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एक और संकट के मुहाने पर अमेरिका

Wed, 15 May 2013 09:43 PM IST
दीपक श्रीवास्तव
दीपक श्रीवास्तव Updated Wed, 15 May 2013 09:43 PM IST
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america on brink of one more crisis

आम सरकारी खर्चों में इन दिनों की जा रही कटौती के कारण अमेरिका के कई सरकारी विभागों में कर्मचारियों को अवैतनिक छुट्टी लेने के लिए मजबूर किया जा सकता है, जिस वजह से उन कर्मियों और उनके परिजनों को वित्तीय और आर्थिक समस्याओं से जूझना होगा।

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खर्च में कटौती की घोषणा करने के साथ ही सहानुभूति जताते हुए राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने वेतन का पांच फीसदी हिस्सा भी राजकोष को वापस देने का फैसला लिया है। राष्ट्रपति की आमदनी सालाना चार लाख अमेरिकी डॉलर है, इसलिए इसमें पांच फीसदी की कटौती करीब 20 हजार अमेरिकी डॉलर होगी।
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इसी तरह कैबिनेट के उनके कुछ सहयोगी भी राष्ट्रपति के साथ कदम मिलाते हुए अपने वेतन का कुछ हिस्सा राजकोष को वापस दे रहे हैं। हालांकि इन सबके बावजूद यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति सुधारने की पर्याप्त कोशिश नहीं लगती।
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वेतन में इस तरह की कटौती सिर्फ सांकेतिक होती है और अर्थव्यवस्था पर शायद ही सकारात्मक प्रभाव डालती है। अभी अमेरिका जबर्दस्त बजट घाटे से जूझ रहा है और वहां बेरोजगारी दर भी ज्यादा है। रही-सही कसर बचत की कम दर (एक फीसदी से भी कम) और खपत की अधिकता पूरी कर रही है, जिससे चालू खाते में घाटे की स्थिति बनी है।

चालू खाते में घाटे से मतलब है कि निर्यात की अपेक्षा आयात ज्यादा होना। नतीजतन, देश में आर्थिक सुस्ती और बेरोजगारी बढ़ी। संभवतः दुनिया में सबसे ज्यादा उपभोक्ता अमेरिका में ही बसते हैं, इसलिए वहां की अर्थव्यवस्था कमजोर बनी हुई है।

यह तो भला हो डॉलर का, जो अनाधिकारिक रूप से दुनिया की संचित मुद्रा बन गई है। इस कारण अमेरिका अपनी सभी विदेशी देनदारियां डॉलर में अदा करता है, जबकि उसकी विदेशी परिसंपत्तियों का करीब 70 फीसदी हिस्सा विदेशी मुद्राओं में है।

अमेरिका की अधिकतर विदेशी परिसंपत्तियां यूरोप में हैं, इसलिए जब दुनिया की प्रमुख मुद्राओं की बनिस्बत डॉलर का अवमूल्यन होता है, तो अमेरिका पर कर्ज में भी कमी होती है, जबकि उसकी परिसंपत्तियों का मूल्य बढ़ जाता है।

ऐसे में अर्थव्यवस्था को संभालने का नुस्खा क्या हो? फिलवक्त जरूरत 'न्यू डील' जैसी रचनात्मक नीतियां बनाने की है, जो अमेरिका को इस आर्थिक झंझावातों से बाहर निकालने में मदद करेगी। न्यू डील असल में 1993 और 1938 के बीच शुरू किए गए सुधारात्मक कदमों को कहा जाता है, जिसका नामकरण पूर्व राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी रूजवेल्ट ने किया था।

वह पहल बेरोजगारों को नौकरी देने, व्यवसाय और वित्तीय लेन-देन में सुधार और व्यापक मंदी के दौरान अर्थव्यवस्था की पुनर्संरचना से संबंधित थी। संघीय सरकार का अर्थव्यवस्था और मौद्रिक आपूर्ति पर नियंत्रण, कृषि उत्पादन और मूल्यों में हस्तक्षेप के साथ ही न्यू डील की वजह से अमेरिका की आर्थिक और सामाजिक नीतियों में महत्वपूर्ण बदलाव हुए।

मौजूदा आर्थिक संकट बहुत हद तक 1930 के संकट से मिलता-जुलता है। वर्ष 1929 से 1933 के दौरान अमेरिका में बेरोजगारी दर चार फीसदी से 25 प्रतिशत तक बढ़ गई थी और विनिर्माण उत्पादन भी लगभग एक-तिहाई कम हो गया था। तब मुद्रा का अवमूल्यन होने से उसके मूल्यों का संकुचन हुआ, जिस वजह से कर्ज चुकाना काफी कठिन हो गया था।

वर्ष 1932 में रूजवेल्ट ने 'अमेरिकियों के लिए न्यू डील' की घोषणा की, जिसने आर्थिक विकास की नई नींव रखी। ऐसे में, मौजूदा आर्थिक संकट साफ तौर पर इशारा कर रहा है कि संघीय सरकार को देश की सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।

अमेरिका को अपनी खपत कम करने की जरूरत है। अगर यह स्वेच्छा से नहीं किया गया, तो आर्थिक संकट उसे ऐसा करने को मजबूर कर सकता है। इसके साथ ही जो अन्य कदम उठाने की जरूरत है, वे हैं, घरेलू मांग को प्रोत्साहित करना तथा आयात और चालू खाते के घाटे को कम करने संबंधी रचनात्मक नीतियां बनाना।


इन सबके बावजूद अगर संघीय सरकार देश की अर्थव्यवस्था को उन्नति के पथ पर ले जाना चाहती है, तो उसे आव्रजन नीतियों को भी लचर बनाना होगा, जिससे भारत जैसे विकसित देशों से उसके यहां कम कीमत में बेहतर और उम्दा पेशेवर मिल सकते हैं।

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