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पुस्तक समीक्षा: एंड दैन वनडे

Tue, 14 Jun 2016 09:23 AM IST
कल्लोल चक्रवर्ती
कल्लोल चक्रवर्ती Updated Tue, 14 Jun 2016 09:23 AM IST
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and then one day book review.

नसीरुद्दीन शाह बॉलीवुड के उन अभिनेताओं में से हैं, जिनकी लोकप्रियता कभी दीवानगी का रूप नहीं ले पाई। उनकी अभिनय शैली को किसी एक ढर्रे में ढाला भी नहीं जा सकता। कला फिल्मों में कोई दृश्य, संवाद या प्रकाश संयोजन अचानक कौंध पैदा कर देता है, उसी तरह यह किताब भी अचानक नसीर के जीवन के कुछ हिस्सों पर रोशनी डालती है। इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि लेखक ने सिर्फ सुविधानजक सच सामने रखे हैं। यहां कई ऐसे 'खुलासे' हैं, जिन्हें सार्वजनिक छवि का कोई व्यक्ति सामने लाना पसंद नहीं करेगा।

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रंगमंच के प्रति नसीर की दीवानगी का परिचय इस किताब में जगह-जगह मिलता है।

अपने बालपन की जो शुरुआती स्मृति उन्हें है, वह रामलीला के दर्शक के तौर पर किसी की गोद में बैठे होने की है। बाद में नैनीताल के स्कूल में अपने पहले अभिनय और अलीगढ़ में नाटकों में अपनी सक्रियता को उन्होंने जिस तरह याद किया, वह पठनीय है। उनका जन्म बाराबंकी में हुआ और जीवन का बड़ा हिस्सा मेरठ के सरधना में बीता, जो उनका ननिहाल है।
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पर यह किताब स्थूल वर्णन के लिए नहीं है। यहां वह नसीर हैं, जो अपने भाइयों की तरह पढ़ाई में होशियार नहीं है, इसीलिए पिता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता। अभिनय को अपना करियर बनाने की ठानने पर पिता का बिफरना स्वाभाविक था। दो पीढ़ियों के बीच की यह फांस कुछ वर्षों बाद अलीगढ़ में दिखती है, जब युवा नसीर को एहसास होता है कि बीवी उनके बजाय बेटी हीबा को ज्यादा महत्व दे रही है। हालांकि कई जगह लेखक ने बेहद भावुकता से पिता को याद किया है।
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नसीर के युवावस्था के ब्योरे बहुत प्रभावित नहीं करते, सिवा इसके कि अजमेर में फिल्मों के प्रति भी उनका रुझान बढ़ा था और वह दारा सिंह की फिल्में देखते थे। उसी दौरान ज्योफ्री कैंडल (जेनिफर केंडल के पिता) के घूमंतू नाट्य समूह शेक्सपियरेना से प्रभावित नसीर उनके समूह से जुड़ जाना चाहते थे। वर्षों बाद अभिनय में सुप्रतिष्ठित हो चुकने पर भी उन्हें हम जेर्जी ग्रोटोस्की के थियेटर वर्कशॉप में भाग लेने के लिए जिस उत्सुकता के साथ पोलैंड जाते देखते हैं, वह प्रभावित करता है।

आत्मकथा में और उसके बाद एकाधिक इंटरव्यू में भी, नसीर ने हिंदी फिल्मी दुनिया पर जिस तरह अपने विचार रखे हैं, वे उनकी हताशा के ही सुबूत ज्यादा लगते हैं। खासकर तब, जब उन्होंने स्वीकारा है कि इन्हीं फिल्मों से उनका घर चलता था। लेकिन खुद को मुंबई के किसी भी अभिनेता से प्रभावित न मानना बड़बोलेपन का ही उदाहरण है। हालांकि नसीर गलत नहीं कहते कि कलर और तकनीक ने हिंदी सिनेमा का स्तर गिरा दिया।


जब वह तंज कसते हैं कि कैमरे के सामने रोना-चिल्लाना अभिनय नहीं है, तब भी वह सही हैं। मुंबई में अभिनय की दुनिया जिस तरह वंशवाद पर सिमट गई है, उस पर भी उनका आक्रोश स्वाभाविक है। दिलीप कुमार और ओम पुरी के अभिनय की उन्होंने तारीफ की है। इब्राहिम अल्काजी, रोशन तनेजा, श्याम बेनेगल, सई परांजपे, शेखर कपूर और गुलजार की रचनात्मक प्रतिभा को भी उन्होंने सम्मान के साथ याद किया है। इसके बावजूद आत्मकथा के रूप में किताब प्रभावित नहीं करती।

एंड दैन वनडे
नसीरुद्दीन शाह
पेंग्विन बुक्स इंडिया/हैमिश हेमिल्टन
699 रुपये

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