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भारतीय राजनीति में बेनामी संपत्ति

Sun, 25 Jun 2017 05:16 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 25 Jun 2017 05:16 PM IST
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Anonymous property in Indian politics
तवलीन सिंह

संयोग से जिस ‘बेनामी’ फार्महाउस के कारण लालू यादव की बेटी की इन दिनों सीबीआई द्वारा जांच हो रही है, वह मेरे पड़ोस में है। सो मैंने निजी तौर पर पिछले सप्ताह बिजवासन और छावला गांवों के बीच पालम विहार जाकर चुपके से पड़ताल की। स्थानीय लोगों से बातचीत करने के बाद मालूम हुआ कि विवादित जमीन कोई दो एकड़ की है, जिसकी कीमत आज पच्चीस करोड़ रुपये होगी। जमीन पर अब तक घर नहीं बना है, लेकिन उसके चारों तरफ ऊंची दीवार बन चुकी है, जिसमें कम से कम पैंतीस लाख रुपये खर्च हुए होंगे। लालू यादव कई बार कह चुके हैं कि जमीन उनकी नहीं है और उन्हें बदनाम करने के लिए राजनीतिक साजिश हो रही है, पर आस-पड़ोस के जितने भी लोगों से मैंने बात की, सभी कहते हैं कि छब्बीस नंबर फार्महाउस लालू यादव का है। पटना में बेशक बेनामी जमीन-जायदाद छिपाना आसान होगा, दिल्ली में इतना आसान नहीं है। बिजवासन-छावला क्षेत्र वैसे भी बदनाम है, क्योंकि यहां कई राजनेताओं ने अपना काला धन छुपाने के लिए जमीनें खरीद रखी हैं। सीबीआई अगर जांच का दायरा बढ़ाएगी, तो बेनामी जमीनों की सूची बहुत लंबी बन सकती है।

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सवाल यह है कि चारा घोटाले में जेल भेजे जाने के बाद भी लालू अपने और अपने परिवार की इतनी तरक्की कैसे कर सके हैं? लालू यादव के पिता पटना के किसी सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी किया करते थे। लालू जब पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, तो वह इस बात को गर्व से स्वीकार करते थे। सो आज अगर जगह-जगह उनकी संपत्ति है, तो जाहिर है कि उनका धन राजनीति से ही आया है। कुछ और हो न हो, जवाबदेही तो है। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि लालू यादव अकेले राजनेता नहीं हैं, जिन्होंने ‘जनता की सेवा’ करते-करते अपने परिवार की भी सेवा की है। मेरी जानकारी के जितने भी राजनेता हैं, उनमें शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसने मुख्यमंत्री या केंद्र में मंत्री बन जाने के बाद अपने जीवन में अचानक परिवर्तन और विकास न देखा हो। इनमें से बहुत सारे इतने बेशर्म हैं कि 'काला धन वापिस लाओ' का ढिंढोरा पीटते हुए निजी तौर पर खूब काला धन बटोरा।
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बिजवासन-छावला गांवों से थोड़ी ही दूरी पर गुरुग्राम की इमारतें हैं, जहां पांच सितारा होटल हैं, आलीशान मॉल हैं, सिनेमा घर और रेस्तरां हैं। और हर जगह नई इमारतों का शुरुआती काम चल रहा है। सीबीआई अपनी जांच का दायरा बढ़ाए, तो इन इमारतों के मालिक राजनेता ही निकलेंगे। कुछ नाम तो सबको मालूम हैं, लेकिन सबूत हासिल करना मुश्किल है, क्योंकि बेनाम रहने में हमारे राजनेता माहिर हैं।
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नरेंद्र मोदी के राज में केंद्र सरकार में ऊपरी स्तर पर भ्रष्टाचार बेशक कम हो गया है, लेकिन निचले स्तर पर तस्वीर बिल्कुल वही है, जो दशकों से चलती आ रही है। इसको बदलना मुश्किल है, क्योंकि भारत में राजनीति में धनवान बनना जितना आसान है, उतना अन्य किसी क्षेत्र में नहीं। मसलन, जितना धन बॉलीवुड का कोई बड़ा अभिनेता या क्रिकेट का कोई बड़ा खिलाड़ी अपने जीवन भर में कमाता है, उतना धन राजनेताओं के चतुर बच्चे कुछ ही वर्षों में कमा लेते हैं। पिताजी या माताजी के मंत्री या मुख्यमंत्री बनने की देर है, फिर काला धन कमाने के नए अवसर रोज पैदा होते हैं। विकसित देशों में अगर काला धन कमाने के तरीके कम हुए हैं, तो सिर्फ इसलिए कि वहां प्रशासन में पारदर्शिता बहुत ज्यादा है। संभव है कि हमारे लोकतंत्र में भी ऐसा दिन कभी जाएगा, मगर वह समय अभी दूर है, बहुत दूर।

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