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टोपी पर एक ललित निबंध

Mon, 04 Nov 2013 05:51 PM IST
सुधीर विद्यार्थी
सुधीर विद्यार्थी Updated Mon, 04 Nov 2013 05:51 PM IST
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An essay on Cap

साधो, पिछले दिनों कक्षा में वे छात्र मुश्किल में पड़ गए थे, जो अब तक गाय पर निबंध लिखा करते थे। टोपी पर निबंध लिखना उन्हें सिखाया नहीं गया था। फिर भी एक छात्र की उत्तर पुस्तिका का वह पन्ना मेरे हाथ लग गया, जिसमें उसने लिखा था-टोपी कपड़े का मुड़ा-तुड़ा और थोड़ा सिला हुआ एक अदद कपड़ा होता है, जिसे पहले जमाने के लोग सिर पर धरा करते थे। आदमी ने इसका चलन धूप और तपन से बचने के लिए किया होगा। फिर धीरे-धीरे इसे इज्जत का वायस माना जाने लगा। उस समय नंगे सिर निकलना असभ्यता का प्रतीक कहा जाता था। किसी की टोपी उछालना उसके सम्मान से खेलने के समान था। कोई माफी मांगता, तो सामने वाले के पैरों पर टोपी रख देता।

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देश की आजादी के संग्राम का दूसरा दौर आया, तो एकाएक खद्दर के टोपीधारियों की संख्या बढ़ गई। उन्हें पहनने वाले स्वतंत्रता सेनानी कहे जाने लगे। पंडित नेहरू के बहुत कम ऐसे चित्र हैं, जिनमें वह सिर पर टोपी न धरे हों। गांधी की टोपी पहनी तस्वीर मैंने तो नहीं देखी, पर शोहरत 'गांधी टोपी’ को मिली। नेहरू इस मामले में पीछे रह गए।
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स्वतंत्र भारत की राजनीति में धीरे-धीरे टोपी का चलन समाप्त हो गया। अब तो कांग्रेस सेवा दल के लोग ही खास मौकों पर टोपी पहनते हैं या फिर नए समाजवादी रंगरूट लाल रंग की टोपी लगाए मंचों या रैलियों में दिखाई पड़ जाते हैं। देखते-देखते 'मैं अन्ना हूं’ की टोपी 'मैं आम आदमी हूं’ में तब्दील हो गई। पुराने सिनेमा में सेठ जी और मुनीम की झक सफेद टोपीधारी छवियां हमें अब तक याद हैं। राज कपूर की 'सिर पर लाल टोपी रूसी' से लेकर नसीरुद्दीन शाह की 'तिरछी टोपी वाले’ तक के जरिये फिल्मों में टोपी के क्रमबद्ध इतिहास को जाना-समझा सकता है।
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कभी-कभी टोपी न लगाना या उसे लगाने से इन्कार कर देना भी मुद्दा बन जाता है। टोपियों ने यह कभी नहीं सोचा होगा कि उनका इस तरह राजनीतिक लाभ-हानि के लिए इस्तेमाल हो सकता है। कोई चाहे, तो टोपी की आत्मकथा लिखकर साहित्य में ख्याति अर्जित कर सकता है। हिंदी साहित्यकारों में गांधीवादी विष्णु प्रभाकर ही टोपी धारण करते थे, जिनका वामपंथी लेखक भी बहुत सम्मान करते थे। वैसे आजकल गैरटोपीधारी हिंदी लेखकों में भी एक दूसरे की टोपियां उछालने की मुहिम बदस्तूर जारी है। बेतहर है कि लोग टोपियां ही न लगाएं, ताकि उन्हें उछालने के लिए दुश्मनों को व्यर्थ की कवायद न करनी पड़े।

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