फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Ambedkar's memorandum and Hadia

अंबेडकर की याद और हादिया

Thu, 07 Dec 2017 06:29 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 07 Dec 2017 06:29 PM IST
विज्ञापन
Ambedkar's memorandum and Hadia
सुभाषिनी सहगल अली

छह दिसंबर डॉ. अंबेडकर की पुण्यतिथि का दिन था। उनको जहां लाखों लोग दिल से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, वहीं समाज का एक बड़ा हिस्सा उनसे चिढ़ता है। इसकी एक ही वजह है-भारत के इतिहास में पहली बार समानता के सिद्धांत को कानूनी रूप उनके द्वारा तैयार किए गए संविधान ने ही दिया था। केवल पुरुषों को नहीं, महिलाओं को भी समानता के लायक समझा गया। धर्म, जाति, लिंग और आर्थिक आधार पर तमाम असमानताओं को बाबा साहब इस संविधान के माध्यम से खत्म कर देना चाहते थे।


loader

जिन लोगों के लिए समाज की बुनियाद असमानता होनी चाहिए, जिनके लिए धर्म भी असमानता पर ही आधारित होना चाहिए, उनको यह संविधान कतई नहीं भाता। 1992 में, बाबा साहब के निर्वाण दिवस के दिन, बाबरी मस्जिद के साथ संविधान के एक पाये, धर्मनिरपेक्षता, को ढहा दिया गया।

बाबा साहब के संविधान से सिर्फ मस्जिद टूटने से खुश होने वाले ही नहीं चिढ़ते। हर तरह की समानता के विरोधी उससे चिढ़ते हैं। जब संसद में बाबा साहब ने बालिग महिला को अपनी शादी के बारे में स्वयं फैसला लेने की पूरी आजादी देने की बात रखी, तब कोहराम मच गया था। कानून बनाना संसद की मजबूरी था, क्योंकि सांसद पोंगापंथी नहीं दिखना चाहते थे।

अंतर्जातीय विवाह करने वाले लड़के-लड़कियों को आज उनके माता-पिता मार डालते हैं; दूसरे धर्मों में विवाह करने वालों को जेल में बंद करवा देते हैं। ऐसे युवक-युवतियों को न्यायपालिका से ही राहत मिलती थी। पर बाबा साहब के निर्वाण दिवस के एक हफ्ता पहले सर्वोच्च न्यायालय में जो दृश्य देखने को मिला, उससे तो लगता है कि इस राहत पर भी अब खतरा है। विगत 27 नवंबर को न्यायालय के सामने हादिया को पेश किया गया। तीन साल पहले वह केरल से होम्योपैथी की पढ़ाई के लिए तमिलनाडु गई थी। वहां उसने इस्लाम धर्म अपनाया और एक मुस्लिम से शादी कर ली। उसके पिता इसके खिलाफ उच्च न्यायालय में गए। न्यायालय ने कहा कि हादिया बालिग है और उसे अपने फैसले लेने का पूरा अधिकार था। नई याचिका में उसके पिता ने कहा कि हादिया आतंकवादियों के प्रभाव में आ गई है और विदेश जाने वाली है। इस बार न्यायालय ने उसकी शादी निरस्त कर उसे मां-बाप के पास भेज दिया। हादिया के पति ने सर्वोच्च न्यायालय में न्याय की गुहार लगाई। इस बीच एनआईए ने केरल में हुए अन्य ऐसे विवाहों को संज्ञान में लिया, फिर सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि इन शादियों से देश की सुरक्षा को खतरा पहुंच सकता है। कई महीने बाद न्यायालय ने हादिया को बुलाया। घंटों बहस होती रही कि हादिया का पक्ष सुना जाए या नहीं। एनआईए उसके सुने जाने का विरोध कर रहा था, पर राज्य महिला आयोग के जोर देने पर हादिया को बोलने का मौका मिला। उसने कहा, मैं आजादी चाहती हूं। मैं पढ़ना चाहती हूं और अपने पति के साथ रहना भी चाहती हूं। अदालत ने उसकी एक बात मानी। उसकी दूसरी बात पर वह दो महीने बाद अपना फैसला देगी।

जो लोग हादिया को कोर्ट के सामने बोलने से मना कर रहे थे, उनका कहना है कि उसने शादी ‘दबाव’ में की है। इस देश में कितनी लाख शादियां मां-बाप और समाज के दबाव में की जाती हैं, इस पर किसको चिंता है? पच्चीस वर्षीया एक महिला की शादी में मां-बाप से लेकर एनआईए तक हस्तक्षेप कर रही है, इसकी किसको चिंता है? संविधान और कानून की धज्जियां उड़ाई जा सकती हैं, उसकी चिंता किसको है?

-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed