैं, और उसकी इन आर्थिक गतिविधियों का कभी ऑडिट नहीं होता। सेना की इन संस्थाओं में नौकरी करने वालों को सरकार तनख्वाह देती है तथा बड़े असैन्य ठेके भी अमूमन सेना की संस्थाओं को ही मिलते हैं। इस तरह पाकिस्तान के बजट का बड़ा हिस्सा सेना पर ही खर्च होता है, और देश के विकास के लिए ज्यादा धन नहीं बचता। इसके बावजूद सेना की प्रतिष्ठा सबसे अधिक है, क्योंकि लोगों को लगता है कि भारत की ओर से मिलने वाली चुनौती से मुल्क की रक्षा वही कर सकती है। ऐसे में, पाकिस्तान हमेशा ही भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखेगा, क्योंकि अगर भारत-पाकिस्तान के बीच शांति की संभावना दिखी, तो सेना अपना एजेंडा आगे नहीं बढ़ा पाएगी।