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आंबेडकर को पहले जाना, तब माना: उन्होंने सामाजिक समावेशन भी किया

Tue, 14 Apr 2026 07:25 AM IST
Nitin Gautam उदित राज, पूर्व सांसद, अमर उजाला
उदित राज, पूर्व सांसद, अमर उजाला Published by: Nitin Gautam Updated Tue, 14 Apr 2026 07:25 AM IST
सार

डॉ. आंबेडकर की महानता के पीछे किसी सत्ता, जाति या वंश की ताकत नहीं, बल्कि उनके संघर्षों से लाभान्वित हुए लोग हैं।
 

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ambedkar birth anniversary society inclusion through constitution reservation
भीमराव आंबेडकर - फोटो : https://main.sci.gov.in/AMB/

विस्तार

डॉ. भीमराव आंबेडकर के योगदान का प्रभाव 1980–90 के दशक में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। इतिहास ने देर से उनके साथ न्याय किया, जबकि कई लोगों के साथ तो हमेशा के लिए अन्याय हो जाता है। जीवित रहते हुए उनके अनुयायी इतने सशक्त नहीं थे कि वे उनके लिए बड़े आंदोलन, रैलियां, विज्ञापन और प्रचार कर पाते। जिस समाज के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वह स्वयं मीडिया में अनुपस्थित था। इसलिए आम लोग उनके विचारों और योगदान को ठीक से जान ही नहीं पाए। स्कूलों और कॉलेजों में भी उन्हें नहीं पढ़ाया गया। संविधान के माध्यम से उन्होंने जो अधिकार वंचित वर्गों को दिलाए, उनके लागू होने से जो सामाजिक परिवर्तन शुरू हुआ, उसी ने आगे चलकर उनके विचारों का प्रचार किया। विशेष रूप से उनकी जयंती मनाने की परंपरा ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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डॉ. आंबेडकर ने संविधान का निर्माण कर दलितों और वंचितों के अधिकारों को सुनिश्चित किया। सबसे पहले, आंबेडकर द्वारा निर्मित भारतीय संविधान ने दलितों, पिछड़ों और वंचित वर्गों को कानूनी सुरक्षा प्रदान की। इसमें समानता का अधिकार, भेदभाव के विरुद्ध प्रावधान और आरक्षण जैसी व्यवस्थाएं शामिल की गईं, जो शोषित वर्गों को न्याय दिलाने का माध्यम बनीं। यह एक मजबूत वैचारिक और कानूनी ढांचा था, जिसने यह सुनिश्चित किया कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म या लिंग के आधार पर भेदभाव न करे।
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किंतु केवल अधिकारों का प्रावधान पर्याप्त नहीं होता; उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही आवश्यक है। यदि संविधान ने अधिकार दिए, तो इन योजनाओं ने उन अधिकारों को वास्तविक जीवन में लागू करने का माध्यम प्रदान किया। यदि सरकार और प्रशासनिक तंत्र प्रभावी न हो, तो सर्वोत्तम संविधान भी केवल कागज पर ही सीमित रह सकता है। स्वतंत्र भारत में बड़े सार्वजनिक प्रतिष्ठान जैसे इस्पात संयंत्र, बांध और वैज्ञानिक संस्थान न केवल विकास के प्रतीक बने, बल्कि उन्होंने सामाजिक समावेशन का मार्ग भी प्रशस्त किया।
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इन संस्थानों में विभिन्न वर्गों के लोगों को समान अवसर मिले, जिससे सामाजिक गतिशीलता संभव हो सकी। इसके अतिरिक्त, कल्याणकारी योजनाओं ने वंचित वर्गों की स्थिति सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यदि संविधान ने अधिकार दिए, तो इन योजनाओं ने उन अधिकारों को वास्तविक जीवन में लागू करने का माध्यम प्रदान किया।

यह भी महत्वपूर्ण है कि डॉ. आंबेडकर स्वयं मानते थे कि किसी भी कानून की सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। दलित और पिछड़े वर्गों में जन्मे अनेक शिक्षक, समाज सुधारक और प्रतिभाशाली व्यक्तियों के साथ अन्याय हुआ और उन्हें देर से मान्यता मिली। कर्पूरी ठाकुर जब बिहार के मुख्यमंत्री बने, उसी दिन उनके पिता को गांव के जमींदार द्वारा अपमानित किया गया, क्योंकि दाढ़ी-बाल बनाने समय पर नहीं पहुंच सके। यह घटना सामाजिक असमानता की गहरी जड़ों को उजागर करती है। समय के साथ न केवल उनकी अपनी जाति, बल्कि अन्य वंचित वर्गों ने भी इन नेताओं के योगदान को स्वीकार करना शुरू किया। यदि ये लोग किसी आभिजात्य वर्ग में जन्मे होते, तो संभवतः उन्हें पहले ही व्यापक मान्यता मिल जाती।

विशेष रूप से, जब दलितों और पिछड़ों को मुफ्त शिक्षा, छात्रवृत्ति, हॉस्टल सुविधाएं, नौकरियों में आरक्षण और अन्य योजनाओं का लाभ मिला, तब उन्होंने सामाजिक व्यवस्था को समझना शुरू किया। उन्होंने जाना कि समाज किस प्रकार शोषण पर आधारित रहा है और मुक्ति के पीछे कौन-से कारण हैं। इससे एक नया मध्यवर्ग उभरा, जिसने सच्चाई को समझा और स्वीकार किया। अनुमानतः जितनी भव्यता से डॉ. आंबेडकर की जयंती देश और विदेश में मनाई जाती है, उतनी किसी अन्य महापुरुष की शायद ही होती हो। उनकी जयंती (14 अप्रैल) का उत्सव कई दिनों पहले शुरू होकर कई हफ्ते तक चलता रहता है।


डॉ. आंबेडकर की महानता के पीछे किसी सत्ता, जाति या वंश की ताकत नहीं, बल्कि उनके संघर्षों से लाभान्वित हुए लोग हैं। राजनीति, शिक्षा और रोजगार में आरक्षण से लाभ पाने वाले वर्गों ने समाज को यह समझाया कि उनके योगदान को स्वीकार करना आवश्यक है। उन्होंने वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देते हुए एक वैकल्पिक सांस्कृतिक मार्ग भी प्रस्तुत किया। आंबेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया, जिससे उनके अनुयायी अंधविश्वास से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़े। यही कारण है कि उनके अनुयायी आज भी सामाजिक न्याय और समानता के लिए संघर्षरत हैं।
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