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लोककल्याण: लक्ष्य से भटकता आंगनबाड़ी केंद्र, मरुभूमि में मुसीबत में हैं गर्भवती महिलाएं

Thu, 04 May 2023 07:13 AM IST
Daulat Ram दौलत राम
Updated Thu, 04 May 2023 07:13 AM IST
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सार
गर्भवती महिलाओं और शिशुओं को कुपोषण से बचाने के लिए शुरू किया गया आंगनबाड़ी केंद्र राजस्थान में अपने लक्ष्य से भटकता दिख रहा है।
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Anganwadi centres facing problem pregnant women in trouble in rajasthan
आंगनबाड़ी केंद्र - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गर्भवती महिलाओं और छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए 1975 में देश भर में आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थापना की गई थी। छोटे बच्चों को बुनियादी शिक्षा प्रदान करने और गर्भवती महिलाओं को स्वस्थ रखने वाली यह एक क्रांतिकारी योजना थी, जिसका व्यापक प्रभाव कभी देखने को मिला था। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में इसका सबसे अधिक लाभ हुआ, जहां बच्चों को कुपोषण और बीमारी से बचाने में मदद मिली। आंगनबाड़ी केंद्र से न केवल कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में मदद मिली, बल्कि बच्चों को संपूर्ण टीकाकरण भी उपलब्ध कराया गया। वैसे तो शहरों में भी जरूरत के अनुसार आंगनबाड़ी केंद्र खोलने का प्रावधान है, लेकिन यह ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ही उपयोगी साबित हुआ है।



लेकिन लगभग पांच दशक बाद ऐसा लगता है कि यह योजना अब अपने लक्ष्य से भटक रही है। जिन उद्देश्यों के लिए आंगनबाड़ी की स्थापना की गई, वह पूरी होती नहीं दिख रही है। रेगिस्तान की धरती राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्र को देखकर कुछ ऐसा ही लगता है, जहां बच्चों और गर्भवती महिलाओं को पूर्ण आहार और अन्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। हालांकि राजस्थान की महिला एवं बाल विकास मंत्री ममता भूपेश ने राज्य की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार से 5,000 नए आंगनबाड़ी केंद्रों की मंजूरी की मांग की थी, लेकिन अभी तक केवल 215 नए केंद्र खोलने की मंज़ूरी मिली है। तब राज्य सरकार ने कहा था कि राजस्थान में गांव दूर-दूर बिखरे हुए हैं और आंगनबाड़ी केंद्रों की सीमित संख्या के कारण कई बच्चे लाभ से वंचित रह जाते हैं, क्योंकि बच्चे और माताएं आमतौर पर 10-12 किलोमीटर की यात्रा नहीं कर पाती हैं।


मगर जिन क्षेत्रों में आंगनबाड़ी केंद्र चल रहे हैं, वहां के ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें इसका कोई विशेष लाभ नहीं मिल रहा है। उदयपुर जिला से 70 किमी दूर सलुम्बर ब्लॉक अंतर्गत मालपुर गांव में लगभग 200 घर हैं। इसकी आबादी करीब 1,150 है। गांव में एक ही आंगनबाड़ी केंद्र संचालित है। सेंटर के कर्मचारियों के अनुसार, महीने में एक बार बच्चों को पोषाहार भी दिया जाता है। पोषाहार के तहत तीन साल के बच्चों को मीठा दलिया, खारा दलिया और खिचड़ी के चावल आदि दिए जाते हैं। लेकिन ग्रामीण इस दावे को वास्तविकता के विपरीत बताते हैं।

गांव की एक महिला कमला देवी (बदला हुआ नाम) का कहना है कि हमारे पास पोषक आहार से संबंधित कोई भी सूचना आंगनबाड़ी से नहीं आती है। जब आसपास के लोग वहां से आहार लाते हैं, तो हम भी लेने के लिए चले जाते हैं। उनका कहना है कि किसी भी ग्रामीण को यह पता नहीं होता है कि उन्हें सेंटर से क्या पाने का अधिकार है। उनके अनुसार, इस आंगनबाड़ी केंद्र में तीन से छह साल तक के 46 बच्चों का नामांकन हुआ है, जिनमें से मात्र 10-12 बच्चे ही केंद्र पर आते है। केंद्र में उन बच्चों के विकास और शिक्षा से जुड़ी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। केंद्र में बच्चों की कम उपस्थिति के पीछे मुख्य कारण यह है कि उनका घर केंद्र से पांच-छह किलोमीटर दूर है।

कुछ अन्य अभिभावकों का भी आरोप था कि आंगनबाड़ी केंद्र से कोई भी सूचना ग्रामीणों को नहीं दी जाती है। उन्होंने कहा कि जब आहार वितरण का समय आता है, तो कुछ बच्चों को पोषाहार बांटकर तस्वीरें ले ली जाती हैं। लेकिन आंगनबाड़ी केंद्र से जुड़े लोग ऐसे किसी भी आरोप से इन्कार करते हुए हर महीने आहार देने की बात करते हैं।

बहरहाल, अभिभावकों और केंद्र के कर्मचारियों में से किसकी बात सही है, यह तो जांच का विषय है, लेकिन आंगनबाड़ी केंद्र के कामकाज पर अन्य ग्रामीण क्षेत्र के लोग भी सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में यह स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह इसमें पारदर्शिता लाने के लिए सख्त कदम उठाए। यह न केवल आंगनबाड़ी केंद्र की विश्वसनीयता का सवाल है, बल्कि देश के नौनिहालों के स्वास्थ्य से भी जुड़ा मुद्दा है, जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। (चरखा फीचर)

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