हिंदी के चेखव का जाना
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अमरकांत जी का निधन हिंदी साहित्य-समाज के साथ-साथ विशेष रूप से मेरे लिए एक बहुत बड़ी क्षति है। मुझमें प्रगतिशील चेतना का बीजारोपण उन्होंने ही किया। कह सकते हैं कि मेरे व्यक्तित्व को तराशने में उनका बहुत बड़ा योगदान है। उनसे पहली बार मैं 1962 में मिला था, जब परिमल की एक गोष्ठी में हिस्सा लेने इलाहाबाद गया था। तब तक मैं उनकी कहानी डिप्टी कलक्टरी पढ़ चुका था। इसलिए कुछ मित्रों के साथ उनके घर भेंट करने गया। वह लेबर कॉलोनी में एक साधारण से घर में रहते थे। हम लोगों के लिए चाय की व्यवस्था करवाने में उन्हें करीब एक घंटा लग गया। उस समय वह मात्र ढाई सौ रुपये की नौकरी करते थे।
फिर जब मैंने 1970 के आसपास धर्मयुग की नौकरी छोड़ी, तो इलाहाबाद में ही बस गया। तब तो अमरकांत जी से रोज का मिलना-जुलना शुरू हो गया। वह काफी संकोची स्वभाव के थे और दूसरों को अपनी परेशानियां नहीं बताते थे। लेकिन काफी घनिष्ठता के बाद वह मुझसे अपने सुख-दुख की बातें बताने लगे। दिल्ली में मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव की तिकड़ी की तरह ही इलाहाबाद में मार्कंडेय, शेखर जोशी और अमरकांत की तिकड़ी थी।
हालांकि उन्होंने कई उपन्यास भी लिखे, लेकिन मूलतः वह कहानीकार थे। वह मध्यवर्गीय जीवन के बहुत बड़े चितेरे थे। मध्यवर्ग के सुख-दुख, चिंताओं, अंतर्विरोधों को उन्होंने जिस तरह अपनी कहानियों में कलात्मक अभिव्यक्ति दी, वह अनूठी है। जैसे प्रेमचंद ने किसानों के जीवन को अपनी रचनाओं के केंद्र में रखा, उसी तरह से अमरकांत मध्यवर्गीय जीवन के प्रतिनिधि कथाकार हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रगतिशील चेतना को आगे बढ़ाने का काम किया।
वह ऊपर से जितने सरल दिखते थे, उनके अंदर उतनी ही आग जलती थी, जिसे आप उनकी कहानी हत्यारे पढ़कर जान सकते हैं। यशपाल ने उन्हें ‘हिंदी का गोर्की’ बताया था, पर मेरा मानना है कि वह ‘हिंदी के चेखव’ थे। शायद यशपाल ने उनके क्रांतिकारी जीवन को देखते हुए उन्हें गोर्की बताया हो, लेकिन उनकी रचनाधर्मिता चेखव के ज्यादा करीब थी। सरल भाषा में जटिल यथार्थ का चित्रण करने वाले वह अन्यतम कथाकार थे।
उनका पहला (सूखे पत्ते) और अंतिम उपन्यास (इन्हीं हथियारों से) काफी चर्चित हुआ। सूखे पत्ते एक छोटा-सा उपन्यास है, जिसमें उन्होंने किशोरवय के प्रेम और समलैंगिक संबंधों का चित्रण किया है। हिंदी में उग्र के बाद उन्होंने ही समलैंगिकता को साहित्य का विषय बनाया था। अमरकांत स्वतंत्रता आंदोलन के सिपाही थे। उनके कई साथी ब्रिटिश शासनकाल में जेल में थे। स्वतंत्रता आंदोलन का वह दौर उनका प्रामाणिक अनुभव था। उनका आखिरी उपन्यास स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि पर ही है, जिसमें बलिया को केंद्र में रखकर उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन की जातीय स्मृति को रेखांकित किया है। इसी उपन्यास पर उन्हें साहित्य अकादेमी सम्मान मिला, और बाद के वर्षों में पूरे साहित्यिक अवदान पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार।
हिंदी के इतने बड़े कथाकार होने के बावजूद अमरकांत कभी आत्ममुग्ध नहीं रहे, जिसके शिकार अक्सर साहित्यकार हो जाते हैं। सादा जीवन उच्च विचार ही उनका आदर्श रहा। अपने जीवन में वह हमेशा अभावों में ही रहे, पर कभी पद, पैसा या पुरस्कार के पीछे नहीं भागे। यह हिंदी समाज और प्रकाशन जगत की सांस्कृतिक विपन्नता ही है कि पचास पुस्तकें लिखने के बाद भी अमरकांत को अभावों में जीवन बिताना पड़ा।
यों तो वह बहुत संकोची थे, पर एक बार बहुत दुखी होकर उन्होंने किसी पत्रकार को बता दिया कि उनके घर में मात्र पंद्रह दिन का ही राशन बचा है। फिर उन्हें कई जगहों से आर्थिक सहायता मिली। उनमें एक ही महत्वाकांक्षा थी-अच्छा लेखन करने की। वह यही प्रेरणा अपने बाद की पीढ़ियों को दिया करते थे। आज वह हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी अक्षर संपदा आने वाली पीढ़ियों को बेहतर लेखन एवं जीवन के उच्चतम मूल्यों की प्रेरणा देती रहेगी। उनका जाना हिंदी समाज के एक ऐसे लेखक का जाना है, जिसने जीवन भर संघर्ष करने के बावजूद कभी उसूलों से समझौता नहीं किया।
(लेखक वरिष्ठ रचनाकार और ज्ञानपीठ के निदेशक हैं)